81 Results with the "Rural fiction" genre
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Chapter
पाठ-खंड 52
यह कह कर राय साहब ने ज्ञानशंकर को तीव्र नेत्रों से देखा। उनके सन्देह का निशाना - इतना ठीक बैठा था कि ज्ञानशंकर का हृदय काँप उठा। इस भ्रम का मूलोच्छेद करना परमाश्यक था। राय साहब के मन में इसका जगह…-
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Chapter
पाठ-खंड 53
ज्ञानशंकर स्नान करके जल से निकल आये। उनका चेहरा विजय-ज्योति से चमक रहा था। लेकिन जिस प्रकार विजयी सैना शत्रुदल को मैदान से हटा कर और भी उत्साहित हो जाती है और शत्रु को इतना निर्बल और अपंग बना देती…-
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Chapter
पाठ-खंड 54
एकाएक भीतर से द्वार खुला और राय साहब बाहर निकले। उनका मुखड़ा रक्तवर्ण हो रहा था। आँखें भी लाल थीं, पसीने से तर थे माने कोई लोहार भट्ठी के सामने से उठ कर आया हो। दोनों थाल समेट कर एक जगह रख दिये गये थे।…-
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Chapter
पाठ-खंड 55
सहसा डॉ. प्रियनाथ ने उच्च स्वर से कहा, अधमरा ही क्यों छोड़ दिया। एक लाठी और क्यों न जड़ दी कि काम तमाम हो जाता? मूर्यो! तुम्हारा अपराधी तो मैं था, 'इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? यह कह कर वह…-
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Chapter
पाठ-खंड 56
यह कहते-कहते बुढ़िया रोने लगी। प्रेमशंकर की आँखें भी भर गईं, पूछा-बिसेसर साह की क्या हाल है? बुढ़िया-क्या जानूँ भैया, मैंने तो साल भर से उसके द्वार पर झाँका भी नहीं। अब कोई उधर नहीं जाता। ऐसे आदमी का…-
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Chapter
पाठ-खंड 57
मस्ता-भैया, यह न जाने कौन आदमी है। फाटक से चिपटा खड़ा था। अभी मैं फाटक बन्द करने गया तो इसे देखा। मुझे देखते ही और दबक गया। बस मैंने चुपके से आकर सबको साथ लिया और बच्चू को पकड़ लिया। जरूर से जरूर कोई…-
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Chapter
पाठ-खंड 59
यह कह कर राय साहब धीरे से उठे और चले गये। तब विद्या ग्लानि, लज्जा और नैराश्य से मर्माहत हो कर पलँग पर लेट गई और बिलख-बिलख कर रोने लगी। राय साहब के पहले आक्षेप का उसने प्रतिवाद किया था, पर इस दूसरे…-
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Chapter
पाठ-खंड 60
राधा-नदी में अथाह जल है। वैद्य-जिस के पास नौका है उसे जल का क्या भय? राधा-आँधी है, भयानक लहरें हैं और बड़े-बड़े भयंकर जलजन्तु हैं। वैद्य-मल्लाह चतुर है। राधा-सूर्य भगवान् निकल आये, पर तारे क्यों…-
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Chapter
पाठ-खंड 62
किन्तु जब उसने गायत्री को सिर झुका कर चीख-चीख कर रोते देखा तो उसका हृदय नम्र हो गया; और जब गायत्री आ कर पैरों पर गिर पड़ी तब स्नेह और भक्ति के आवेश से आतुर हो कर वह बैठ गयी और गायत्री का सिर उठा कर अपने…-
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Chapter
पाठ-खंड 63
गायत्री पुलकित हो गयी। उस आनन्दमय जीवन का दृश्य उसकी कल्पना में सचित्र हो गया। उसकी तबियत लहराने लगी। इस समय उसे अपने पति की वह वसीयत याद न रही जो उन्होंने जायदाद का प्रबन्ध के विषय में की थी और…-
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Chapter
पाठ-खंड 64
विद्या-मैंने भी तो कुछ ऐसा तमाशा देखा था। तुम मेरे आने के बहुत देर पीछे गई थी। मुझे लखनऊ में ही सारी कथा मालूम हो गई थी। इसी भयंकर परिणाम को रोकने के लिए मैं वहाँ से दौड़ी आई, किन्तु यहाँ का रंग देखकर…-
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Chapter
पाठ-खंड 65
गायत्री ने रोते हुए कहा-विद्या, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं? कैसा जी है, डॉक्टर बुलाऊँ? विद्या ने निराश दृष्टि से देखा और दोनों हाथ जोड़ लिये। आँखें बन्द हो गयीं। गायत्री व्याकुल होकर नीचे दीवानखाने…-
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