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    Novel Grove

    Stories 15
    Chapters 372
    Words 1.3 M
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    Reading 4 days, 8 hours4 d, 8 h
    • अध्याय 28 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित उमानाथ सदनसिंह का फलदान चढ़ा आए हैं। उन्‍होंने जाह्नवी से गजानन्‍द की सहायता की चर्चा नहीं की थी। डरते थे कि कहीं यह इन रुपयों को अपनी लड़कियों के विवाह के लिए रख छोड़ने पर जिद्द न करने लगे।…
    • अध्याय 29 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक रोज उमानाथ ने कृष्‍णचन्‍द्र के सहचरों को धमकाकर कहा-अब तुम लोगों को उनके साथ बैठकर चरस पीते देखा तो तुम्‍हारी कुशल नहीं। एक-एक की बुरी तरह खबर लूंगा। उमानाथ का रोब सारे गांव पर छाया हुआ था। वे…
    • अध्याय 30 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शहर की म्‍युनिसिपैलिटी में कुल अठारह सभासद थे। उनमें आठ मुसलमान थे और दस हिंदू। सुशिक्षित मेंबरों की संख्‍या अधिक थी, इसलिए शर्माजी को विश्‍वास था कि म्‍युनिसिपैलिटी में वश्‍याओं को नगर से बाहर…
    • अध्याय 31 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इस प्रस्‍ताव के विरोध में हिंदू मेंबरों को जब मुसलमानों के जलसे का हाल मालूम हुआ तो उनके कान खड़े हुए। उन्‍हें मुसलमानों से जो आशा थी, वह भंग हो गई। कुल दस हिंदू थे। सेठ बलभद्रदास चेयरमैन थे।…
    • अध्याय 1 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पश्‍चाताप के कड़वे फल कभी-न-कभी सभी को चखने पड़ते हैं, लेकिन और लोक बुराइयों पर पछताते हैं, दारोगा कृष्‍णचन्‍द्र अपनी भलाइयों पर पछता रहे थे। उन्‍हें थानेदारी करते हुए पच्‍चीस वर्ष हो गए, लेकिन…
    • अध्याय 2 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दारोगाजी के हल्‍के में एक महंत रामदास रहते थे। वह साधुओं की एक गद्दी के महंत थे। उनके यहाँ सारा कारोगार 'श्री बांकेबिहारीजी' के नाम पर होता था 'श्री बांकेबिहारीजी' लेन-देन करते थे और 32 रू.…
    • अध्याय 3 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित कृष्‍णचन्‍द्र रिश्‍वत लेकर उसे छिपाने के साधन न जानते थे। इस विषय में अभी नौसिखिए थे। उन्‍हें मालूम न था कि हराम का माल अकेले मुश्किल से पचता है। मुख्‍तार ने अपने मन में कहा, हमीं ने सब कुछ…
    • अध्याय 4 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कृष्‍णचन्‍द्र अपने कस्‍बे में सर्वप्रिय थे। यह खबर फैलते ही सारी बस्‍ती में हलचल मच गई। कई भले आदमी उनकी जमानत कराने आए, लेकिन साहब ने जमानत नहीं ली। इसके एक सप्‍ताह बाद कृष्‍णचन्‍द्र पर रिश्‍वत…
    • अध्याय 5 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — फागुन में सुमन का विवाह हो गया। गंगाजली दामाद को देखकर बहुत रोई। उसे ऐसा दु:ख हुआ, मानो किसी ने सुमन को कुएं में डाल दिया। सुमन ससुराल आई तो यहाँ की अवस्‍था उससे भी बुरी पाई, जिसकी उसने कल्‍पना की…
    • अध्याय 6 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन के घर के सामने भोली नाम की एक वेश्‍या का मकान था। भोली नित नए श्रृंगार करके अपने कोठे के छज्‍जे पर बैठती। पहर रात तक उसके कमरे से मधुर गान की ध्‍वनि आया करती। कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया…
    • अध्याय 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन को ससुराल आए डेढ़ साल के लगभग हो चुका था, पर उसे मैके जाने का सौभाग्‍य न हुआ था। वहाँ से चिट्ठियां आती थीं। सुमन उत्तर में अपनी मां को समझाया करती, मेरी चिंता मत करना, मैं बहुत आनंद से हूँ, पर अब…
    • अध्याय 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गजाधरप्रसाद की दशा उस मनुष्‍य की-सी थी, जो चोरों के बीच में अशर्फियों की थैली लिए बैठा हो। सुमन का वह मुख-कमल, जिस पर वह कभी भौंरे की भांति मंडराया करता था, अब उसकी आंखों में जलती हुई आग के समान था। वह…
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