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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 24 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह बात बिलकुल तो असत्‍य नहीं है कि ईश्‍वर सबको किसी-न-किसी हीले से अन्‍न-वस्‍त्र देता है। पंडित उमानाथ बिना किसी हीले ही के संसार का सुख-भोग करते थे। उनकी आकाशी वृत्ति थी। उनके भैंस और गाएं न थीं,…
    • अध्याय 25 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सार्वजनिक संस्‍थाएं भी प्रतिभाशाली मनुष्‍य की मोहताज होती हैं। यद्यपि विट्ठलदास के अनुयायियों की कमी न थी, लेकिन उनमें प्राय: सामान्‍य अवस्‍था के लोग थे। ऊंची श्रेणी के लोग उनसे दूर भागते थे।…
    • अध्याय 26 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — रात के नौ बजे थे। पद्मसिंह भाई के साथ बैठे हुए विवाह के संबंध में बातचीत कर रहे थे। कल बारात जाएगी। दरवाजे पर शहनाई बज रही थी और भीतर गाना हो रहा था। मदनसिंह-तुमने जो गाड़ियां भेजी हैं; वह कल शाम तक…
    • अध्याय 27 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बरसात के दिन थे, घटा छाई हुई थी। पंडित उमानाथ चुनारगढ़ के निकट गंगा के तट पर खड़े नाव की बाट जोह रहे थे। वह कई गांवों का चक्‍कर लगाते हुए आ रहे थे और संध्‍या होने से पहले चुनार के पास एक गांव में जाना…
    • अध्याय 28 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित उमानाथ सदनसिंह का फलदान चढ़ा आए हैं। उन्‍होंने जाह्नवी से गजानन्‍द की सहायता की चर्चा नहीं की थी। डरते थे कि कहीं यह इन रुपयों को अपनी लड़कियों के विवाह के लिए रख छोड़ने पर जिद्द न करने लगे।…
    • अध्याय 29 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक रोज उमानाथ ने कृष्‍णचन्‍द्र के सहचरों को धमकाकर कहा-अब तुम लोगों को उनके साथ बैठकर चरस पीते देखा तो तुम्‍हारी कुशल नहीं। एक-एक की बुरी तरह खबर लूंगा। उमानाथ का रोब सारे गांव पर छाया हुआ था। वे…
    • अध्याय 30 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शहर की म्‍युनिसिपैलिटी में कुल अठारह सभासद थे। उनमें आठ मुसलमान थे और दस हिंदू। सुशिक्षित मेंबरों की संख्‍या अधिक थी, इसलिए शर्माजी को विश्‍वास था कि म्‍युनिसिपैलिटी में वश्‍याओं को नगर से बाहर…
    • अध्याय 31 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इस प्रस्‍ताव के विरोध में हिंदू मेंबरों को जब मुसलमानों के जलसे का हाल मालूम हुआ तो उनके कान खड़े हुए। उन्‍हें मुसलमानों से जो आशा थी, वह भंग हो गई। कुल दस हिंदू थे। सेठ बलभद्रदास चेयरमैन थे।…
    • अध्याय 32 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जिस प्रकार कोई आलसी मनुष्‍य किसी के पुकारने की आवाज सुनकर जाग जाता है, किंतु इधर-उधर देखकर फिर निद्रा में मग्‍न हो जाता है, उसी प्रकार पंडित कृष्‍णचन्‍द्र क्रोध और ग्‍लानि का आवेश शांत होने पर…
    • अध्याय 33 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन के विवाह का दिन आ गया। चुनार से बारात अमोला चली। उसकी तैयारियों का वर्णन करना व्‍यर्थ है। जैसी अन्‍य बारातें होती हैं, वैसी ही यह भी थी। वैभव और दरिद्रता का अत्‍यंत करुणात्‍मक दृश्‍य था।…
    • अध्याय 34 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — विट्ठलदास ने सुमन को विधवाश्रम में गुप्‍त रीति से रखा था। प्रबंधकारिणी सभा के किसी भी सदस्‍य को इत्तिला न दी थी। आश्रम की विधवाओं से उसे विधवा बताया था। लेकिन अबुलवफा जैसे टोहियों से यह बात बहुत…
    • अध्याय 35 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यद्यपि डॉक्‍टर साहब का बंगला निकट ही था, पर इन दोनों आदमियों ने एक किराए की गाड़ी की। डॉक्‍टर साहब के यहाँ पैदल जाना फैशन के विरुद्ध था। रास्‍ते में विट्ठलदास ने आज के सारे समाचार बढ़ा-चढ़ाकर बयान…
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