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    Novel Grove

    Stories 15
    Chapters 372
    Words 1.3 M
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    Reading 4 days, 8 hours4 d, 8 h
    • अध्याय 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — महाशय विट्ठलदास इस समय ऐसे खुश थे मानो उन्‍हें कोई संपत्ति मिल गई हो। उन्‍हें विश्‍वास था कि पद्मसिंह इस जरा से कष्‍ट से मुँह न मोड़ेंगे, केवल उनके पास जाने की देर है। वह होली के कई दिन पहले से…
    • अध्याय 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्‍या का समय है। सदन अपने घोड़े पर सवार दालमंडी में दोनों तरफ छज्‍जों और खिड़कियों की ओर ताकता जा रहा है। जब से सुमन वहाँ आई है, सदन उसके छज्‍जे के सामने किसी-न-किसी बहाने से जरा देर के लिए अवश्‍य…
    • अध्याय 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू विट्ठलदास अधूरा काम न करते थे। पद्मसिंह की ओर से निराश होकर उन्‍हें यह चिंता होने लगी कि सुमनबाई के लिए पचास रुपये मासिक का चंदा कैसे करूं? उनकी स्‍थापित की हुई संस्‍थाएं चंदों ही से चल रही…
    • अध्याय 19 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शाम हो गई। सुमन ने दिन-भर विट्ठलदास की राह देखी, लेकिन वह अब तक नहीं आए। सुमन के मन में जो नाना प्रकार की शंकाएं उठ रही थीं, वह पुष्‍ट हो गई। विट्ठलदास अब नहीं आएंगे, अवश्‍य कोई विघ्‍न पड़ा। या तो वह…
    • अध्याय 20 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुभद्रा को संध्‍या के समय कंगन की याद आई। लपकी हुई स्‍नान-घर में गई। उसे खूब याद था कि उसने यहीं ताक पर रख दिया था, लेकिन उसका वहाँ पता न था। इस पर वह घबराई। अपने कमरे के प्रत्‍येक ताक और आलमारी को…
    • अध्याय 21 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — विट्ठलदास को संदेह हुआ कि सुमन तीस रुपये मासिक स्‍वीकार करना नहीं चाहती, इसलिए उसने कल उत्तर देने का बहाना करके मुझे टाला है। अतएव वे दूसरे दिन उसके पास नहीं गए, इसी चिंता में पड़े रहे कि शेष…
    • अध्याय 22 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन पार्क से लौटी तो उसे खेद होने लगा कि मैंने शर्माजी को वे ही दुखानेवाली बातें क्‍यों कहीं? उन्‍होंने इतनी उदारता से मेरी सहायता की, जिसका मैंने यह बदला दिया? वास्‍तव में मैंने अपनी दुर्बलता का…
    • अध्याय 23 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन प्रात:काल घर गया, तो अपनी चाची के हाथ में कंगन देखा। लज्‍जा से उसकी आंखें जमीन में गड़ गईं। नाश्‍ता करके जल्‍दी से बाहर निकल आया और सोचने लगा, यह कंगन इन्‍हें कैसे मिल गया? क्‍या यह संभव है कि…
    • अध्याय 24 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह बात बिलकुल तो असत्‍य नहीं है कि ईश्‍वर सबको किसी-न-किसी हीले से अन्‍न-वस्‍त्र देता है। पंडित उमानाथ बिना किसी हीले ही के संसार का सुख-भोग करते थे। उनकी आकाशी वृत्ति थी। उनके भैंस और गाएं न थीं,…
    • अध्याय 25 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सार्वजनिक संस्‍थाएं भी प्रतिभाशाली मनुष्‍य की मोहताज होती हैं। यद्यपि विट्ठलदास के अनुयायियों की कमी न थी, लेकिन उनमें प्राय: सामान्‍य अवस्‍था के लोग थे। ऊंची श्रेणी के लोग उनसे दूर भागते थे।…
    • अध्याय 26 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — रात के नौ बजे थे। पद्मसिंह भाई के साथ बैठे हुए विवाह के संबंध में बातचीत कर रहे थे। कल बारात जाएगी। दरवाजे पर शहनाई बज रही थी और भीतर गाना हो रहा था। मदनसिंह-तुमने जो गाड़ियां भेजी हैं; वह कल शाम तक…
    • अध्याय 27 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बरसात के दिन थे, घटा छाई हुई थी। पंडित उमानाथ चुनारगढ़ के निकट गंगा के तट पर खड़े नाव की बाट जोह रहे थे। वह कई गांवों का चक्‍कर लगाते हुए आ रहे थे और संध्‍या होने से पहले चुनार के पास एक गांव में जाना…
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