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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 51 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जैसे सुंदर भाव के समावेश से कविता में जान पड़ जाती है और सुंदर रंगों से चित्र में, उसी प्रकार दोनों बहनों के आने से झोंपड़ी में जान आ गई है। अंधी आंखों में पुतलियां पड़ गई हैं। मुरझाई कली शान्‍ता अब…
    • अध्याय 51 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कमला को जगदीशपुर में आकर ऐसा मालूम हुआ कि वह एक युग के बाद अपने घर आई है। वहां की सभी चीजें, सभी प्राणी उसके जाने-पहचाने थे; पर अब उनमें कितना अंतर हो गया था। उसका विशाल नाचघर बिल्कुल बेमरम्मत पड़ा…
    • अध्याय 50 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदनसिंह का विवाह संस्‍कार हो गया। झोंपड़ा खूब सजाया गया था। वही मंडप का काम दे रहा था, लेकिन कोई भीड़-भाड़ न थी। पद्मसिंह उस दिन घर चले गए और मदनसिंह से सब समाचार कहा। वह यह सुनते ही आग हो गए, बोले-मैं…
    • अध्याय 50 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राजा विशालसिंह की हिंसा-वृत्ति किसी प्रकार शांत न होती थी। ज्यों-ज्यों अपनी दशा पर उन्हें दुःख होता था, उनके अत्याचार और भी बढ़ते थे। उनके हृदय में अब सहानुभूति, प्रेम और धैर्य के लिए जरा भी स्थान…
    • अध्याय 5 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — फागुन में सुमन का विवाह हो गया। गंगाजली दामाद को देखकर बहुत रोई। उसे ऐसा दु:ख हुआ, मानो किसी ने सुमन को कुएं में डाल दिया। सुमन ससुराल आई तो यहाँ की अवस्‍था उससे भी बुरी पाई, जिसकी उसने कल्‍पना की…
    • अध्याय 5 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्या समय जब रेलगाड़ी बनारस से चली तो यशोदानंदन ने चक्रधर से पूछा-क्यों भैया, तुम्हारी राय में झूठ बोलना किसी दशा में क्षम्य है या नहीं? चक्रधर ने विस्मित होकर कहा-मैं तो समझता हूँ,…
    • अध्याय 5 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पूर्णा को अपने घर से निकलते समय बड़ा दुःख होने लगा। जीवन के तीन वर्ष इसी घर में काटे थे। यहीं सौभाग्य के सुख देखे, यहीं वैधव्य के दुःख भी देखे। अब उसे छोड़ते हुए हृदय फट जाता था। जिस समय चारों कहार…
    • अध्याय 49 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू विट्ठलदास न्‍यायप्रिय सरल मनुष्‍य थे, जिधर न्‍याय खींच ले जाता, उधर चले जाते थे। इसमें लेश-मात्र भी संकोच न होता था। जब उन्‍होंने पद्मसिंह को न्‍यायपथ से हटते देखा, तो उनका साथ छोड़ दिया और कई…
    • अध्याय 49 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गाड़ी अंधकार को चीरती हुई चली जाती थी। सहसा शंखधर हर्षपुर' का नाम सुनकर चौंक पड़ा। वह भूल गया, मैं कहाँ जा रहा हूँ, किस काम से जा रहा हूँ और मेरे रुक जाने से कितना बड़ा अनर्थ जो जाएगा? किसी अज्ञात…
    • अध्याय 48 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक महीना बीत गया। सदन ने अपने इस नए धंधे की चर्चा घर में किसी से न की। वह नित्‍य सबेरे उठकर गंगा-स्‍नान के बहाने चला जाता। वहाँ से दस बजे घर आता। भोजन करके फिर चल देता और तब का गया-गया घड़ी रात गए, घर…
    • अध्याय 48 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — अहिल्या के आने की खबर पाकर मुहल्ले की सैकड़ों औरतें टूट पड़ी। शहर के बड़े-बड़े घरों की स्त्रियां भी आ पहुंची। शाम तक तांता लगा रहा। कुछ लोग डेपुटेशन बनाकर संस्थाओं के लिए चंदै मांगने आ पहुंचे।…
    • अध्याय 47 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रभाकर राव का क्रोध बहुत कुछ तो सदन के लेखों से ही शांत हो गया था और जब पद्मसिंह ने सदन के आग्रह से सुमन का पूरा वृतांत उन्‍हें लिख भेजा, तो वह सावधान हो गए। म्‍युनिसिपैलिटी में प्रस्‍ताव को पास…
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