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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 47 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक महीना पूरा गुजर गया और न अहिल्या ही आई, न कोई दूसरा ही। शंखधर दिन भर उसकी बाट जोहता रहता। रेल का स्टेशन वहां से पांच मील पर था। रास्ता भी साफ था फिर भी कोई नहीं आया। चक्रधर जब कहीं चले जाते, तो वह…
    • अध्याय 46 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन को ऐसी ग्‍लानि हो रही थी, मानों उसने कोई बड़ा पाप किया हो 1 वह बार-बार अपने शब्‍दों पर विचार करता और यही निश्‍चय करता कि मैं बड़ा निर्दय हूँ। प्रेमाभिलाषा ने उसे उन्‍मत्‍त कर दिया था। वह सोचता,…
    • अध्याय 46 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शंखधर को अपने पिता के साथ रहते एक महीना हो गया। न वह जाने का नाम लेता है, न चक्रधर ही जाने को कहते हैं। शंखधर इतना प्रसन्नचित्त रहता है, मानो अब उसके सिवा संसार में कोई दु:ख, कोई बाधा नहीं है। इतने ही…
    • अध्याय 45 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन जब सुमन को देखकर लौटा, तो उसकी दशा उस दरिद्र मनुष्‍य की-सी थी, जिसका वर्षों का धन चोरों ने हर लिया हो। वह सोचता था, सुमन मुझसे बोली क्‍यों नहीं,उसने मेरी ओर ताका क्‍यों नहीं? क्‍या वह मुझे इतना नीच…
    • अध्याय 45 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राजा विशालसिंह ने जिस हौसले से अहिल्या का गौना किया, वह राजाओं-रईसों में भी बहुत कम देखने में आता है। तहसीलदार साहब के घर में इतनी चीजों के रखने की जगह भी न थी। बर्तन, कपड़े, शीशे के समान, लकड़ी की…
    • अध्याय 44 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पद्मसिंह की आत्‍मा किसी भांति इस तरमीम के स्‍वीकार करने में अपनी भूल स्‍वीकार न करती थी। उन्‍हें कदापि यह आशा न थी कि उनके मित्रगण एक गौण बात पर उनका इतना विरोध करेंगे। उन्‍हें प्रस्‍ताव के एक…
    • अध्याय 44 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शंखधर को होश आया, तो अपने को मंदिर के बरामदे में चक्रधर की गोद में पड़ा हुआ पाया। चक्रधर चिंतित नेत्रों से उसके मुंह की ओर ताक रहे थे। गांव के कई आदमी आस-पास खड़े पंखा झल रहे थे। आह ! आज कितने दिनों के…
    • अध्याय 43 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शान्‍ता को आश्रम में आए एक मास से ऊपर हो गया, लेकिन पद्मसिंह ने अभी तक अपने घर में किसी से इसकी चर्चा नहीं की। कभी सोचते, भैया को पत्र लिखूं, कभी सोचते, चलकर उनसे कहूँ, कभी विट्ठलदास को भेजने का विचार…
    • अध्याय 43 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — अभागिनी अहिल्या के लिए संसार सूना हो गया। पति को पहले ही खो चुकी थी। जीवन का एकमात्र आधार पुत्र रह गया था, उसे भी खो बैठी। अब वह किसका मुंह देखकर जिएगी। वह राज्य उसके लिए किसी ऋषि का अभिशाप हो गया।…
    • अध्याय 42 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शान्‍ता ने पत्र भेजा, पर उसको उत्तर आने की कोई आशा न थी। तीन दिन बीत गए, उसका नैराश्‍य दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था। अगर कुछ अनुकूल उत्तर न आया, तो उमानाथ अवश्‍य ही उसका विवाह कर देंगे, यह सोचकर शान्‍ता…
    • अध्याय 42 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — रात्रि के उस अगम्य अंधकार में शंखधर भागा चला जा रहा था! उसके पैर पत्थर के टुकड़ों से चलनी हो गए थे। सारी देह थककर चूर हो गई थी, भूख के मारे आंखों के सामने अंधेरा छाया जाता था, प्यास के मारे कंठ में…
    • अध्याय 41 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जब हम स्‍वास्थ्य-लाभ करने के लिए किसी पहाड़ पर जाते हैं, तो इस बात का विशेष यत्‍न करते हैं कि हमसे कोई कुपथ्‍य न हो। नियमित रूप से व्‍यायाम करते हैं, आरोग्‍य का उद्देश्‍य सदैव हमारे सामने रहता है।…
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