168 Results with the "Social drama" genre
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Chapter
अध्याय 41
पांच वर्ष व्यतीत हो गए! पर न शंखधर का कहीं पता चला, न चक्रधर का। राजा विशालसिंह ने दया और धर्म को तिलांजलि दे दी है और खूब दिल खोलकर अत्याचार कर रहे हैं। दया और धर्म से जो कुछ होता है, उसका अनुभव करके…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 40
पद्मसिंह का पहला विवाह उस समय हुआ था, जब वह कॉलेज में पढ़ते थे, और एम.ए. पास हुए, तो वह एक पुत्र के पिता थे। पर बालिका वधू शिशु-पालन का मर्म न जानती थी। बालक जन्म के समय तो ह्रष्ट-पुष्ट था, पर पीछे…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 40
रोहिणी के बाद राजा जगदीशपुर न रह सके। मनोरमा का भी जी वहां घबराने लगा। उसी के कारण मनोरमा को वहां रहना पड़ता था। जब वही न रही, तो किस पर रीस करती? उसे अब दुःख होता था कि मैं नाहक यहां आई। रोहिणी के कटु…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 4
कृष्णचन्द्र अपने कस्बे में सर्वप्रिय थे। यह खबर फैलते ही सारी बस्ती में हलचल मच गई। कई भले आदमी उनकी जमानत कराने आए, लेकिन साहब ने जमानत नहीं ली। इसके एक सप्ताह बाद कृष्णचन्द्र पर रिश्वत…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 4
चक्रधर डरते हुए घर पहुंचे, तो क्या देखते हैं कि द्वार पर चारपाई पड़ी हुई है; उस पर कालीन बिछी हुई है और एक अधेड़ उम्र के महाशय उस पर बैठे हुए हैं। उनके सामने ही एक कुर्सी पर मुंशी वज्रधर बैठे फर्शी पी…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 4
लाला बदरीप्रसाद की सज्जनता प्रसिद्ध थी। उनसे ठग कर तो कोई एक पैसा भी न ले सकता था, पर धर्म के विषय में वह बड़े ही उदार थे। स्वार्थियों से वह कोसों भागते थे, पर दीनों की सहायता करने में भी न चूकते थे।…-
81.6 K • Completed
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Chapter
अध्याय 39
प्रात:काल यह शोक-समाचार अमोला में फैला गया। इने-गिने सज्जनों को छोड़कर कोई भी उमानाथ के दूर पर समवेदना प्रकट करने न आया। स्वाभाविक मृत्यु हुई होती, तो संभवत: उनके शत्रु भी आकर चार आंसू बहा जाते,…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 39
रानी वसुमती बहुत दिनों से स्नान, व्रत, ध्यान तथा कीर्तन में मग्न रहती थीं, रियासत से उन्हें कोई सरोकार ही न था। भक्ति ने उनकी वासनाओं को शांत कर दिया था। बहुत सूक्ष्म आहार करती और वह भी केवल एक बार।…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 38
जिस दिन से बारात लौट गई, उसी दिन से कृष्णचन्द्र फिर घर से बाहर नहीं निकले। मन मारे हुए अपने कमरे में बैठे रहते। उन्हें अब किसी को अपना मुँह दिखाते लज्जा आती थी। दुश्चरित्रा सुमन ने उन्हें…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 38
ठाकुर हरिसेवकसिंह का क्रिया-कर्म हो जाने के बाद एक दिन लौंगी ने अपना कपड़ा-लत्ता बांधना शुरू किया। उसके पास रुपए-पैसे जो कुछ थे, सब गुरुसेवक को सौंपकर बोली-भैया, अब किसी गांव में जाकर रहूँगी, यहां…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 37
सदन को व्याख्यानों की ऐसी चाट पड़ी कि जहां कहीं व्याख्यान की खबर पाता, वहाँ अवश्य जाता। दोनों पक्षों की बातें महीनों सुनने और उन पर विचार करने से उसमें राय स्थिर करने की योग्यता आने लगी। अब…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 37
जगदीशपुर के ठाकुरद्वारे में नित्य साधु-महात्मा आते रहते थे। शंखधर उनके पास जा बैठता और उनकी बातें बड़े ध्यान से सुनता। उसके पास चक्रधर की जो तस्वीर थी, उससे मन-ही-मन साधुओं की सूरत का मिलान करता,…-
258.1 K • Completed
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