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    81 Results with the "Rural fiction" genre


    • पाठ-खंड 32 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सन्ध्या समय था। दरबार समाप्त हो चुका था। ज्ञानशंकर नगर के मान्य जनों के साथ गवर्नर को स्टेशन तक विदा करके लौटे थे और एक कोच पर आराम से लेटे सिगार पी रहे थे। आज उन्हें सारा दिन दौड़ते गुजरा था, जरा भी…
    • पाठ-खंड 41 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सरकारी वकील ने पूछा, आपको मालूम है कि प्रेमशंकर उस गाँव में अक्सर आया-जाया करते थे। ज्ञान-उनका उस गाँव में आधा हिस्सा है। वकील-आप जानते हैं कि जब इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस का दौरा हुआ था तब प्रेमशंकर…
    • पाठ-खंड 21 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञान-यह रहस्य आज खुला। अभी तक मैं और घर से सभी लोग यही समझते थे कि आप केवल विद्योपार्जन के लिए गए हैं। मगर आज कल तो स्वराज्य आन्दोलन बहुत शिथिल पड़ गया। स्वराज्यवादियों की जबान ही बन्द कर दी गई…
    • पाठ-खंड 20 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राय-तो अब कुछ लिखे। विषय और सामग्री मैं देता हूँ। सिपाही की तलवार में मोरचा न लगना चाहिए। पहला लेख तो इस साल के बजट पर लिख दो और दूसरा गायत्री पर। ज्ञान-मैंने तो आजकल कोई बजट सम्बन्धी लेख…
    • पाठ-खंड 19 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राय साहब को नैनीताल आए हुए एक महीना हो गया। "एक सुरम्य झील के किनारे हरे-भरे वृक्षों के कुन्ज में उनका बैंगला स्थित है, जिसका एक हजार रुपया मासिक किराया देना पड़ता है। कई घोड़े हैं, कई मोटर…
    • पाठ-खंड 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कादिर-तो मैं तुमसे कब कहता हूँ कि उसकी हिमायत करो। वह बुरी राह चलेगा तो आप ठोकर खाएगा। मेरा कहना यही है कि हम लोग अपनी आँखों की देखी और कानों की सुनी बातों में किसी के भय से उलट-फेर न करें। अपनी जान…
    • पाठ-खंड 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — वह कह रही थीं कि यह अपमान मुझसे नहीं सहा जा सकता। मैं अब जान पर खेलता हूँ। आप क्या कहते हैं? मनोहर ने बेटे की यह दशा देखी तो रक्त खौल उठा। बावला हो गया। कुछ न सूझा कि मैं क्या कर रहा हूँ। बाज की तरह…
    • पाठ-खंड 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राय साहब-जिस काम में सेठ जगतराम और मिस्टर मनचूरजी शरीक हों उसके विषय में यह संदेह नहीं हो सकता। एजेण्ट-तो क्या आप समझते हैं कि कम्पनी का संचालन उत्तम रीति न होगा? राय साहब-कदापि नहीं? एजेण्ट-तो फिर…
    • पाठ-खंड 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री जरा सँभल गई, उसने ज्ञानशंकर की ओर सजल आँखों से देखा। कहना चाहती थी, जो कुछ तुमने किया उसका बदला तुम्हें परमात्मा देंगे। लेकिन यदि सौजन्यता का अल्पांश भी रह गया है तो मेरी लाज रखना, सतीत्व…
    • पाठ-खंड 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — किन्तु उसका यह सरल-सीधा व्यवहार ज्ञानशंकर की मलिन दृष्टि में परिवर्तित हो जाता था। उज्ज्वलता में वैचित्र्य और समता में विषमता दीख पड़ती थी। उन्हें गायत्री संकेत द्वारा कहती हुई मालूम होती,…
    • पाठ-खंड 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर-ईश्वर की लीला विचित्र है! प्रभाशंकर-अभी उम्र ही क्या थी! बिलकुल लड़का था। तुम्हारे विवाह में देखा था, चेहरे से तेज बरसता था। ऐसा प्रतापी लड़का मैंने नहीं देखा। ज्ञानशंकर-इसी से तो ईश्वर…
    • पाठ-खंड 23 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रेम-मेरा उद्देश्य कोई व्यापार खोलना नहीं है। मैं तो केवल कृषि की उन्नति के लिए धन चाहता हूँ। सम्भव है आगे चलकर लाभ हो, पर अभी तो मुनाफे की कोई आशा नहीं। राजा-समझ गया, यह केवल पुण्य-कार्य…
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