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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुँच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य लोग उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे। बार-बार आते थे और पूछकर लौट जाते थे। जब वह पांचवें दिन घर पहुंचे, तो लोग मिलने और बधाई…
    • अध्याय 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जगदीशपुर की रानी देवप्रिया का जीवन केवल दो शब्दों में समाप्त हो जाता था-विनोद और विलास। इस वृद्धावस्था में भी उनकी विलास वृत्ति अणुमात्र भी कम न हुई थी। हमारी कर्मेन्द्रियां भले ही जर्जर हो जाएं,…
    • अध्याय 9 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — रानी देवप्रिया का सिर राजकुमार के पैरों पर था और आंखों से आंसू बह रहे थे। उनकी ओर ताकते हुए विचित्र भय हो रहा था। उसे कुछ-कुछ संदेह हो रहा था कि मैं सो तो नहीं रही हूँ। कोई मनुष्य माया के दुर्भद्य…
    • अध्याय 52 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित पद्मसिंह के चार-पांच मास के सदुद्योग का यह फल हुआ कि बीस-पच्‍चीस वेश्‍याओं ने अपनी लड़कियों को अनाथालय में भेजना स्‍वीकार कर लिया। तीन वेश्‍याओं ने अपनी सारी संपत्ति अनाथालय के निमित्त…
    • अध्याय 53 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित मदनसिंह की कई महीने तक यह दशा थी कि जो कोई उनके पास आता, उसी से सदन की बुराई करते-कपूत है, भ्रष्‍ट है, शोहदा है, लुच्‍चा है, एक कानी कौड़ी तो दूंगा नहीं, भीख मांगता फिरेगा, तब आटे-दाल का भाव मालूम…
    • अध्याय 54 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जिस प्रकार कोई मनुष्‍य लोभ के वश होकर आभूषण चुरा लेता है, पर विवेक होने पर उसे देखने में भी लज्‍जा आती है, उसी प्रकार सदन भी सुमन से बचता फिर ता था। इतना ही नहीं, वह उसे नीची दृष्टि से देखता था और उसकी…
    • अध्याय 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्‍या का समय है। आकाश पर लालिमा छाई हुई है और मंद वायु गंगा की लहरों पर क्रीड़ा कर रही है, उन्‍हें गुदगुदा रही है। वह अपने करुण नेत्रों से मुस्‍कराती है और कभी-कभी खिलखिलाकर हंस पड़ती है, तब उसके…
    • अध्याय 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक सल बीत गया। पंडित मदनसिंह पहले तीर्थ यात्रा पर उधार खाए बैठे थे। जान पड़ता था, सदन के घर आते ही एक दिन भी न ठहरेंगे, सीधे बद्रीनाथ पहुँचकर दम लेंगे, पर जब से मदन आ गया है, उन्‍होंने भूलकर भी…
    • अध्याय 57 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कार्तिक का महीना था। पद्मसिंह सुभद्रा को लेकर गंगा-स्‍नान कराने ले गए थे। लौटती बार वह अलईपुर की ओर से आ रहे थे। सुभद्रा गाड़ी की खिड़की से बाहर झांकती चली आती थी और सोचती थी कि यहाँ इस सन्‍नाटे…
    • अध्याय 32 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जिस प्रकार कोई आलसी मनुष्‍य किसी के पुकारने की आवाज सुनकर जाग जाता है, किंतु इधर-उधर देखकर फिर निद्रा में मग्‍न हो जाता है, उसी प्रकार पंडित कृष्‍णचन्‍द्र क्रोध और ग्‍लानि का आवेश शांत होने पर…
    • अध्याय 33 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन के विवाह का दिन आ गया। चुनार से बारात अमोला चली। उसकी तैयारियों का वर्णन करना व्‍यर्थ है। जैसी अन्‍य बारातें होती हैं, वैसी ही यह भी थी। वैभव और दरिद्रता का अत्‍यंत करुणात्‍मक दृश्‍य था।…
    • अध्याय 34 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — विट्ठलदास ने सुमन को विधवाश्रम में गुप्‍त रीति से रखा था। प्रबंधकारिणी सभा के किसी भी सदस्‍य को इत्तिला न दी थी। आश्रम की विधवाओं से उसे विधवा बताया था। लेकिन अबुलवफा जैसे टोहियों से यह बात बहुत…
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