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    26 Results with the "Literary Fiction" genre


    • निर्मला · Nirmala Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रेमचंद का सामाजिक उपन्यास, जिसमें निर्मला के जीवन के माध्यम से दहेज, बेमेल विवाह और पारिवारिक अविश्वास के प्रभाव सामने आते हैं। Read the Hindi original of Premchand’s moving novel about marriage, dowry, and the consequences of mistrust.
    • अध्याय १३ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   तेरहवां परिच्छेद जो कुछ होना था हो गया, किसी की कुछ न चली डॉक्टर साहब निर्मला की देह से रक्त निकालने की चेष्टा कर ही रहे थे कि मन्साराम अपने उज्ज्वल चरित्र की अन्तिम झलक दिखा कर इस भ्रम-लोक से…
    • अध्याय २५ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   पच्चीसवाँ परिच्छेद दिन गुज़रने लगे। एक महीना पूरा निकल गया; लेकिन मुन्शी जी न लौटे। कोई ख़त भी नहीं भेजा। निर्मला को अब नित्य यही चिन्ता बनी रहती कि वह लौट कर न आए तो क्या होगा? उसे इसकी चिन्ता न…
    • अध्याय २४ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   चौबीसवाँ परिच्छेद निर्मला सारी रात रोती रही। इतना बड़ा कलङ्क! उसने जियाराम को गहने ले जाते देखने पर भी मुँह खोलने का साहस नही किया। क्यों? इसीलिए तो कि लोग समझेंगे कि वह मिथ्या दोषारोपण करके…
    • अध्याय २३ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   तेईसवाँ परिच्छेद मुन्शी जी पाँच बजे कचहरी से लौटे; और अन्दर आकर चारपाई पर गिर पड़े। बुढ़ापे की देह उस पर आज सारे दिन भोजन न मिला। मुँह सूख गया था। निर्मला समझ गई, आज दिन खाली गया। निर्मला ने…
    • अध्याय २२ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   बाईसवाँ परिच्छेद निर्मला न बिगड़ कर पूछा-इतनी देर कहाँ लगाई? सियाराम ने ढिठाई से कहा-रास्ते में एक जगह सो गया था। निर्मला-यह तो मैं नहीं कहती;पर जानते हो कै बज गए हैं? दस कभी के बज गए। बाजार कुछ…
    • अध्याय २१ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   इक्कीसवाँ परिच्छेद रूक्मिणी ने निर्मला से त्योरियाँ बदल कर कहा-क्या नङ्गे पाँव ही मदरसे जायगा? निर्मला ने बच्ची के बाल गूँथते हुए कहा-मैं क्या करूँ,मेरे पास रुपए नहीं हैं। रुक्मिणी-गहने…
    • अध्याय २० Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   बीसवाँ परिच्छेद चिन्ता में नींद कब आती है! निर्मला चारपाई पर पड़ी करवटें बदल रही थी। कितना चाहती थी कि नींद आ जाय; पर नींद ने आने की कसम सी खाली थी। चिराग बुझा दिया था, खिड़की के दरवाजे खोल दिये थे,…
    • अध्याय १९ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   उन्नीसवाँ परिच्छेद अब की सुधा के साथ निर्मला को भी आना पड़ा। वह तो मैके में कुछ दिन और रहना चाहती थी, लेकिन शोकातुरा सुधा अकेले कैसे रहती। उसकी खातिर आना ही पड़ा। रुक्मिणी ने भुङ्गी से कहा-देखती…
    • अध्याय १८ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   अठारहवाँ परिच्छेद जब हमारे ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आ पड़ती है, तो उससे हमें केवल दुख ही नहीं होता—हमें दूसरों के ताने भी सहने पड़ते हैं। जनता को हमारे ऊपर टिप्पणियाँ करने का वह सुअवसर मिल जाता है,…
    • अध्याय १७ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   सत्रहवाँ परिच्छेद कृष्णा के विवाह के बाद सुधा चली गई; लेकिन निर्मला मैके ही में रह गई। वकील साहब बार-बार लिखते थे; पर वह न जाती थी। वहाँ जाने को उसका जी ही न चाहता था। वहाँ कोई ऐसी चीज़ न थी, जो उसे…
    • अध्याय १६ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   सोलहवाँ परिच्छेद महीना कटते देर न लगी! विवाह का शुभमुहूर्त आ पहुँचा! मेहमानों से घर भर गया। मुन्शी तोताराम एक दिन पहले ही आ गए; और उनके साथ निर्मला की सहेली भी आई। निर्मला ने तो बहुत आग्रह न किया…
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