Find your next favourite story.

    26 Results with the "Literary Fiction" genre


    • निर्मला · Nirmala Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रेमचंद का सामाजिक उपन्यास, जिसमें निर्मला के जीवन के माध्यम से दहेज, बेमेल विवाह और पारिवारिक अविश्वास के प्रभाव सामने आते हैं। Read the Hindi original of Premchand’s moving novel about marriage, dowry, and the consequences of mistrust.
    • अध्याय ९ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   नवाँ परिच्छेद मन्साराम के जाने से घर सूना हो गया। दोनों छोटे लड़के उसी स्कूल में पढ़ते थे। निर्मला रोज़ उनसे मन्साराम का हाल पूछती। आशा थी कि छुट्टी के दिन वह आएगा; लेकिन जब छुट्टी के दिन गुज़र…
    • अध्याय ८ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   आठवां परिच्छेद जब कोई बात हमारी आशा के विरुद्ध होती है, तभी दुख होता है। मन्साराम को निर्मला से कभी इस बात की आशा न थी कि वह उसकी शिकायत करेगी। इसीलिए उसे घोर वेदना हो रही थी। यह क्यों मेरी शिकायत…
    • अध्याय ७ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   सातवाँ परिच्छेद उस दिन से निर्मला का रङ्ग-ढङ्ग बदलने लगा। उसने अपने को कर्त्तव्य पर मिटा देने का निश्चय कर लिया। अब तक नैराश्य के सन्ताप में उसने कर्त्तव्य पर ध्यान ही न दिया था। उसके हृदय में…
    • अध्याय ६ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   छठा परिच्छेद उस दिन अपने प्रगाढ़ प्रणय का सबल प्रमाण देने के बाद मुन्शी तोताराम को आशा हुई थी कि निर्मला के मर्मस्थल पर मेरा सिक्का जम जायगा; लेकिन उनकी यह आशा लेशमात्र भी पूरी न हुई; बल्कि पहले…
    • अध्याय ५ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   पाँचवाँ परिच्छेद निर्मला का विवाह हो गया। ससुराल आ गई। वकील साहब का नाम था मुन्शी तोताराम। साँवले रङ्ग के मोटे-ताज़े आदमी थे। उम्र तो अभी चालीस से अधिक न थी, पर वकालत के कठिन परिश्रम ने सिर के…
    • अध्याय ४ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   चौथा परिच्छेद कल्याणी के सामने अब एक विषम समस्या आ खड़ी हुई। पति के देहान्त के बाद उसे अपनी दुरावस्था का यह पहला और बहुत ही कड़वा अनुभव हुआ। दरिद्र विधवा के लिए इससे बड़ी और क्या विपत्ति हो सकती…
    • अध्याय ३ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   तीसरा परिच्छेद विधवा का विलाप और अनाथों का रोना सुना कर हम पाठकों का दिल न दुखाएँगे। जिसके ऊपर पड़ती है, वह रोता है, विलाप करता है, पछाड़ें खाता है। यह कोई नई बात नहीं। हाँ, अगर आप चाहें तो कल्याणी…
    • अध्याय २५ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   पच्चीसवाँ परिच्छेद दिन गुज़रने लगे। एक महीना पूरा निकल गया; लेकिन मुन्शी जी न लौटे। कोई ख़त भी नहीं भेजा। निर्मला को अब नित्य यही चिन्ता बनी रहती कि वह लौट कर न आए तो क्या होगा? उसे इसकी चिन्ता न…
    • अध्याय २४ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   चौबीसवाँ परिच्छेद निर्मला सारी रात रोती रही। इतना बड़ा कलङ्क! उसने जियाराम को गहने ले जाते देखने पर भी मुँह खोलने का साहस नही किया। क्यों? इसीलिए तो कि लोग समझेंगे कि वह मिथ्या दोषारोपण करके…
    • अध्याय २३ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   तेईसवाँ परिच्छेद मुन्शी जी पाँच बजे कचहरी से लौटे; और अन्दर आकर चारपाई पर गिर पड़े। बुढ़ापे की देह उस पर आज सारे दिन भोजन न मिला। मुँह सूख गया था। निर्मला समझ गई, आज दिन खाली गया। निर्मला ने…
    • अध्याय २२ Cover
      by प्रेमचंद · Premchand —   बाईसवाँ परिच्छेद निर्मला न बिगड़ कर पूछा-इतनी देर कहाँ लगाई? सियाराम ने ढिठाई से कहा-रास्ते में एक जगह सो गया था। निर्मला-यह तो मैं नहीं कहती;पर जानते हो कै बज गए हैं? दस कभी के बज गए। बाजार कुछ…
    Note