81 Results with the "Rural fiction" genre
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Chapter
पाठ-खंड 78
माया-जी हाँ, लिखा तो है, पर बना नहीं। इर्फान-वाह! इससे अच्छा तो मैं भी नहीं लिख सकता। यह सिफत तुम्हें बाबू ज्ञानशंकर से विरासत में मिली है। माया-तो भेज दूँ, जायगा? इर्फान-छपेगा क्यों नहीं? मैं खुद भेज…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 77
श्रद्धा ने प्रेम से आँसू पोंछते हुए कहा-बेटा, चल कर थोड़ा सा खाना खा लो। सवेरे मैं फिर उनसे कहूँगी। डॉ. इर्फानअली ने बात बिगाड़ दी, नहीं तो मैंने तो राजी कर लिया था। माया-चाची, मेरी खाने की बिलकुल…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 76
एक बार ज्ञानशंकर लखनऊ से आये तो माया के वास्ते एक बहुत सुन्दर रेशमी सूट मिला लाये, लेकिन माया ने उसको उस वक्त तक न पहना जब तक मित्र-भवन के और छात्रों के लिए वैसे ही सूट न तैयार हो गये। ज्ञानशंकर मन…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 75
माया-रुपये बहुत हैं। क्या कहूँ, मुझे पहले यह बात न सूझी। दोपहर तक भजन होता रहा। शहर के हजारों आदमी इस आनन्दोत्सव में शरीक थे। प्रेमशंकर ने सबको आदर से बिठाया। इतने में बाजार से मिठाइयाँ आ गयीं,…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 74
महाराज-हुजूर, मैंने तो आज बहुत कम मसाले दिये हैं। दारोगी जी के सामने यह भोजन जाता तो कहते यह क्या फीकी पोच पकाई है। प्रेमशंकर ने रूखे चावल खाये, मगर प्रियनाथ ने मिरचा की परवाह नहीं की। दोनों आदमी…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 73
हाय! अभी तक लाश में जान नहीं आयी। उसे उसकी ओर ताकते हुए अब भय होता था। नैराश्य-व्यथा, शोकाघात, परिणाम-भय, प्रेमोद्गार, ग्लानि-इन सभी भावों ने उसके हृदय को कुचल दिया! तिस पर भी अभी तक उसकी आशाओं का…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 72
लेकिन चाट बुरी लत है। अच्छे दिनों में वह गले की जंजीर है, किन्तु बुरे दिनों में तो यह पैनी छुरी हो जाती है जो आत्म-सम्मान और लज्जा का तसमा भी नहीं छोड़ती। माघ का महीना, सर्दी का यह हाल था कि नाड़ियों…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 40
लाला प्रभाशंकर ने सुना तो उन्मत्त की भाँति दौड़े हुए ज्ञानशंकर के पास जाकर बोले, बेटा, तुमने सुना ही होगा। कुल मर्यादा मिट्टी में मिल गयी। (रोकर) भैया की आत्मा को इस समय कितना दुःख हो रहा होगा।'…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 70
थोड़ी देर अपील के विषय में परामर्श करने के बाद ज्वालासिंह मिर्जासाहब को साथ ले कर हाजीपुर चले। डॉक्टर साहब भी साथ हो लिये। ज्यों ही दशहरे की छुट्टियों के बाद हाईकोर्ट खुला, अपील दायर हो गयी और…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 69
माया-यदि उनकी यह इच्छा होती तो यह वह मुझे ताल्लुकेदारों के स्कूलों में नहीं भेज देती? मुझे आपकी सेवा में रखने से उनका उद्देश्य यही होगा कि मैं आपके ही पदचिह्न पर चलूँ। प्रेम-तो यह रुपये खर्च…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 68
इस भाँति तीन-चार महीने बीत गये। भादों का महीना था। जन्माष्टमी आ रही थी। शहर में उत्सव मनाने की तैयारी हो रही थी। कई वर्षों से गायत्री के यहाँ उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। दूर-दूर से गवैये…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 67
जब वह मजिस्ट्रेट थे, तो उन्होंने अपने असामियों पर इजाफा लगान का दावा किया था। महीनों मेरी खुशामद करते रहे कि मैं बाबू जी से डिगरी करा दूँ। मैं क्या जानें, इनके चकमे में आ गयी। बाबू जी पहले तो बहुत…-
304.7 K • Completed
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