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    168 Results with the "Social drama" genre


    • कायाकल्प · Kayakalp Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — महत्त्वाकांक्षा, प्रेम और आत्मिक परिवर्तन की उलझी हुई यात्रा। A richly layered novel of ambition, love and spiritual transformation.
    • प्रतिज्ञा · Pratigya Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक प्रतिज्ञा से बदलते संबंध और समाज की रूढ़ियों से टकराती मानवीय संवेदनाएँ। A promise tests friendship, marriage and the possibilities of social reform.
    • कंकाल · Kankal Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — धार्मिक आडंबर, छिपे संबंध और समाज की कठोर सीमाओं को परखता उपन्यास। A probing social novel of concealed identities and the gap between virtue and convention.
    • सेवासदन · Sevasadan Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन की कहानी के माध्यम से विवाह, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री की स्वतंत्रता पर एक मार्मिक उपन्यास। A searching portrait of marriage, respectability and a woman’s struggle for agency.
    • खंड 3 · अध्याय 6 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — शीतकाल के वृक्षों से छनकर आती हुई धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। नये पैरों पर पैर धरे, चुपचाप गाला की दी हुई, चमड़े से बँधी एक छोटी-सी पुस्तक को आश्चर्य से देख रहा था। वह प्राचीन नागरी में लिखी हुई थी।…
    • खंड 3 · अध्याय 7 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — सीकरी की बस्ती से कुछ हटकर के ऊँचे टीले पर फूस का बड़ा-सा छप्पर पड़ा है और नीचे कई चटाइयाँ पड़ी हैं। एक चौकी पर मंगलदेव लेटा हुआ, सवेरे की-छप्पर के नीचे आती हुई-शीतकाल की प्यारी धूप से अपनी पीठ में…
    • खंड 4 · अध्याय 1 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — वह दरिद्रता और अभाव के गार्हस्थ्य जीवन की कटुता में दुलारा गया था। उसकी माँ चाहती थी कि वह अपने हाथ से दो रोटी कमा लेने के योग्य बन जाए, इसलिए वह बार-बार झिड़की सुनता। जब क्रोध से उसके आँसू निकलते और…
    • खंड 4 · अध्याय 2 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — मंगलदेव की पाठशाला में अब दो विभाग हैं-एक लड़कों का, दूसरा लड़कियों का। गाला लड़कियों की शिक्षा का प्रबन्ध करती। अब वह एक प्रभावशाली गम्भीर युवती दिखलाई पड़ती, जिसके चारों ओर पवित्रता और…
    • खंड 4 · अध्याय 3 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — एक दिन सवेरे की गाड़ी से वृन्दावन के स्टेशन पर नन्दो और घण्टी उतरीं। बाथम स्टेशन के समीप ही सड़क पर ईसाई-धर्म पर व्याख्यान दे रहा था- 'यह देवमन्दिरों की यात्राएँ तुम्हारे मन में क्या भावा लाती…
    • खंड 4 · अध्याय 4 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — कृष्णशरण की टेकरी ब्रज-भर में कुतूहल और सनसनी का केन्द्र बन रही थी। निरंजन के सहयोग से उसमें नवजीवन का संचार होने लगा, कुछ ही दिनों से सरला और लतिका भी उस विश्राम-भवन में आ गयी थीं। लतिका बड़े चाव से…
    • खंड 4 · अध्याय 5 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — कई दिन हो गये थे। मंगल नहीं था। अकेले गाला उस पाठशाला का प्रबन्ध कर रही थी। उसका जीवन उसे नित्य बल दे रहा था, पर उसे कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता कि उसने कोई वस्तु खो दी है। इधर एक पंडितजी उस पाठशाला में…
    • खंड 4 · अध्याय 6 Cover
      by जयशंकर प्रसाद · Jaishankar Prasad — जज के साथ पाँच जूरी बैठे थे। सरकारी वकील ने अपना वक्तव्य समाप्त करते हुए कहा, 'जूरी सज्जनों से मेरी प्रार्थना है कि अपना मत देते हुए वे इस बात का ध्यान रखें कि वे लोग हत्या जैसे एक भीषण अपराध पर…
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