Find your next favourite story.

    Novel Grove

    Stories 15
    Chapters 372
    Words 1.3 M
    Comments 0
    Reading 4 days, 8 hours4 d, 8 h
    • अध्याय 43 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शान्‍ता को आश्रम में आए एक मास से ऊपर हो गया, लेकिन पद्मसिंह ने अभी तक अपने घर में किसी से इसकी चर्चा नहीं की। कभी सोचते, भैया को पत्र लिखूं, कभी सोचते, चलकर उनसे कहूँ, कभी विट्ठलदास को भेजने का विचार…
    • अध्याय 44 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पद्मसिंह की आत्‍मा किसी भांति इस तरमीम के स्‍वीकार करने में अपनी भूल स्‍वीकार न करती थी। उन्‍हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्रगण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेंगे। उन्‍हें प्रस्‍ताव के एक…
    • अध्याय 45 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन जब सुमन को देखकर लौटा, तो उसकी दशा उस दरिद्र मनुष्‍य की-सी थी, जिसका वर्षों का धन चोरों ने हर लिया हो। वह सोचता था, सुमन मुझसे बोली क्‍यों नहीं,उसने मेरी ओर ताका क्‍यों नहीं? क्‍या वह मुझे इतना नीच…
    • अध्याय 46 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन को ऐसी ग्‍लानि हो रही थी, मानों उसने कोई बड़ा पाप किया हो 1 वह बार-बार अपने शब्‍दों पर विचार करता और यही निश्‍चय करता कि मैं बड़ा निर्दय हूँ। प्रेमाभिलाषा ने उसे उन्‍मत्‍त कर दिया था। वह सोचता,…
    • अध्याय 47 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रभाकर राव का क्रोध बहुत कुछ तो सदन के लेखों से ही शांत हो गया था और जब पद्मसिंह ने सदन के आग्रह से सुमन का पूरा वृतांत उन्‍हें लिख भेजा, तो वह सावधान हो गए। म्‍युनिसिपैलिटी में प्रस्‍ताव को पास…
    • अध्याय 48 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक महीना बीत गया। सदन ने अपने इस नए धंधे की चर्चा घर में किसी से न की। वह नित्‍य सबेरे उठकर गंगा-स्‍नान के बहाने चला जाता। वहाँ से दस बजे घर आता। भोजन करके फिर चल देता और तब का गया-गया घड़ी रात गए, घर…
    • अध्याय 49 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू विट्ठलदास न्‍यायप्रिय सरल मनुष्‍य थे, जिधर न्‍याय खींच ले जाता, उधर चले जाते थे। इसमें लेश-मात्र भी संकोच न होता था। जब उन्‍होंने पद्मसिंह को न्‍यायपथ से हटते देखा, तो उनका साथ छोड़ दिया और कई…
    • अध्याय 50 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदनसिंह का विवाह संस्‍कार हो गया। झोंपड़ा खूब सजाया गया था। वही मंडप का काम दे रहा था, लेकिन कोई भीड़-भाड़ न थी। पद्मसिंह उस दिन घर चले गए और मदनसिंह से सब समाचार कहा। वह यह सुनते ही आग हो गए, बोले-मैं…
    • अध्याय 51 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जैसे सुंदर भाव के समावेश से कविता में जान पड़ जाती है और सुंदर रंगों से चित्र में, उसी प्रकार दोनों बहनों के आने से झोंपड़ी में जान आ गई है। अंधी आंखों में पुतलियां पड़ गई हैं। मुरझाई कली शान्‍ता अब…
    • अध्याय 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन के चले जाने के बाद पद्मसिंह के ह्रदय में एक आत्‍मग्‍लानि उत्‍पन्‍न हुई। मैंने अच्‍छा नहीं किया। न मालूम वह कहां गई तो पूछना ही क्‍या, किंतु वहाँ वह कदापि न गई होगी। मरता क्‍या न करता, कहीं…
    • अध्याय 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दूसरे दिन पद्मसिंह सदन को साथ लेकर किसी स्‍कूल में दाखिल कराने चले। किंतु जहां गए, साफ जवाब मिला 'स्‍थान नहीं है। ' शहर में बारह पाठशालाएं थीं लेकिन सदन के लिए कहीं स्‍थान न था। शर्माजी ने विवश…
    • अध्याय 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्राचीन ऋषियों ने इंद्रियों को दमन करने के दो साधन बताए हैं --एक राग, दूसरा वैराग्‍य। पहला साधन अत्‍यंत कठिन और दुस्‍साध्‍य है। लेकिन हमारे नागरिक समाज ने अपने मुख्‍य स्‍थानों पर मीनाबाजार सजाकर…
    Note