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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 35 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यद्यपि डॉक्‍टर साहब का बंगला निकट ही था, पर इन दोनों आदमियों ने एक किराए की गाड़ी की। डॉक्‍टर साहब के यहाँ पैदल जाना फैशन के विरुद्ध था। रास्‍ते में विट्ठलदास ने आज के सारे समाचार बढ़ा-चढ़ाकर बयान…
    • अध्याय 36 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदर जब घर पर पहुंचा, तो उसके मन की दशा उस मनुष्‍य की-सी थी, जो बरसों की कमाई लिए, मन में सहस्‍त्रों मंसूबे बांधता, हर्ष की उल्‍लासित घर आए और यहाँ संदूक खोलने पर उसे मालूम हो कि थैली खाली पड़ी…
    • अध्याय 37 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन को व्‍याख्‍यानों की ऐसी चाट पड़ी कि जहां कहीं व्‍याख्‍यान की खबर पाता, वहाँ अवश्‍य जाता। दोनों पक्षों की बातें महीनों सुनने और उन पर विचार करने से उसमें राय स्थिर करने की योग्‍यता आने लगी। अब…
    • अध्याय 38 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जिस दिन से बारात लौट गई, उसी दिन से कृष्‍णचन्‍द्र फिर घर से बाहर नहीं निकले। मन मारे हुए अपने कमरे में बैठे रहते। उन्‍हें अब किसी को अपना मुँह दिखाते लज्‍जा आती थी। दुश्‍चरित्रा सुमन ने उन्‍हें…
    • अध्याय 39 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रात:काल यह शोक-समाचार अमोला में फैला गया। इने-गिने सज्‍जनों को छोड़कर कोई भी उमानाथ के दूर पर समवेदना प्रकट करने न आया। स्‍वाभाविक मृत्‍यु हुई होती, तो संभवत: उनके शत्रु भी आकर चार आंसू बहा जाते,…
    • अध्याय 40 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पद्मसिंह का पहला विवाह उस समय हुआ था, जब वह कॉलेज में पढ़ते थे, और एम.ए. पास हुए, तो वह एक पुत्र के पिता थे। पर बालिका वधू शिशु-पालन का मर्म न जानती थी। बालक जन्‍म के समय तो ह्रष्‍ट-पुष्‍ट था, पर पीछे…
    • अध्याय 41 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जब हम स्‍वास्थ्य-लाभ करने के लिए किसी पहाड़ पर जाते हैं, तो इस बात का विशेष यत्‍न करते हैं कि हमसे कोई कुपथ्‍य न हो। नियमित रूप से व्‍यायाम करते हैं, आरोग्‍य का उद्देश्‍य सदैव हमारे सामने रहता है।…
    • अध्याय 42 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शान्‍ता ने पत्र भेजा, पर उसको उत्तर आने की कोई आशा न थी। तीन दिन बीत गए, उसका नैराश्‍य दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था। अगर कुछ अनुकूल उत्तर न आया, तो उमानाथ अवश्‍य ही उसका विवाह कर देंगे, यह सोचकर शान्‍ता…
    • अध्याय 43 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शान्‍ता को आश्रम में आए एक मास से ऊपर हो गया, लेकिन पद्मसिंह ने अभी तक अपने घर में किसी से इसकी चर्चा नहीं की। कभी सोचते, भैया को पत्र लिखूं, कभी सोचते, चलकर उनसे कहूँ, कभी विट्ठलदास को भेजने का विचार…
    • अध्याय 44 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पद्मसिंह की आत्‍मा किसी भांति इस तरमीम के स्‍वीकार करने में अपनी भूल स्‍वीकार न करती थी। उन्‍हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्रगण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेंगे। उन्‍हें प्रस्‍ताव के एक…
    • अध्याय 45 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन जब सुमन को देखकर लौटा, तो उसकी दशा उस दरिद्र मनुष्‍य की-सी थी, जिसका वर्षों का धन चोरों ने हर लिया हो। वह सोचता था, सुमन मुझसे बोली क्‍यों नहीं,उसने मेरी ओर ताका क्‍यों नहीं? क्‍या वह मुझे इतना नीच…
    • अध्याय 46 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन को ऐसी ग्‍लानि हो रही थी, मानों उसने कोई बड़ा पाप किया हो 1 वह बार-बार अपने शब्‍दों पर विचार करता और यही निश्‍चय करता कि मैं बड़ा निर्दय हूँ। प्रेमाभिलाषा ने उसे उन्‍मत्‍त कर दिया था। वह सोचता,…
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