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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 6 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लाला बदरीप्रसाद के लिए अमृतराय से अब कोई संसर्ग रखना असंभव था, विवाह तो दूसरी बात थी। समाज में इतने घोर अनाचार का पक्ष ले कर अमृतराय ने अपने को उनकी नजरों से गिरा दिया। उनसे अब कोई संबंध करना…
    • अध्याय 57 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कार्तिक का महीना था। पद्मसिंह सुभद्रा को लेकर गंगा-स्‍नान कराने ले गए थे। लौटती बार वह अलईपुर की ओर से आ रहे थे। सुभद्रा गाड़ी की खिड़की से बाहर झांकती चली आती थी और सोचती थी कि यहाँ इस सन्‍नाटे…
    • अध्याय 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक सल बीत गया। पंडित मदनसिंह पहले तीर्थ यात्रा पर उधार खाए बैठे थे। जान पड़ता था, सदन के घर आते ही एक दिन भी न ठहरेंगे, सीधे बद्रीनाथ पहुँचकर दम लेंगे, पर जब से मदन आ गया है, उन्‍होंने भूलकर भी…
    • अध्याय 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शंखधर के चले आने के बाद चक्रधर को संसार शून्य जान पड़ने लगा। सेवा का वह पहला उत्साह लुप्त हो गया। उसी सुंदर युवक की सूरत आंखों में नाचती रहती। उसी की बातें कानों में गूंजा करतीं। भोजन करने बैठते,…
    • अध्याय 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्‍या का समय है। आकाश पर लालिमा छाई हुई है और मंद वायु गंगा की लहरों पर क्रीड़ा कर रही है, उन्‍हें गुदगुदा रही है। वह अपने करुण नेत्रों से मुस्‍कराती है और कभी-कभी खिलखिलाकर हंस पड़ती है, तब उसके…
    • अध्याय 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शंखधर राजकुमार होकर भी तपस्वी है। विलास की किसी भी वस्तु से उसे प्रेम नहीं। दूसरों से वह बहुत प्रसन्न होकर बातें करता है। अहिल्या और मनोरमा के पास वह घंटों बैठा गप-शप किया करता है। दादा और दादी के…
    • अध्याय 54 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जिस प्रकार कोई मनुष्‍य लोभ के वश होकर आभूषण चुरा लेता है, पर विवेक होने पर उसे देखने में भी लज्‍जा आती है, उसी प्रकार सदन भी सुमन से बचता फिर ता था। इतना ही नहीं, वह उसे नीची दृष्टि से देखता था और उसकी…
    • अध्याय 54 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राजा साहब को अब किसी तरह शांति न मिलती थी। कोई न कोई भयंकर विपत्ति आने वाली है, इस शंका को वह दिल से न निकाल सकते थे। दो-चार प्राणियों को जोर-जोर से बातें करते सुनकर वह घबरा जाते थे कि कोई दुर्घटना तो…
    • अध्याय 53 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित मदनसिंह की कई महीने तक यह दशा थी कि जो कोई उनके पास आता, उसी से सदन की बुराई करते-कपूत है, भ्रष्‍ट है, शोहदा है, लुच्‍चा है, एक कानी कौड़ी तो दूंगा नहीं, भीख मांगता फिरेगा, तब आटे-दाल का भाव मालूम…
    • अध्याय 53 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कई दिन गजर गए। राजा साहब हरिभजन और देवोपासना में व्यस्त थे। इधर पांच-छ: वर्षों से उन्होंने किसी मंदिर की तरफ झांका भी न था। धर्म-चर्चा का बहिष्कार-सा कर रखा था। रियासत में धर्म का खाता ही तोड़ दिया…
    • अध्याय 52 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित पद्मसिंह के चार-पांच मास के सदुद्योग का यह फल हुआ कि बीस-पच्‍चीस वेश्‍याओं ने अपनी लड़कियों को अनाथालय में भेजना स्‍वीकार कर लिया। तीन वेश्‍याओं ने अपनी सारी संपत्ति अनाथालय के निमित्त…
    • अध्याय 52 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मुंशी वज्रधर ने यह शुभ समाचार सुना, तो फौरन घोड़े पर सवार हुए और राजभवन आ पहुंचे। शंखधर उनके आने का समाचार पाकर नंगे पांव दौड़े और उनके चरणों को स्पर्श किया। मुंशीजी ने पोते को छाती से लगा लिया और…
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