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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — महाशय विट्ठलदास इस समय ऐसे खुश थे मानो उन्‍हें कोई संपत्ति मिल गई हो। उन्‍हें विश्‍वास था कि पद्मसिंह इस जरा से कष्‍ट से मुँह न मोड़ेंगे, केवल उनके पास जाने की देर है। वह होली के कई दिन पहले से…
    • अध्याय 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्या हो गयी है। ऐसी उमस है कि सांस लेना कठिन है, और जेल की कोठरियों में यह उमस और भी असह्य हो गई है। एक भी खिड़की नहीं; एक भी जंगला नहीं। उस पर मच्छरों का निरंतर गान कानों के परदे फाड़े डालता है।…
    • अध्याय 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शहर में घर-घर, गली-कूचे, जहाँ देखिए यही चर्चा थी! बाबू दाननाथ का नाम भी प्रसंग से लोगों की जबान पर आ जाता था। जो व्यक्ति कमलाप्रसाद की नाक का बाल - आठों पहर का साथी हो, वह क्या इस कुचक्र से बिल्कुल अलग…
    • अध्याय 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्राचीन ऋषियों ने इंद्रियों को दमन करने के दो साधन बताए हैं --एक राग, दूसरा वैराग्‍य। पहला साधन अत्‍यंत कठिन और दुस्‍साध्‍य है। लेकिन हमारे नागरिक समाज ने अपने मुख्‍य स्‍थानों पर मीनाबाजार सजाकर…
    • अध्याय 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राजाओं-महाराजाओं को क्रोध आता है, तो उनके सामने जाने की हिम्मत नहीं पड़ती। जाने क्या गजब हो जाए, क्या आफत आ जाए। विशालसिंह किसी को फांसी न दे सकते थे, यहां तक कि कानून की रू से वह किसी को गालियां भी न…
    • अध्याय 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दाननाथ यहाँ से चले, तो उनके जी में ऐसा आ रहा था कि इसी वक्त घर-बार छोड़ कर कहीं निकल जाऊँ! कमलाप्रसाद अपने साथ उन्हें भी ले डूबा था। जनता की दृष्टि में कमलाप्रसाद और वह अभिन्न थे। यह असंभव था कि उनमें…
    • अध्याय 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दूसरे दिन पद्मसिंह सदन को साथ लेकर किसी स्‍कूल में दाखिल कराने चले। किंतु जहां गए, साफ जवाब मिला 'स्‍थान नहीं है। ' शहर में बारह पाठशालाएं थीं लेकिन सदन के लिए कहीं स्‍थान न था। शर्माजी ने विवश…
    • अध्याय 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गद्दी के कई दिन पहले ही से मेहमानों का आना शुरू हो गया और तीन दिन बाकी ही थे कि सारा कैंप भर गया। दीवान साहब ने कैंप ही में बाजार लगवा दिया था, वहीं रसद-पानी का भी इंतजाम था। राजा साहब स्वयं मेहमानों…
    • अध्याय 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू दाननाथ के स्वभाव में मध्यम न था। वह जिससे मित्रता करते थे, उसके दास बन जाते थे, उसी भाँति जिसका विरोध करते थे, उसे मिट्टी में मिला देना चाहते थे। कई महीने तक वह कमलाप्रसाद के मित्र बने रहे। बस,…
    • अध्याय 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन के चले जाने के बाद पद्मसिंह के ह्रदय में एक आत्‍मग्‍लानि उत्‍पन्‍न हुई। मैंने अच्‍छा नहीं किया। न मालूम वह कहां गई तो पूछना ही क्‍या, किंतु वहाँ वह कदापि न गई होगी। मरता क्‍या न करता, कहीं…
    • अध्याय 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मुद्दत के बाद जगदीशपुर के भाग जागे। राजभवन आबाद हुआ। बरसात में मकानों की मरम्मत न हो सकती थी, इसलिए क्वार तक शहर ही में गुजारा करना पड़ा। कार्तिक लगते ही एक ओर जगदीशपुर के राजभवन की मरम्मत होने…
    • अध्याय 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इस वक्त पूर्णा को अपनी उद्दंडता पर पश्चाताप हुआ। उसने अगर जरा धैर्य से काम लिया होता तो कमलाप्रसाद कभी ऐसी शरारत न करता। कौशल से काम निकल सकता था, लेकिन होनहार को कौन टाल सकता है? मगर अच्छा ही हुआ।…
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