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    सुमन पार्क से लौटी तो उसे खेद होने लगा कि मैंने शर्माजी को वे ही दुखानेवाली बातें क्‍यों कहीं? उन्‍होंने इतनी उदारता से मेरी सहायता की, जिसका मैंने यह बदला दिया? वास्‍तव में मैंने अपनी दुर्बलता का अपराध उनके सिर मढ़ा। संसार में घर-घर नाच-गाना हुआ करता है, छोटे-बड़े, दीन-दु:खी सब देखते हैं और आनंद उठाते हैं। यदि मैं अपनी कुचेष्‍टाओं के कारण आग में कूद पड़ी, तो उसमें शर्माजी का या किसी और का क्‍या दोष? बाबू विट्ठलदास शहर के आदमियों के पास दौड़े, क्‍या वह उन सेठों के पास न गए होंगे तो यहाँ आते हैं? लेकिन किसी ने उनकी मदद न की, क्‍यों? इसलिए न की कि वह नहीं चाहते हैं कि मैं यहाँ से मुक्‍त हो जाऊं। मेरे चले जाने से उनकी काम-तृष्‍णा में विघ्‍न पड़ेगा। वह दयाहीन व्‍याघ्र के समान मेरे ह्रदय को घायल करके मेरे तड़पने का आनंद उठाना चाहते हैं। केवल एक ही पुरुष है, जिसने मुझे इस अंधकार से निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, उसी का मैंने इतना अपमान किया।

    मुझे मन में कितना कृतघ्‍न समझेंगे। वे मुझे देखते ही कैसे भागे, चाहिए तो यह था कि मैं लज्‍जा से वहीं गड़ जाती, केवल मैंने इस पापभय के लिए इतनी निर्लज्‍जता से उनका तिरस्‍कार किया ! जो लोग अपने कलुषित भावों से मेरे जीवन को नष्ट कर रहे हैं, उनका मैं इतना आदर करती हूँ ! लेकिन जब व्‍याध पक्षी को अपने जाल में फंसते नहीं देखता, तो वह अन्‍य बालकों को दौड़-दौड़कर छूना चाहता है, जिससे वह भी अपवित्र हो जाएं। क्‍या मैं भी ह्रदय शून्‍य व्‍याध हूँ या अबोध बालक?

    किसी ग्रंथकार से पूछिए कि वह एक निष्‍पक्ष समालोचक के कटुवाक्‍यों के सामने विचारहीन प्रशंसा का क्‍या मूल्‍य समझता है। सुमन को शर्माजी की यह घृणा अन्‍य प्रेमियों की रसिकता से अधिक प्रिय मालूम होती थी।

    रात-भर वह इन्‍हीं विचारों में डूबी रही। मन में निश्‍चयकर लिया कि प्रात: काल विट्ठलदास के पास चलूंगी और उनसे कहूँगी कि मुझे आश्रय दीजिए। मैं आपसे कोई सहायता नहीं चाहती,केवल एक सुरक्षित स्‍थान चाहती हूँ। चक्‍की पीसूंगी, कपड़े सीऊंगी और किसी तरह अपना निर्वाह कर लूंगी।

    सबेरा हुआ। वह उठी और विट्ठलदास के घर चलने की तैयारी करने लगी कि इतने में वह स्‍वंय आ पहुँचे। सुमन को ऐसा आनंद हुआ, जैसे किसी भक्‍त को आराध्‍यदेव के दर्शन से होता है। बोली-आइए महाशय। मैं कल दिन-भर आपकी राह देखती रही। इस समय आपके यहाँ जाने का विचार कर रही थी।

    विट्ठलदास-कल कई कारणों से नहीं आ सका।

    सुमन-तो आपने मेरे रहने का कोई प्रबंध किया?

    विट्ठलदास-मुझसे तो कुछ नहीं हो सका, लेकिन पद्मसिंह ने लाज रख ली। उन्‍होंने तुम्‍हारा प्रण पूरा कर दिया। वह अभी मेरे पास आए थे और वचन दे गए हैं कि तुम्‍हें पचास रुपये मासिक आजन्‍म देते रहेंगे।

    सुमन के विस्‍मयपूर्ण नेत्र सजल हो गए। शर्माजी की इस महती उदारता ने उसके अंत:करण को भक्ति, श्रद्धा और विमल प्रेम से प्‍लावित कर दिया। उसे अपने कटु वाक्‍यों पर अत्‍यंत क्षोभ हुआ। बोली-शर्माजी दया और धर्म के सागर हैं। इस जीवन में उनसे उऋण नहीं हो सकती। ईश्‍वर उन्‍हें सदैव सुखी रखें लेकिन मैंने उस समय जो कुछ कहा था, वह केवल परीक्षा के लिए था। मैं देखना चाहती थी कि सचमुच मुझे उबारना चाहते हैं या केवल धर्म का शिष्‍टाचार कर रहे हैं। अब मुझे विदित हो गया कि आप दोनों सज्‍जन देवरूप हैं। आप लोगों को वृथा कष्‍ट नहीं देना चाहती। मैं सहानुभूति की भूखी थी, वह मुझे मिल गई। अब मैं अपने जीवन का भार आप लोगों पर नहीं डालूंगी। आप केवल मेरे रहने का कोई प्रबंध कर दें, जहां मैं विघ्‍न-बाधा से बची रह सकूं।

    विट्ठलदास चकित हो गए। जातीय गौरव से आंखें चमक उठीं। उन्‍होंने सोचा, हमारे देश की पतित स्त्रियों के विचार भी ऐसे उच्‍च होते हैं। बोले-सुमन, तुम्‍हारे मुँह से ऐसे पवित्र शब्‍द सुनकर मुझे इस समय जो आनंद हो रहा है, उसका वर्णन नहीं कर सकता। लेकिन रुपयों के बिना तुम्‍हारा निर्वाह कैसे होगा?

    सुमन-मैं परिश्रम करूंगी। देश में लाखों दुखियाएं हैं, उनका ईश्‍वर के सिवा और कौन सहायक है? अपनी निर्लज्‍जता का कर आपसे न लूंगी।

    विट्ठलदास-वे कष्‍ट तुमसे सहे जाएंगे?

    सुमन-पहले नहीं सहे जाते थे, लेकिन अब सब कुछ सह लूंगी। यहाँ आकर मुझे मालूम हो गया कि निर्लज्‍जता सब कष्‍टों से दुस्‍सह है। और कष्‍टों से शरीर को दु:ख होता है, इस कष्‍ट से आत्‍मा का संहार हो जाता है। मैं ईश्‍वर को धन्‍यवाद देती हूँ कि उसने आप लोगों को मेरी रक्षा के लिए भेज दिया।

    विट्ठलदास-सुमन, तुम वास्‍तव में विदुषी हो।

    सुमन-तो मैं यहाँ से कब चलूं?

    विट्ठलदास-आज ही। अभी मैंने आश्रम की कमेटी में तुम्‍हारे रहने का प्रस्‍ताव नहीं किया है, लेकिन कोई हरज नहीं है, तुम वहाँ चलो, ठहरो। अगर कमेटी ने कुछ आपत्ति की तो देखा जाएगा। हां, इतना याद रखना कि अपने विषय में किसी से कुछ मत कहना,नहीं तो विधवाओं में हलचल मच जाएगी।

    सुमन-आप जैसा उचित समझें करें, मैं तैयार हूँ।

    विट्ठलदास-संध्‍या समय चलना होगा।

    विट्ठलदास के जाने के थोड़ी ही देर बाद दो वेश्‍याएं सुमन से मिलने आईं। सुमन ने कह दिया, मेरे सिर में दर्द है। सुमन अपने ही हाथ से भोजन बनाती थी। पतित होकर भी वह खान-पान में विचार करती थी। आज उसने व्रत करने का निश्‍चय किया था। मुक्ति के दिन कैदियों को भी भोजन अच्‍छा नहीं लगता।

    दोपहर दो धाड़ियों का गोल आ पहुंचा। सुमन ने उन्‍हें भी बहान करके टाला। उसे अब उनकी सूरत से घृणा होती थी। सेठ वलभद्रदास के यहाँ से नागपुरी संतरे की एक टोकरी आई, उसे सुमन ने तुरंत लौटा दिया। चिम्‍मनलाल ने चार बजे अपनी फिटन सुमन के सैर करने को भेजी। उसको भी लौटा दिया।

    जिस प्रकार अंधकार के बाद अरुण का उदय होते ही पक्षी कलरव करने लगते हैं और बछड़े किलोलों में मगन हो जाते हैं, उसी प्रकार सुमन के मन में भी क्रीड़ा करने की प्रबल इच्‍छा हुई। उसने सिगरेट की एक डिबिया मंगवाई और वार्निश की एक बोतल मंगवाकर ताक पर रख दी और एक कुर्सी का एक पया तोड़कर कुर्सी छज्‍जे पर दीवार के सहारे रख दी। पांच बजते-बजते मुंशी अबुलवफा का आगमन हुआ। यह हजरत सिगरेट बहुत पीते थे। सुमन ने आज असाधारण रीति से उनकी आवभगत की और इधर-उधर की बातें करने के बाद बोली-आइए, आज आपको वह सिगरेट पिलाऊं कि आप भी याद करें।

    अबुलवफा-नेकी और पूछ-पूछ !

    सुमन-देखिए, एक अंग्रेजी दुकान से खास आपकी खातिर मंगवाया है। यह लीजिए।

    अबुलवफा-तब तो मैं भी अपना शुमार खुशनसीबों में करूंगा। वाह रे मैं, वाह रे मेरे साजे जिगर की तासीर।

    अबुलवफा ने सिगरेट मुँह में दबाया। सुमन ने दियासलाई की डिबिया निकाल कर एक सलाई रगड़ी। अबुलवफा ने सिगरेट को जलाने के लिए मुँह आगे बढ़ाया, लेकिन न मालूम कैसे आग सिगरेट में न लगकर उनकी दाढ़ी में लग गई। जैसे पुआल जलता है, उसी तरह एक क्षण में दाढ़ी आधी से ज्‍यादा जल गई, उन्‍होंने सिगरेट फेंककर दोनों हाथों से दाढ़ी मलना शुरू किया। आग बुझ गई, मगर दाढ़ी का सर्वनाश हो चुका था। आईने में लपककर मुँह देखा। दाढ़ी का भस्‍मावशेष उबाली हुई सुथनी के रेशे की तरह मालूम हुआ। सुमन ने लज्जित होकर कहा-मेरे हाथों में आग लगे। कहां-से-कहां मैंने दियासलाई जलाई।

    उसने बहुत रोका,पर हंसी ओठ पर आ गई। अबुलवफा ऐसे खिसियाए हुए थे, मानों अब वह अनाथ हो गए। सुमन की हंसी अखर गई। उस भोंड़ी सूरत पर खेद और खिसियाहट का अपूर्व दृश्‍य था। बोले-यह कब की कसर निकाली?

    सुमन-मुंशीजी, मैं सच कहती हूँ, यह दोनों आंखें फूट जाएं अगर मैंने जान-बूझकर आग लगाई हो। आपसे बैर भी होता, तो दाढ़ी बेचारी ने मेरा क्‍या बिगाड़ा था? अबुलवफा-माशूकों की शोखी और शरारत अच्‍छी मालूम होती है, लेकिन इतनी नहीं कि मुँह जला दें। अगर तुमने आग से कहीं दाग दिया होता, तो इससे अच्‍छा था। अब यह भुन्‍नस की-सी सूरत लेकर मैं किसे मुँह दिखाऊंगा? वल्‍लाह ! आज तुमने मटियामेंट कर‍ दिया।

    सुमन-क्‍या करूं, खुद पछता रहीं हूँ। अगर मेरे दाढ़ी होती तो आपको दे देती क्‍यों,नकली दाढ़ियां भी तो मिलती हैं?

    अबुलवफा-सुमन, जख्‍म पर नमक न छिड़को। अगर दूसरे ने यह हरकत की होती, तो आज उसका खून पी जाता।

    सुमन-अरे, तो थोड़े-से बाल ही जल गए न और कुछ। महीने-दो-महीने में फिर निकल आएंगे। जरा-सी बात के लिए आप इतनी हाय-हाय मचा रहे हैं।

    अबुलवफा-सुमन, जलाओ मत, नहीं तो मरी जबान से भी कुछ निकल जाएगा। मैं इस वक्‍त आप में नहीं हूँ।

    सुमन-नारायण, नारायण, जरा-सी दाढ़ी पर इतने जामे के बाहर हो गए ! मान लीजिए, मैंने जानकर ही दाढ़ी जला दी तो? आप मेरी आत्‍मा को, मेरे धर्म को, मेरे ह्रदय को रोज जलाते हैं,क्‍या उनका मूल्‍य आपकी दाढ़ी से कम है? मियां आशिक बनना मुँह का नेवाला नहीं है। जाइए, अपने घर की राह लीजिए, अब कभी यहाँ न आइएगा। मुझे ऐसे छिछोरे आदमियों की जरूरत नहीं है।

    अबुलवफा ने क्रोध से सुमन की ओर देखा, तब जेब से रूमाल निकाला और जली हुई दाढ़ी को उसकी आड़ में छिपाकर चुपके से चले गए। यह वही मनुष्‍य है, जिसे खुले बाजार एक वेश्‍या के साथ आमोद-प्रमोद में लज्‍जा नहीं आती थी।

    अब सदन के आने का समय हुआ। सुमन आज उससे मिलने के लिए बहुत उत्‍कंठित थी। आज यह अंतिम मिलाप होगा। आज यह प्रेमाभिनय समाप्‍त हो जाएगा। वह मोहिनी-मूर्ति फिर देखने को न मिलेगी। उनके दर्शनों को नेत्र तरस-तरस रहेंगे। वह सरल प्रेम से भरी हुई मधुर बातें सुनने में न आएंगी। जीवन फिर प्रेमविहीन और नीरस हो जाएगा। कलुषित सही, पर यह प्रेम सच्‍चा था। भगवान्, मुझे यह वियोग सहने की शक्ति दीजिए। नहीं, इस समय सदन न आए तो अच्‍छा है, उससे न मिलने में ही कल्‍याण है। कौन जाने उसके सामने मेरा संकल्‍प स्थिर रह सकेगा या नहीं। पर वह आ जाता तो एक बार दिल खोलकर उससे बातें कर लेती, उसे इस कपट सागर में डूबने से बचाने की चेष्‍टा करती।

    इतने में सुमन ने विट्ठलदास को एक किराये की गाड़ी में से उतरते देखा। उसका ह्रदय वेग से धड़कने लगा।

    एक क्षण में विट्ठलदास ऊपर आ गए और बोले-अरे, अभी तुमने कुछ तैयारी नहीं की।

    सुमन-मैं तैयार हूँ।

    विट्ठलदास-अभी बिस्‍तरे तक नहीं बंधे?

    सुमन-यहाँ की कोई वस्‍तु साथ न ले जाऊंगी, यह वास्‍तव में मेरा पुनर्जन्‍म हो रहा है।

    विट्ठलदास-इस सामान का क्‍या होगा?

    सुमन-आप इसे बेचकर किसी शुभ कार्य में लगा दीजिएगा।

    विट्ठलदास-अच्‍छी बात है, मैं यहाँ ताला डाल दूंगा। तो अब उठो, गाड़ी मौजूद है।

    सुमन-दस बजे से पहले नहीं चल सकती। आज मुझे अपने प्रेमियों से विदा होना हैं कुछ उनकी सुननी है, कुछ अपनी कहनी है। आप तब तक छत पर जाकर बैठिए, मुझे तैयार ही समझिए।

    विट्ठलदास को बुरा मालूम हुआ, पर धैर्य से काम लिया। ऊपर जाकर खुली हुई छत पर टहलने लगे।

    सात बज गए, लेकिन सदन न आया। आठ बजे तक सुमन उसकी राह देखती रही, अंत में वह निराश हो गई। जब से वह यहाँ आने लगा, आज ही उसने नागा किया। सुमन को ऐसा मालूम होता था, मानो वह किसी निर्जन स्‍थान में खो गई है। ह्रदय में एक अत्‍यंत तीव्र किंतु सरल, वेदनापूर्ण किंतु मनोहारी आकांक्षा का उद्वेग हो रहा था। मन पूछता था, उनके न आने का क्‍या कारण है? किसी अनिष्‍ट की आशंका ने उसे बेचैन कर दिया।

    आठ बजे सेठ चिम्‍मनलाल आए। सुमन उनकी गाड़ी देखते ही छज्‍जे पर जा बैठी। सेठजी बहुत कठिनाई से ऊपर आए और हांफते हुए बोले-कहां हो देवी, आज बग्‍घी क्‍यों लौटा दी? क्‍या मुझसे कोई खता हो गई?

    सुमन-यही छज्‍जे पर चले आइए, भीतर कुछ गर्मी मालूम होती है। आज सिर में दर्द था, सैर करने को जी नहीं चाहता था।

    चिम्‍मनलाल-हिरिया को मेरे यहाँ क्‍यों नहीं भेज दिया, हकीम साहब से कोई नुस्‍खा तैयार करा देता। उनके पास तेलों के अच्‍छे-अच्‍छे नुस्‍खे हैं।

    यह कहते हुए सेठजी कुर्सी पर बैठे, लेकिन तीन टांग की कुर्सी उलट गई, सेठजी का सिर नीचे हुआ और पैर ऊपर, और वह एक कपड़े की गांठ के समान औंधे मुँह लेट गए। केवल एक बार मुँह से 'अरे' निकला और फिर वह कुछ न बोले। जड़ ने चैतन्‍य को परास्‍त कर दिया।

    सुमन डरी कि चोट ज्‍यादा आ गई। लालटेन लाकर देखा,तो हंसी न रुक सकी।

    सेठजी ऐसे असाध्‍य पड़े थे, मानो पहाड़ से गिर पड़े हैं। पड़े-पड़े बोले-हाय राम, कमर टूट गई। जरा मेरे साईस को बुलवा दो, घर जाऊंगा।

    सुमन-चोट बहुत आ गई क्‍या? आपने भी तो कुर्सी खींच ली, दीवार से टिककर बैठते तो कभी न गिरते। अच्‍छा, क्षमा कीजिएगा, मुझी से भूल हुई कि आपको सचेत न कर दिया। लेकिन आप जरा भी न संभले, बस गिर ही पड़े।

    चिम्‍मनलाल-मेरी तो कमर टूट गई, और तुम्‍हें मसखरी सूझ रही है।

    सुमन-तो अब इसमें मेरा क्‍या वश है? अगर आप हल्‍के होते, तो उठाकर बैठा देती। जरा खुद ही जोर लगाइए, अभी उठ बैठिएगा।

    चिम्‍मनलाल-अब मेरा घर पहुँचना मुश्किल है। हाय ! किस बुरी साइत से चले थे, जीने पर से उतरने में पूरी सांसत हो जाएगी। बाईजी, तुमने यह कब का बैर निकाला?

    सुमन-सेठजी, मैं बहुत लज्जित हूँ।

    चिम्‍मनलाल-अजी रहने भी दो, झूठ-मूठ की बातें बनाती हो। तुमने मुझे जानकर गिराया।

    सुमन-क्‍या आपसे मुझे कोई बैर था? और आपसे बैर हो भी, तो आपकी बेचारी कमर ने मेरा क्‍या बिगाड़ा था?

    चिम्‍मनलाल-अब यहाँ आनेवाले पर लानत है।

    सुमन-सेठजी, आप इतनी जल्‍दी नाराज हो गए। मान लीजिए, मैंने जानबूझकर ही आपको गिरा दिया, तो क्‍या हुआ?

    इतने में विट्ठलदास ऊपर से उतर आए। उन्‍हें देखते ही सेठजी चौंक पड़े। घड़ों पानी पड़ गया।

    विट्ठलदास ने हंसी को रोककर पूछा-कहिए सेठजी, आप यहाँ कैसे आ फंसे? मुझे आपको यहाँ देखकर बड़ा आश्‍चर्य होता है।

    चिम्‍मनलाल-इस घड़ी न पूछिए। फिर यहाँ आऊं तो मुझ पर लानत है। मुझे किसी तरह यहाँ से नीचे पहुंचाइए।

    विट्ठलदास ने एक हाथ थामा, साईस ने आकर कमर पकड़ी। इस तरह लोगों ने उन्‍हें किसी तरह जीने से उतारा और लाकर गाड़ी में लिटा दिया।

    ऊपर आकर विट्ठलदास ने कहा-गाड़ीवाला अभी तक खड़ा है, दस बज गए। अब विलंब न करो।

    सुमन ने कहा-अभी एक काम और करना है। पंडित दीनानाथ आते होंगे। बस, उनसे निपट लूं। आप थोड़ा-सा कष्‍ट और कीजिए।

    विट्ठलदास ऊपर जाकर बैठे ही थे कि पंडित दीनानाथआ पहुँचे। बनारसी साफा सिर पर था, बदन पर रेशमी अचकन शोभायमान थी। काले किनारे की महीन धोती और काली वार्निश के पंप जूते उनके शरीर पर खूब जंचते थे।

    सुमन ने कहा-आइए महाराज ! चरण छूती हूँ।

    दीनानाथ-आशीर्वाद, जवानी बढ़े,आंख के अंधे गांठ के पूरे फंसें, सदा बढ़ती रहो।

    सुमन-काल आप कैसे नहीं आए, समाजियों को लिए रात तक आपकी राह देखती रही।

    दीनानाथ-कुछ न पूछो, कल एक रमझल्‍ले में फंस गया था। डॉक्‍टर श्‍यामाचरण और प्रभाकर राव स्‍वराज्‍य की सभा में घसीट ले गए। वहाँ बकझक-झकझक होती रही। मुझसे सबने व्‍याख्‍यान देने को कहा। मैंने कहा, मुझे कोई उल्‍लू समझा है क्‍या? पीछा छुड़ाकर भागा। इसी में देरी हो गई।

    सुमन-कई दिन हुए, मैंने आपसे कहा था कि किवाड़ों में वार्निश लगवा दीजिए। आपने कहा, वार्निश कहीं मिलती ही नहीं। यह देखिए, आज मैंने एक बोतल वार्निश मंगा रखी है। कल जरूर लगवा दीजिए।

    पंडित दीनानाथ मसनद लगाए बैठे थे। उनके सिर पर ही वह ताक था, जिस पर वार्निश रखी हुई थी। सुमन ने बोतल उठाई, लेकिन मालूम नहीं, कैसे बोतल की पेंदी अलग हो गई और पंडितजी वार्निश से नहा उठे। ऐसा मालूम होता था, मानो शीरे की नांद में फिसल पड़े हों। वह चौंककर खड़े हुए और साफा उतारकर रूमाल से पोंछने लगे।

    सुमन ने कहा-मालूम नहीं, बोतल टूटी थी क्‍या-सारी वार्निश खराब हो गई।

    दीनानाथ-तुम्‍हें अपनी वार्निश की पड़ी है, यहाँ सारे कपड़े तर हो गए। अब घर तक पहुँचना मुश्किल है।

    सुमन-रात को कौन देखता है, चुपके से निकल जाइएगा।

    दीनानाथ-अजी, रहने भी दो, सारे कपड़े सत्‍यानाश कर दिए, अब उपाय बता रही हो। अब यह धुल भी नहीं सकते।

    सुमन-तो क्‍या मैंने जान-बूझकर गिरा दिया।

    दीनानाथ-तुम्‍हारे मन का हाल कौन जाने?

    सुमन-अच्‍छा जाइए, जानकर ही गिरा दिया।

    दीनानाथ-अरे, तो मैं कुछ कहता हूँ, जी चाहे और गिरा दो।

    सुमन-बहुत होगा अपने कपड़ों की कीमत ले लीजिएगा।

    दीनानाथ-खफा क्‍यों होती हो, सरकार? मैं तो कह रहा हूँ, गिरा दिया, अच्‍छा किया।

    सुमन-इस तरह कह रहे हैं, मानो मेरे साथ बड़ी रियायत कर रहे हैं।

    दीनानाथ-सुमन, क्‍यों लज्जित करती हो?

    सुमन-जरा-सा कपड़े खराब हो गए, उस पर ऐसे जामे से बाहर हो गए, यही आपकी मुहब्‍बत है, जिसकी कथा सुनते-सुनते मेरे कान पक गए। आज उसकी कलई खुल गई। जादू सिर पर चढ़के बोला। आपने अच्‍छे समय पर मुझे सचेत कर दिया। अब कृपा करके घर जाइए। यहाँ फिर न आइएगा। मुझे आप जैसे मियां मिट्ठुओं की जरूरत नहीं।

    विट्ठलदास ऊपर बैठे हुए कौतुक देख रहे थे। समझ लिया कि अब अभिनय समाप्‍त हो गया। नीचे उतर आए। दीनानाथ ने चौंककर उन्‍हें देखा और छड़ी उठाकर शीघ्रतापूर्वक नीचे चले आए।

    थोड़ी देर बाद सुमन ऊपर से उतरी। वह केवल एक उजली साड़ी पहने थी, हाथों में चूडि़यां तक न थीं। उसका मुख उदास था, लेकिन इसलिए नहीं कि यह भोग-विलास अब उससे छूट रहा है, वरन् इसलिए कि वह अग्निकुंड में गिरी क्‍यों थी। इस उदासीनता में मलिनता न थी, वरन् एक प्रकार का संयम था। यह किसी मदिरा-सेवी मुख पर छानेवाली उदासी नहीं थी, बल्कि उसमें त्‍याग और विचार आभासित हो रहा था।

    विट्ठलदास ने मकान में ताला डाल दिया और गाड़ी के कोच-बक्‍स पर जा बैठे। गाड़ी चली।

    बाजारों की दुकानें बंद थीं, लेकिन रास्‍ता चल रहा था। सुमन ने खिड़की से झांककर देखा। उसे आगे लालटेनों की सुंदर माला दिखाई दी। लेकिन ज्‍यों-ज्‍यों गाड़ी बढ़ती जाती थी, त्‍यों-त्‍यों वह प्रकाशमाला भी आगे बढ़ती जाती थी। थोड़ी दूर पर लालटेनें मिलती थीं, पर वह ज्‍योतिर्माला अभिलाषाओं के सदृश दूर भागती जाती थी।

    गाड़ी वेग से जा रही थी। सुमन का भावी जीवन-यान भी विचार-सागर में वेग के साथ हिलता, डगमगाता, तारों के ज्‍योतिर्जाल में उलझता चला जाता था।

    By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text

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