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    Novel Grove

    Stories 15
    Chapters 372
    Words 1.3 M
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    Reading 4 days, 8 hours4 d, 8 h
    • अध्याय 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शंखधर राजकुमार होकर भी तपस्वी है। विलास की किसी भी वस्तु से उसे प्रेम नहीं। दूसरों से वह बहुत प्रसन्न होकर बातें करता है। अहिल्या और मनोरमा के पास वह घंटों बैठा गप-शप किया करता है। दादा और दादी के…
    • अध्याय 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शंखधर के चले आने के बाद चक्रधर को संसार शून्य जान पड़ने लगा। सेवा का वह पहला उत्साह लुप्त हो गया। उसी सुंदर युवक की सूरत आंखों में नाचती रहती। उसी की बातें कानों में गूंजा करतीं। भोजन करने बैठते,…
    • उपसंहार Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कई साल बीत गए हैं। मुंशी वज्रधर नहीं रहे। घोड़े की सवारी का उन्हें बड़ा शौक था। नर घोड़े ही पर सवार होते थे। बग्घी, मोटर, पालकी इन सभी को वह जनानी सवारी कहते थे! एक दिन जगदीशपुर से बहुत रात गए लौट रहे…
    • अध्याय 1 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — काशी के आर्य-मंदिर में पंडित अमरनाथ का व्याख्यान हो रहा था। श्रोता लोग मंत्रमुग्ध से बैठे सुन रहे थे। प्रोफेसर दाननाथ ने आगे खिसक कर अपने मित्र बाबू अमृतराय के कान में कहा - 'रटी हुई स्पीच है।'…
    • अध्याय 2 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इधर दोनों मित्रों में बातें हो रही थीं, उधर लाला बदरीप्रसाद के घर में मातम-सा छाया हुआ था। लाला बदरीप्रसाद, उनकी स्त्री देवकी और प्रेमा, तीनों बैठे निश्चल नेत्रों से भूमि की ओर ताक रहे थे, मानो जंगल…
    • अध्याय 3 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — होली का दिन आया। पंडित वसंत कुमार के लिए यह भंग पीने का दिन था। महीनों पहले से भंग मँगवा रखी थी। अपने मित्रों को भंग पीने का नेवता दे चुके थे। सवेरे उठते ही पहला काम जो उन्होंने किया, वह भंग धोना…
    • अध्याय 4 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लाला बदरीप्रसाद की सज्जनता प्रसिद्ध थी। उनसे ठग कर तो कोई एक पैसा भी न ले सकता था, पर धर्म के विषय में वह बड़े ही उदार थे। स्वार्थियों से वह कोसों भागते थे, पर दीनों की सहायता करने में भी न चूकते थे।…
    • अध्याय 5 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पूर्णा को अपने घर से निकलते समय बड़ा दुःख होने लगा। जीवन के तीन वर्ष इसी घर में काटे थे। यहीं सौभाग्य के सुख देखे, यहीं वैधव्य के दुःख भी देखे। अब उसे छोड़ते हुए हृदय फट जाता था। जिस समय चारों कहार…
    • अध्याय 6 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लाला बदरीप्रसाद के लिए अमृतराय से अब कोई संसर्ग रखना असंभव था, विवाह तो दूसरी बात थी। समाज में इतने घोर अनाचार का पक्ष ले कर अमृतराय ने अपने को उनकी नजरों से गिरा दिया। उनसे अब कोई संबंध करना…
    • अध्याय 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लाला बदरीप्रसाद को दाननाथ का पत्र क्या मिला आघात के साथ ही अपमान भी मिला। वह अमृतराय की लिखावट पहचानते थे। उस पत्र की सारी नम्रता, विनय और प्रण, उस लिपि में लोप हो गए। मारे क्रोध के उनका मस्तिष्क…
    • अध्याय 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — वैशाख में प्रेमा का विवाह दाननाथ के साथ हो गया। शादी बड़ी धूम-धाम से हुई। सारे शहर के रईसों को निमंत्रित किया। लाला बदरीप्रसाद ने दोनों हाथों से रुपए लुटाए। मगर दाननाथ की ओर से कोई तैयारी न थी।…
    • अध्याय 9 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — साड़ियाँ लौटा कर और कमलाप्रसाद को अप्रसन्न करके भी पूर्णा का मनोरथ पूरा न हो सका। वह उस संदेह को जरा भी न दूर कर सकी, जो सुमित्रा के हृदय पर किसी हिंसक पशु की भाँति आरूढ़ हो गया था। बेचारी दोनों तरफ से…
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