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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 20 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मिस्टर जिम ने दूसरे दिन हुक्म दिया कि चक्रधर को जेल से निकालकर शहर के बड़े अस्पताल में रखा जाए । वह उन जिद्दी आदमियों में न थे, जो मार खाकर भी बेहयाई करते हैं। सवेरे परवाना पहुंचा। राजा साहब भी…
    • अध्याय 2 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दारोगाजी के हल्‍के में एक महंत रामदास रहते थे। वह साधुओं की एक गद्दी के महंत थे। उनके यहाँ सारा कारोगार 'श्री बांकेबिहारीजी' के नाम पर होता था 'श्री बांकेबिहारीजी' लेन-देन करते थे और 32 रू.…
    • अध्याय 2 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बनारस में महात्मा कबीर के चौरे के निकट मुंशी वज्रधरसिंह का मकान है। आप हैं तो राजपूत पर अपने को 'मुंशी' लिखते और कहते हैं। 'मुंशी' की उपाधि से आपको बहुत प्रेम है। 'ठाकुर' के साथ आपको…
    • अध्याय 2 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इधर दोनों मित्रों में बातें हो रही थीं, उधर लाला बदरीप्रसाद के घर में मातम-सा छाया हुआ था। लाला बदरीप्रसाद, उनकी स्त्री देवकी और प्रेमा, तीनों बैठे निश्चल नेत्रों से भूमि की ओर ताक रहे थे, मानो जंगल…
    • अध्याय 19 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शाम हो गई। सुमन ने दिन-भर विट्ठलदास की राह देखी, लेकिन वह अब तक नहीं आए। सुमन के मन में जो नाना प्रकार की शंकाएं उठ रही थीं, वह पुष्‍ट हो गई। विट्ठलदास अब नहीं आएंगे, अवश्‍य कोई विघ्‍न पड़ा। या तो वह…
    • अध्याय 19 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ठाकुर हरिसेवकसिंह दावत खाकर घर पहुंचे, तो डर रहे थे कि लौंगी पूछेगी तो क्या जवाब दूंगा। अगर यह कहूँ कि मुंशीजी ने मेरे साथ चाल चली, तो जिन्दा न छोड़ेगी, तानों से कलेजा छलनी कर देगी। जो कहूँ कि मनोरमा…
    • अध्याय 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू विट्ठलदास अधूरा काम न करते थे। पद्मसिंह की ओर से निराश होकर उन्‍हें यह चिंता होने लगी कि सुमनबाई के लिए पचास रुपये मासिक का चंदा कैसे करूं? उनकी स्‍थापित की हुई संस्‍थाएं चंदों ही से चल रही…
    • अध्याय 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — चक्रधर को जेल में पहुँचकर ऐसा मालूम हुआ कि वह एक नई दुनिया में आ गए, जहां मुनष्य ही मनुष्य हैं, ईश्वर नहीं। उन्हें ईश्वर के दिये हुए वायु और प्रकाश के मुश्किल से दर्शन होते थे। मनुष्य के रचे हुए…
    • अध्याय 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दोनों मित्र आश्रम की सैर करने चले। अमृतराय ने नदी के किनारे असी-संगम के निकट पचास एकड़ जमीन ले ली थी। वहाँ रहते भी थे। अपना कैंटोमेंट वाला बँगला बेच डाला था। आश्रम ही के हाते में एक छोटा-सा मकान अपने…
    • अध्याय 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्‍या का समय है। सदन अपने घोड़े पर सवार दालमंडी में दोनों तरफ छज्‍जों और खिड़कियों की ओर ताकता जा रहा है। जब से सुमन वहाँ आई है, सदन उसके छज्‍जे के सामने किसी-न-किसी बहाने से जरा देर के लिए अवश्‍य…
    • अध्याय 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राजा विशालसिंह की जवानी कब की गुजर चुकी थी, किंतु प्रेम से उनका हृदय अभी तक वंचित था। अपनी तीनों रानियों में केवल वसुमती के प्रेम की कुछ भूली हुई-सी याद उन्हें आती थी। प्रेम वह प्याला नहीं है, जिससे…
    • अध्याय 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दाननाथ जब अमृतराय के बँगले के पास पहुँचे तो सहसा उनके कदम रुक गए, हाते के अंदर जाते हुए लज्जा आई। अमृतराय अपने मन में क्या कहेंगे? उन्हें यही खयाल होगा कि जब चारों तरफ ठोकरें खा चुके और किसी ने साथ न…
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