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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 48 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक महीना बीत गया। सदन ने अपने इस नए धंधे की चर्चा घर में किसी से न की। वह नित्‍य सबेरे उठकर गंगा-स्‍नान के बहाने चला जाता। वहाँ से दस बजे घर आता। भोजन करके फिर चल देता और तब का गया-गया घड़ी रात गए, घर…
    • अध्याय 49 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू विट्ठलदास न्‍यायप्रिय सरल मनुष्‍य थे, जिधर न्‍याय खींच ले जाता, उधर चले जाते थे। इसमें लेश-मात्र भी संकोच न होता था। जब उन्‍होंने पद्मसिंह को न्‍यायपथ से हटते देखा, तो उनका साथ छोड़ दिया और कई…
    • अध्याय 50 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदनसिंह का विवाह संस्‍कार हो गया। झोंपड़ा खूब सजाया गया था। वही मंडप का काम दे रहा था, लेकिन कोई भीड़-भाड़ न थी। पद्मसिंह उस दिन घर चले गए और मदनसिंह से सब समाचार कहा। वह यह सुनते ही आग हो गए, बोले-मैं…
    • अध्याय 51 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जैसे सुंदर भाव के समावेश से कविता में जान पड़ जाती है और सुंदर रंगों से चित्र में, उसी प्रकार दोनों बहनों के आने से झोंपड़ी में जान आ गई है। अंधी आंखों में पुतलियां पड़ गई हैं। मुरझाई कली शान्‍ता अब…
    • अध्याय 52 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित पद्मसिंह के चार-पांच मास के सदुद्योग का यह फल हुआ कि बीस-पच्‍चीस वेश्‍याओं ने अपनी लड़कियों को अनाथालय में भेजना स्‍वीकार कर लिया। तीन वेश्‍याओं ने अपनी सारी संपत्ति अनाथालय के निमित्त…
    • अध्याय 53 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित मदनसिंह की कई महीने तक यह दशा थी कि जो कोई उनके पास आता, उसी से सदन की बुराई करते-कपूत है, भ्रष्‍ट है, शोहदा है, लुच्‍चा है, एक कानी कौड़ी तो दूंगा नहीं, भीख मांगता फिरेगा, तब आटे-दाल का भाव मालूम…
    • अध्याय 54 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जिस प्रकार कोई मनुष्‍य लोभ के वश होकर आभूषण चुरा लेता है, पर विवेक होने पर उसे देखने में भी लज्‍जा आती है, उसी प्रकार सदन भी सुमन से बचता फिर ता था। इतना ही नहीं, वह उसे नीची दृष्टि से देखता था और उसकी…
    • अध्याय 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्‍या का समय है। आकाश पर लालिमा छाई हुई है और मंद वायु गंगा की लहरों पर क्रीड़ा कर रही है, उन्‍हें गुदगुदा रही है। वह अपने करुण नेत्रों से मुस्‍कराती है और कभी-कभी खिलखिलाकर हंस पड़ती है, तब उसके…
    • अध्याय 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक सल बीत गया। पंडित मदनसिंह पहले तीर्थ यात्रा पर उधार खाए बैठे थे। जान पड़ता था, सदन के घर आते ही एक दिन भी न ठहरेंगे, सीधे बद्रीनाथ पहुँचकर दम लेंगे, पर जब से मदन आ गया है, उन्‍होंने भूलकर भी…
    • अध्याय 57 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कार्तिक का महीना था। पद्मसिंह सुभद्रा को लेकर गंगा-स्‍नान कराने ले गए थे। लौटती बार वह अलईपुर की ओर से आ रहे थे। सुभद्रा गाड़ी की खिड़की से बाहर झांकती चली आती थी और सोचती थी कि यहाँ इस सन्‍नाटे…
    • कायाकल्प · Kayakalp Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — महत्त्वाकांक्षा, प्रेम और आत्मिक परिवर्तन की उलझी हुई यात्रा। A richly layered novel of ambition, love and spiritual transformation.
    • अध्याय 1 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दोपहर का समय था; चारों तरफ अंधेरा था। आकाश में तारे छिटके हुए थे। ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था, मानो संसार से जीवन का लोप हो गया हो। हवा भी बंद हो गई थी। सूर्यग्रहण लगा हुआ था। त्रिवेणी के घाट पर…
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