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    168 Results with the "Social drama" genre


    • खंड 3 · अध्याय 1 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — श्रीचन्द्र का एकमात्र अन्तरंग सखा धन था, क्योंकि उसके कौटुम्बिक जीवन में कोई आनन्द नहीं रह गया था। वह अपने व्यवसाय को लेकर मस्त रहता। लाखों का हेर-फेर करने में उसे उतना ही सुख मिलता जितना किसी…
    • खंड 3 · अध्याय 2 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — किशोरी और निरंजन काशी लौट आये; परन्तु उन दोनों के हृदय में शान्ति न थी, क्रोध में किशोरी ने विजय का तिरस्कार किया, फिर भी सहज मातृस्नेह विद्रोह करने लगा, निरंजन से दिन में एकाध बार इस विषय को लेकर…
    • खंड 3 · अध्याय 3 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — निरंजन वृन्दावन में विजय की खोज में घूमने लगा। तार देकर अपने हरिद्वार के भण्डारी को रुपये लेकर बुलाया और गली-गली खोज की धूम मच गयी। मथुरा में द्वारिकाधीश के मन्दिर में कई तरह से टोह लगाया।…
    • खंड 3 · अध्याय 4 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — 'तब आपने क्या निश्चय किया सरला तीव्र स्वर में बोली। 'घण्टी को उस हत्याकांड से बचा लेना भी अपराध है, ऐसा मैंने कभी सोचा भी नहीं।' बाथम ने कहा। 'बाथम! तुम जितने भीतर से क्रूर और निष्ठुर हो, यदि…
    • खंड 3 · अध्याय 5 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — फतेहपुर सीकरी से अछनेरा जाने वाली सड़क के सूने अंचल में एक छोटा-सा जंगल है। हरियाली दूर तक फैली हुई है। यहाँ खारी नदी एक छोटी-सी पहाड़ी से टकराती बहती है। यह पहाड़ी सिलसिला अछनेरा और सिंघापुर के…
    • प्रतिज्ञा · Pratigya Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक प्रतिज्ञा से बदलते संबंध और समाज की रूढ़ियों से टकराती मानवीय संवेदनाएँ। A promise tests friendship, marriage and the possibilities of social reform.
    • अध्याय 10 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — आदर्श हिंदू-बालिका की भाँति प्रेमा पति के घर आ कर पति की हो गई थी। अब अमृतराय उसके लिए केवल एक स्वप्न की भाँति थे, जो उसने कभी देखा था। वह गृह-कार्य में बड़ी कुशल थी। सारा दिन घर का कोई-न-कोई काम करती…
    • अध्याय 11 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पूर्णा प्रातःकाल और दिनों से आध घंटा पहले उठी। उसने दबे पाँव सुमित्रा के कमरे में कदम रखा। वह देखना चाहती थी कि सुमित्रा सोती है या जागती। शायद वह उसकी सूरत देख कर निश्चय करना चाहती थी कि उसे रात…
    • अध्याय 12 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पूर्णा कितना ही चाहती थी कि कमलाप्रसाद की ओर से अपना मन हटा ले, पर यह शंका उसके हृदय में समा गई थी कि कहीं इन्होंने सचमुच आत्म-हत्या कर ली तो क्या होगा? रात को वह कमलाप्रसाद की उपेक्षा करके चली तो आई…
    • अध्याय 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इस वक्त पूर्णा को अपनी उद्दंडता पर पश्चाताप हुआ। उसने अगर जरा धैर्य से काम लिया होता तो कमलाप्रसाद कभी ऐसी शरारत न करता। कौशल से काम निकल सकता था, लेकिन होनहार को कौन टाल सकता है? मगर अच्छा ही हुआ।…
    • अध्याय 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू दाननाथ के स्वभाव में मध्यम न था। वह जिससे मित्रता करते थे, उसके दास बन जाते थे, उसी भाँति जिसका विरोध करते थे, उसे मिट्टी में मिला देना चाहते थे। कई महीने तक वह कमलाप्रसाद के मित्र बने रहे। बस,…
    • अध्याय 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दाननाथ यहाँ से चले, तो उनके जी में ऐसा आ रहा था कि इसी वक्त घर-बार छोड़ कर कहीं निकल जाऊँ! कमलाप्रसाद अपने साथ उन्हें भी ले डूबा था। जनता की दृष्टि में कमलाप्रसाद और वह अभिन्न थे। यह असंभव था कि उनमें…
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