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    168 Results with the "Social drama" genre


    • उपसंहार Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कई साल बीत गए हैं। मुंशी वज्रधर नहीं रहे। घोड़े की सवारी का उन्हें बड़ा शौक था। नर घोड़े ही पर सवार होते थे। बग्घी, मोटर, पालकी इन सभी को वह जनानी सवारी कहते थे! एक दिन जगदीशपुर से बहुत रात गए लौट रहे…
    • अध्याय 9 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दूसरे दिन से सुमन ने चिक के पास खड़ा होना छोड़ दिया। खोंचेवाले आते और पुकार कर चले जाते। छैले गजल गाते हुए निकल जाते। चिक की आड़ में अब उन्‍हें कोई न दिखाई देता था। भोली ने कई बार बुलाया, लेकिन सुमन…
    • अध्याय 9 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — रानी देवप्रिया का सिर राजकुमार के पैरों पर था और आंखों से आंसू बह रहे थे। उनकी ओर ताकते हुए विचित्र भय हो रहा था। उसे कुछ-कुछ संदेह हो रहा था कि मैं सो तो नहीं रही हूँ। कोई मनुष्य माया के दुर्भद्य…
    • अध्याय 9 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — साड़ियाँ लौटा कर और कमलाप्रसाद को अप्रसन्न करके भी पूर्णा का मनोरथ पूरा न हो सका। वह उस संदेह को जरा भी न दूर कर सकी, जो सुमित्रा के हृदय पर किसी हिंसक पशु की भाँति आरूढ़ हो गया था। बेचारी दोनों तरफ से…
    • अध्याय 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गजाधरप्रसाद की दशा उस मनुष्‍य की-सी थी, जो चोरों के बीच में अशर्फियों की थैली लिए बैठा हो। सुमन का वह मुख-कमल, जिस पर वह कभी भौंरे की भांति मंडराया करता था, अब उसकी आंखों में जलती हुई आग के समान था। वह…
    • अध्याय 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जगदीशपुर की रानी देवप्रिया का जीवन केवल दो शब्दों में समाप्त हो जाता था-विनोद और विलास। इस वृद्धावस्था में भी उनकी विलास वृत्ति अणुमात्र भी कम न हुई थी। हमारी कर्मेन्द्रियां भले ही जर्जर हो जाएं,…
    • अध्याय 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — वैशाख में प्रेमा का विवाह दाननाथ के साथ हो गया। शादी बड़ी धूम-धाम से हुई। सारे शहर के रईसों को निमंत्रित किया। लाला बदरीप्रसाद ने दोनों हाथों से रुपए लुटाए। मगर दाननाथ की ओर से कोई तैयारी न थी।…
    • अध्याय 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन को ससुराल आए डेढ़ साल के लगभग हो चुका था, पर उसे मैके जाने का सौभाग्‍य न हुआ था। वहाँ से चिट्ठियां आती थीं। सुमन उत्तर में अपनी मां को समझाया करती, मेरी चिंता मत करना, मैं बहुत आनंद से हूँ, पर अब…
    • अध्याय 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — चक्रधर की कीर्ति उनसे पहले ही बनारस पहुँच चुकी थी। उनके मित्र और अन्य लोग उनसे मिलने के लिए उत्सुक हो रहे थे। बार-बार आते थे और पूछकर लौट जाते थे। जब वह पांचवें दिन घर पहुंचे, तो लोग मिलने और बधाई…
    • अध्याय 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लाला बदरीप्रसाद को दाननाथ का पत्र क्या मिला आघात के साथ ही अपमान भी मिला। वह अमृतराय की लिखावट पहचानते थे। उस पत्र की सारी नम्रता, विनय और प्रण, उस लिपि में लोप हो गए। मारे क्रोध के उनका मस्तिष्क…
    • अध्याय 6 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन के घर के सामने भोली नाम की एक वेश्‍या का मकान था। भोली नित नए श्रृंगार करके अपने कोठे के छज्‍जे पर बैठती। पहर रात तक उसके कमरे से मधुर गान की ध्‍वनि आया करती। कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया…
    • अध्याय 6 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मुंशी वज्रधर उन रेल के मुसाफिरों में थे, जो पहले तो गाड़ी में खड़े होने की जगह मांगते हैं, फिर बैठने की फिक्र करने लगते हैं और अंत में सोने की तैयारी कर देते हैं। चक्रधर एक बड़ी रियासत के दीवान की…
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