81 Results with the "Rural fiction" genre
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Chapter
पाठ-खंड 71
इस तर्क-वितर्क में गायत्री बद्रीनाथ की यात्रा पर आरूढ़ न हो सकी। हृषीकेश में पड़े-पड़े तीन महीने गुजर गये और हेमन्त सिर पर आ पहुँचा, यात्रा दुस्साध्य हो गयी। पौष मास था, पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगी…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 70
थोड़ी देर अपील के विषय में परामर्श करने के बाद ज्वालासिंह मिर्जासाहब को साथ ले कर हाजीपुर चले। डॉक्टर साहब भी साथ हो लिये। ज्यों ही दशहरे की छुट्टियों के बाद हाईकोर्ट खुला, अपील दायर हो गयी और…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 7
ज्ञानशंकर-जरा ज्वालासिंह से मिलने गया था। विद्या-तुम्हारी ये बातें मुझे अच्छी नहीं लगती। ज्ञान-कौन-सी बातें? विद्या-यही, अपने घर के लोगों की हाकिमों से शिकायत करना। भाइयों में खटपट सभी जगह होती…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 69
माया-यदि उनकी यह इच्छा होती तो यह वह मुझे ताल्लुकेदारों के स्कूलों में नहीं भेज देती? मुझे आपकी सेवा में रखने से उनका उद्देश्य यही होगा कि मैं आपके ही पदचिह्न पर चलूँ। प्रेम-तो यह रुपये खर्च…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 68
इस भाँति तीन-चार महीने बीत गये। भादों का महीना था। जन्माष्टमी आ रही थी। शहर में उत्सव मनाने की तैयारी हो रही थी। कई वर्षों से गायत्री के यहाँ उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। दूर-दूर से गवैये…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 67
जब वह मजिस्ट्रेट थे, तो उन्होंने अपने असामियों पर इजाफा लगान का दावा किया था। महीनों मेरी खुशामद करते रहे कि मैं बाबू जी से डिगरी करा दूँ। मैं क्या जानें, इनके चकमे में आ गयी। बाबू जी पहले तो बहुत…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 66
एक दिन वे एक पत्र लिये हुए गायत्री के पा आ कर बोले, गोरखपुर से यह बहुत जरूरी खत आया है। मुख्तार साहब ने लिखा है कि वे फसल के दिन हैं। आप लोगों का आना जरूरी है, नहीं तो सीर की उपज हाथ न लगेगी, नौकर-चाकर खा…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 65
गायत्री ने रोते हुए कहा-विद्या, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं? कैसा जी है, डॉक्टर बुलाऊँ? विद्या ने निराश दृष्टि से देखा और दोनों हाथ जोड़ लिये। आँखें बन्द हो गयीं। गायत्री व्याकुल होकर नीचे दीवानखाने…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 64
विद्या-मैंने भी तो कुछ ऐसा तमाशा देखा था। तुम मेरे आने के बहुत देर पीछे गई थी। मुझे लखनऊ में ही सारी कथा मालूम हो गई थी। इसी भयंकर परिणाम को रोकने के लिए मैं वहाँ से दौड़ी आई, किन्तु यहाँ का रंग देखकर…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 63
गायत्री पुलकित हो गयी। उस आनन्दमय जीवन का दृश्य उसकी कल्पना में सचित्र हो गया। उसकी तबियत लहराने लगी। इस समय उसे अपने पति की वह वसीयत याद न रही जो उन्होंने जायदाद का प्रबन्ध के विषय में की थी और…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 62
किन्तु जब उसने गायत्री को सिर झुका कर चीख-चीख कर रोते देखा तो उसका हृदय नम्र हो गया; और जब गायत्री आ कर पैरों पर गिर पड़ी तब स्नेह और भक्ति के आवेश से आतुर हो कर वह बैठ गयी और गायत्री का सिर उठा कर अपने…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 61
गायत्री विस्मित हो कर विद्या का मुँह ताकने लगी। लेकिन ज्ञानशंकर मन में मुग्ध हुए जाते थे। दोनों बहिनों में वह जो भेद-भाव डालना चाहते थे वह आप में यहाँ अब आपको कष्ट होगा। क्यों न बैंगले में एक कमरा…-
304.7 K • Completed
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