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    Novel Grove

    Stories 15
    Chapters 372
    Words 1.3 M
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    Reading 4 days, 8 hours4 d, 8 h
    • पाठ-खंड 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सहसा डॉ. प्रियनाथ ने उच्च स्वर से कहा, अधमरा ही क्यों छोड़ दिया। एक लाठी और क्यों न जड़ दी कि काम तमाम हो जाता? मूर्यो! तुम्हारा अपराधी तो मैं था, 'इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? यह कह कर वह…
    • पाठ-खंड 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह कहते-कहते बुढ़िया रोने लगी। प्रेमशंकर की आँखें भी भर गईं, पूछा-बिसेसर साह की क्या हाल है? बुढ़िया-क्या जानूँ भैया, मैंने तो साल भर से उसके द्वार पर झाँका भी नहीं। अब कोई उधर नहीं जाता। ऐसे आदमी का…
    • पाठ-खंड 57 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मस्ता-भैया, यह न जाने कौन आदमी है। फाटक से चिपटा खड़ा था। अभी मैं फाटक बन्द करने गया तो इसे देखा। मुझे देखते ही और दबक गया। बस मैंने चुपके से आकर सबको साथ लिया और बच्चू को पकड़ लिया। जरूर से जरूर कोई…
    • पाठ-खंड 58 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लेकिन जब ज्ञानशंकर बनारस चले गये और उनकी चिट्ठियों का आना बिलकुल बन्द हो गया, तब गायत्री को ऐसा अनुभव होने लगा मानो मैं इस संसार में हूँ ही नहीं। या कोई दूसरा निर्जन, नीरव, अचेतन संसार है। उसे…
    • पाठ-खंड 59 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह कह कर राय साहब धीरे से उठे और चले गये। तब विद्या ग्लानि, लज्जा और नैराश्य से मर्माहत हो कर पलँग पर लेट गई और बिलख-बिलख कर रोने लगी। राय साहब के पहले आक्षेप का उसने प्रतिवाद किया था, पर इस दूसरे…
    • पाठ-खंड 60 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राधा-नदी में अथाह जल है। वैद्य-जिस के पास नौका है उसे जल का क्या भय? राधा-आँधी है, भयानक लहरें हैं और बड़े-बड़े भयंकर जलजन्तु हैं। वैद्य-मल्लाह चतुर है। राधा-सूर्य भगवान् निकल आये, पर तारे क्यों…
    • पाठ-खंड 61 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री विस्मित हो कर विद्या का मुँह ताकने लगी। लेकिन ज्ञानशंकर मन में मुग्ध हुए जाते थे। दोनों बहिनों में वह जो भेद-भाव डालना चाहते थे वह आप में यहाँ अब आपको कष्ट होगा। क्यों न बैंगले में एक कमरा…
    • पाठ-खंड 62 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — किन्तु जब उसने गायत्री को सिर झुका कर चीख-चीख कर रोते देखा तो उसका हृदय नम्र हो गया; और जब गायत्री आ कर पैरों पर गिर पड़ी तब स्नेह और भक्ति के आवेश से आतुर हो कर वह बैठ गयी और गायत्री का सिर उठा कर अपने…
    • पाठ-खंड 63 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री पुलकित हो गयी। उस आनन्दमय जीवन का दृश्य उसकी कल्पना में सचित्र हो गया। उसकी तबियत लहराने लगी। इस समय उसे अपने पति की वह वसीयत याद न रही जो उन्होंने जायदाद का प्रबन्ध के विषय में की थी और…
    • पाठ-खंड 64 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — विद्या-मैंने भी तो कुछ ऐसा तमाशा देखा था। तुम मेरे आने के बहुत देर पीछे गई थी। मुझे लखनऊ में ही सारी कथा मालूम हो गई थी। इसी भयंकर परिणाम को रोकने के लिए मैं वहाँ से दौड़ी आई, किन्तु यहाँ का रंग देखकर…
    • पाठ-खंड 65 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री ने रोते हुए कहा-विद्या, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं? कैसा जी है, डॉक्टर बुलाऊँ? विद्या ने निराश दृष्टि से देखा और दोनों हाथ जोड़ लिये। आँखें बन्द हो गयीं। गायत्री व्याकुल होकर नीचे दीवानखाने…
    • पाठ-खंड 66 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक दिन वे एक पत्र लिये हुए गायत्री के पा आ कर बोले, गोरखपुर से यह बहुत जरूरी खत आया है। मुख्तार साहब ने लिखा है कि वे फसल के दिन हैं। आप लोगों का आना जरूरी है, नहीं तो सीर की उपज हाथ न लगेगी, नौकर-चाकर खा…
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