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    168 Results with the "Social drama" genre


    • खंड 2 · अध्याय 2 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — कई दिन हो गये, विजय किसी से कुछ बोलता नहीं। समय पर भोजन कर लेता और सो रहता। अधिक समय उसका मकान के पास ही करील की झाड़ियों की टट्टी के भीतर लगे हुए कदम्ब के नीचे बीतता है। वहाँ बैठकर वह कभी उपन्यास…
    • खंड 2 · अध्याय 3 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — मथुरा में चर्च के पास एक छोटा-सा, परन्तु साफ-सुथरा बँगला है। उसके चारों ओर तारों से घिरी हुई ऊँची, जुरांटी की बड़ी घनी टट्टी है। भीतर कुछ फलों के वृक्ष हैं। हरियाली अपनी घनी छाया में उस बँगले को शीतल…
    • खंड 2 · अध्याय 4 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — आज कितने दिनों बाद विजय सरला की कोठरी में बैठा है। घण्टी लतिका के साथ बातें करने चली गयी। विजय को सरला ने अकेले पाकर कहा, 'बेटा, तुम्हारी भी माँ होगी, उसको तुम एक बारगी भूलकर इस छोकरी के लिए इधर-उधर…
    • खंड 2 · अध्याय 5 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — विचार सागर में डूबती-उतराती हुई घण्टी आज मौलसिरी के नीचे एक शिला-खण्ड पर बैठी है। वह अपने मन से पूछती थी-विजय कौन है, जो मैं उसे रसालवृक्ष समझकर लता के समान लिपटी हूँ। फिर उसे आप ही आप उत्तर मिलता-तो…
    • खंड 2 · अध्याय 6 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — वृन्दावन से दूर एक हरा-भरा टीला है, यमुना उसी से टकराकर बहती है। बड़े-बड़े वृक्षों की इतनी बहुतायत है कि वह टीला दूर से देखने पर एक बड़ा छायादार निकुंज मालूम पड़ता है। एक ओर पत्थर की सीढ़ियाँ हैं,…
    • खंड 2 · अध्याय 7 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — उत्सव का समारोह था। गोस्वामी जी व्यासपीठ पर बैठे हुए थे। व्याख्यान प्रारम्भ होने वाला ही था; उसी साहबी ठाट से घण्टी को साथ लिये सभा में आया आज यमुना दुःखी होकर और मंगल ज्वर में, अपने-अपने कक्ष में…
    • खंड 2 · अध्याय 8 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — घण्टी और विजय बाथम के बँगले पर लौटकर गोस्वामी जी के सम्बन्ध में काफी देर तक बातचीत करते रहे। विजय ने अंत में कहा, 'मुझे तो गोस्वामी की बातें कुछ जँचती नहीं। कल फिर चलूँगा। तुम्हारी क्या सम्मति है,…
    • खंड 3 · अध्याय 1 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — श्रीचन्द्र का एकमात्र अन्तरंग सखा धन था, क्योंकि उसके कौटुम्बिक जीवन में कोई आनन्द नहीं रह गया था। वह अपने व्यवसाय को लेकर मस्त रहता। लाखों का हेर-फेर करने में उसे उतना ही सुख मिलता जितना किसी…
    • खंड 3 · अध्याय 2 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — किशोरी और निरंजन काशी लौट आये; परन्तु उन दोनों के हृदय में शान्ति न थी, क्रोध में किशोरी ने विजय का तिरस्कार किया, फिर भी सहज मातृस्नेह विद्रोह करने लगा, निरंजन से दिन में एकाध बार इस विषय को लेकर…
    • खंड 3 · अध्याय 3 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — निरंजन वृन्दावन में विजय की खोज में घूमने लगा। तार देकर अपने हरिद्वार के भण्डारी को रुपये लेकर बुलाया और गली-गली खोज की धूम मच गयी। मथुरा में द्वारिकाधीश के मन्दिर में कई तरह से टोह लगाया।…
    • खंड 3 · अध्याय 4 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — 'तब आपने क्या निश्चय किया सरला तीव्र स्वर में बोली। 'घण्टी को उस हत्याकांड से बचा लेना भी अपराध है, ऐसा मैंने कभी सोचा भी नहीं।' बाथम ने कहा। 'बाथम! तुम जितने भीतर से क्रूर और निष्ठुर हो, यदि…
    • खंड 3 · अध्याय 5 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — फतेहपुर सीकरी से अछनेरा जाने वाली सड़क के सूने अंचल में एक छोटा-सा जंगल है। हरियाली दूर तक फैली हुई है। यहाँ खारी नदी एक छोटी-सी पहाड़ी से टकराती बहती है। यह पहाड़ी सिलसिला अछनेरा और सिंघापुर के…
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