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    दरवाजे पर आकर सुमन सोचने लगी कि अब कहां जाऊं। गजाधर की निर्दयता से भी उसे इतना दु:ख न हुआ था, जितना इस समय हो रहा था। उसे अब मालूम हुआ कि मैंनेअपने घर से निकलकर बड़ी भूल की। मैं सुभद्रा के बल पर कूद रही थी। मैं इन पंडितजी को कितना भला आदमी समझती थी। पर अब मुझे मालूम हुआ कि यह भी रंगे हुए सियार हैं। अपने घर के सिवा अब मेरा कोई ठिकाना नहीं है। मुझे दूसरों की चिरौरी करने की जरूरत ही क्‍या? क्‍या मेरा कोई घर नहीं था? क्‍या मैं इनके घर जन्‍म काटने आई थी। दो-चार दिन में जब उनका क्रोध शांत हो जाता, आप ही चली जाती। ओह ! नारायण, क्रोध में बुद्धि कैसी भ्रष्‍ट हो जाती है। मुझे इनके घर को भूलकर भी न आना चाहिए था, मैंने अपने पांव में आप ही कुल्‍हाड़ी मारी। वह अपने मन में न जाने क्‍या समझते होंगे।

    यह सोचते हुए सुमन आगे चली, पर थोड़ी दूर चलकर उसके विचारों ने फिर पलटा खाया। मैं कहां जा रही हूँ? वह कदापि मुझे घर में न घुसने देंगे। मैंने कितनी विनती की, पर उन्‍होंने एक न सुनी। जब केवल रात को कई घंटे की देर हो जाने से उन्‍हें इतना संदेह हो गया,तो अब मुझे पूरे चौबीस घंटे हो चुके हैं औनर मैं शामत की मारी वहीं आई, जहां मुझे न आना चाहिए था। वह तो अब मुझे दूर से ही दुतकार देंगे। यह दुतकार क्‍यों सहूँ? मुझे कहीं रहने का स्‍थान चाहिए। खाने भर को किसी न किसी तरह कमा लूंगी। कपड़े भी सीऊंगी तो खाने-भर को मिल जाएगा,फिर किसी की धौंस क्‍यों सहूँ? इनके यहाँ मुझे कौन-सा सुख था? व्‍यर्थ में एक बेड़ी पैरों में पड़ी हुई थी। और लोक-लाज से मुझे वह रख भी लें, तो उठते-बैठते ताने दिया करेंगे। बस, चलकर एक मकान ठीक कर लूं। भोली क्‍या मेरे साथ इतना भी सलूक न करेगी? वह मुझे अपने घर बार-बार बुलाती थी, क्‍या इतनी दया भी न करेगी?

    अमोला चली जाऊं तो कैसा हो? लेकिन वहाँ पर कौन बैठा हुआ है? अम्‍मा मर गई। शान्‍ता है। उसी का निर्वाह होना कठिन है, मुझे कौन पूछने वाला है? मामी जीने तो गंगा तो कहीं नहीं गई है? यह निश्‍चय करके सुमन भोली के घर चली। इधर-उधर ताकती थी कि कहीं गजाधर न आता हो।

    भोली के द्वार पर पहुँचकर सुमन ने सोचा, इसके यहाँ क्‍यों जाऊं? किसी पड़ोसिन के घर जाने से काम न चलेगा? इतने में भोली ने उसे देखा और इशारे से ऊपर बुलाया। सुमन ऊपर चली गई।

    भोली का कमरा देखकर सुमन की आंखें खुल गई। एक बार वह पहले भी आई थी, लेकिन नीचे के आंगन से ही लौट गई थी। कमरा फर्श, मसनद, चित्रों और शीशे के सामानों से सजा हुआ था। एक छोटी-सी चौकी पर चांदी का पानदान रखा हुआ था। दूसरी चौकी पर चांदी की तश्‍तरी और चांदी का एक ग्‍लास रखा हुआ था। सुमन यह सामान देखकर दंग रह गई।

    भोली ने पूछा- आज यह संदूकची लिए इधर कहां से आ रही थीं?

    सुमन-यह राम-कहानी फिर कहूँगी; इस समय तुम मेरे ऊपर कृपा करों कि मेरे लिए कहीं अलग एक छोटा-सा मकान ठीक करा दो। मैं उसमें रहना चाहती हूँ।

    भोली ने विस्मित होकर कहा-यह क्‍यों, क्‍या शौहर से लड़ाई हो गई है?

    सुमन-नहीं, लड़ाई की क्‍या बात है? अपना जी ही तो है।

    भोली-जरा मेरे सामने ताको। हां,चेहरा साफ कह रहा है। क्‍या बात हुई?

    सुमन-सच कहती हूँ, कोई बात नहीं है। अगर अपने रहने से किसी को कोई तकलीफ हो तो क्‍यों रहे?

    भोली-अरे, तो मुझसे साफ-साफ कहती क्‍यों नहीं, किस बात पर बिगड़े हैं?

    सुमन-बिगड़ने की कोई बात नहीं है। जब बिगड़ ही गए तो क्‍या रह गया?

    भोली-तुम लाख छिपाओ, मैं ताड़ गई सुमन, बुरा न मानो तो कह दूं। मैं जानती थी कि कभी-न-कभी तुमसे खटकेगी जरूर। एक गाड़ी में कहीं अरबी घोड़ी और कहीं लद्दू, टट्टू जुत सकते हैं? तुम्‍हें तो किसी बड़े घर की रानी बनना चाहिए था। मगो तुम्‍हारा पैर धोने लायक भी नहीं। तुम्‍हीं हो कि यों निबाह रही हो, दूसरी होती तो मियां पर लात मारकर कभी की चली गई होती। अगर अल्‍लाहताला ने तुम्‍हारी शक्‍ल-सूरत मुझे दी होती, तो मैंने अब तक सोने की दीवार खड़ी कर ली होती। मगर मालूम नहीं, तुम्‍हारी तबीयत कैसी है। तुमने शायद अच्‍छी तालीम नहीं पाई।

    सुमन-मैं दो साल तक एक ईसाई लेडी से पढ़ चुकी हूँ।

    भोली–दो-तीन साल की और कसर रह गई। इतने दिन और पढ़ लेतीं, तो फिर यह ताक न लगी रहती। मालूम हो जाता कि हमारी जिंदगी का क्‍या मकसद है, हमें जिंदगी का लुत्‍फ कैसे उठाना चाहिए। हम कोई भेड़-बकरी तो नहीं कि मां-बाप जिसके गले मढ़ दें, बस उसी की हो रहें। अगर अल्‍लाह को मंजूर होता कि तुम मुसीबतें झेलो, तो तुम्‍हें परियों की सूरत क्‍यों देता? यह बेहूदा रिवाज यहीं के लोगों में है कि औरत को इतना जलील समझते हैं;नहीं तो और सब मुल्‍कों की औरतें आजाद हैं, अपनी पसंद से शादी करती हैं और उससे रास नहीं आती, तो तलाक दे देती हैं। लेकिन हम सब वही पुरानी लकीर पीटे जा रही हैं।

    सुमन सोचकर कहा-क्‍या करूं बहन, लोक-लाज का डर है, नहीं तो आराम से रहना किसे मालूम होता है?

    भोली-यह सब उसी जिहालत का नतीजा है। मेरे मां-बाप ने मुझे एक बूढ़े मियां के गले बांध दिया था। उसके यहाँ दौलत थी और सब तरह का आराम था, लेकिन उसकी सूरत से मुझे नफरत थी। मैंने किसी तरह छ : महीने काटे, आखिर निकल खड़ी हुई। जिंदगी जैसी नियामत रो-रोकर दिन काटने के लिए नहीं दी गई है। जिंदगी का कुछ मजा ही न मिला,तो उससे फायदा ही क्‍या? पहले मुझे भी डर लगता था कि बड़ी बदनामी होगी, लोग मुझे जलील समझेंगे; लेकिन घर से निकलने की देरी थी, फिर तो मेरा वह रंग जमा कि अच्‍छे-अच्‍छे खुशामदें करने लगे। गाना मैंने घर पर ही साखा था, कुछ और सीख लिया, बस सारे शहर में धूम मच गई। आज यहाँ कौन रईस, कौन महाजन, कौन मौलवी, कौन पंडित ऐसा है, जो मेरे तलुवे सहलाने में अपनी इज्‍जत न समझे? मंदिरों में, ठाकुरद्वारों में मेरे मुजरे होते हैं। लोग मिन्‍नतें करके ले जाते हैं। इसे मैं अपनी बेइज्‍जती कैसे समझूं? अभी एक आदमी भेज दूं, तो तुम्‍हारे कृष्‍ण-मंदिर के महंतजी दौड़े चले आवें। अगर कोई इसे बेइज्‍जती समझे, तो समझा करे।

    सुमन-भला,यह गाना कितने दिन में आ जाएगा।

    भोली-तुम्‍हें छ : महीने में आ जाएगा;यहाँ गाने को कौन पूछता है, ध्रुपद और तिल्‍लाने की जरूरत ही नहीं। बस, चली हुई गजलों की धूम है। दो-चार ठुमरियां और कुछ थियेटर के गाने आ जाएं और बस, फिर तुम्‍हीं तुम हो। यहाँ तो अच्‍छी सूरत और मजेदार बातें चाहिए, सो खुदा ने यह दोनों बातें तुममें कूट-कूटकर भर दी हैं। मैं कसम खाकर कहती हूँ सुमन, तुम एक बार इस लोहै की जंजीर को तोड़ दो ; फिर देखो, लोग कैसे दीवानों की तरह दौड़ते हैं।

    सुमन ने चिंतित भाव से कहा-यही बुरा मालूम होता है कि …

    भोली-हां हां, कहो, यही कहना चाहती हो न कि ऐरे-गैरे सबसे बेशरमी करनी पड़ती है। शुरू में मुझे भी यही झिझक होती थी। मगर बाद को मालूम हुआ कि यह ख्‍याल-ही-ख्‍याल है। यहाँ ऐरे-गैरे के आने की हिम्‍मत ही नहीं होती। यहाँ तो सिर्फ रईस लोग आते हैं। बस, उन्‍हें फंसाए रखना चाहिए। अगर शरीफ है, तब तो तबीयत आप-ही आप उससे मिल जाती है और बेशरमी का ध्‍यान भी नहीं होता, लेकिन अगर उससे अपनी तबीयत न मिले, तो उसे बातों में लगाए रहो, जहां तक उसे नोचते-खसोटते बने, नोचो-खसोटो। आखिर को वह परेशान होकर खुद ही चला जाएगा,उसके दूसरे भाई और आ फंसेंगे। फिर पहले-पहल तो झिझक होती ही है। क्‍या शौहर से नहीं होती? जिस तरह धीर-धीर उसके साथ झिझक दूर होती है, उसी तरह यहाँ होता है।

    सुमन ने मुस्‍कराकर कहा-तुम मेरे लिए एक मकान ठीक कर दो।

    भोली ने ताड़ लिया कि मछली चारा कुतरने लगी, अब शिस्‍त को कड़ा करने की जरूरत है। बोली-तुम्‍हारे लिए यही घर हाजिर है। आराम से रहो।

    सुमन-तुम्‍हारे साथ न रहूँगी।

    भोली-बदनाम हो जाओगी, क्‍यों?

    सुमन-(झेंपकर) नहीं, यह बात नहीं।

    भोली-खानदान की नाक कट जाएगी?

    सुमन-तुम तो हंसी उड़ाती हो।

    भोली-फिर क्‍या, पंडित गजाधरप्रसाद पांडे नाराज हो जाएंगे?

    सुमन-अब मैं तुमसे क्‍या कहूँ?

    सुमन के पास यद्यपि भोली को जवाब देने के लिए कोई दलील न थी। भोलीने उसकी शंकाओं का मजाक उड़ाकर उन्‍हें पहले से ही निर्बल कर दिया था। यद्यपि अधर्म और दुराचार से मनुष्‍य को जो स्‍वाभाविक घृणा होती है, वह उसके ह्रदय को डावांडोल कर रही थी। वह इस समय अपने भावों को शब्‍दों में न कह सकती थी। उसकी दशा उस मनुष्‍य की-सी थी, जो किसी बाग में पके फल को देखकर ललचाता है, पर माली के न रहते हुए भी उन्‍हें तोड़ नहीं सकता।

    इतने में भोली ने कहा-तो कितने किराये तक का मकान चाहती हो, मैं अभी अपने मामा को बुलाकर ताकीद कर दूं।

    सुमन-यही दो-तीन रुपये।

    भोली-और क्‍या करोगी?

    सुमन-सिलाई का काम कर सकती हूँ।

    भोली-और अकेली ही रहोगी?

    सुमन-हां और कौन है?

    भोली-कैसी बच्‍चों की-सी बातें कर रही हो। अरी पगली, आंखों से देखकर अंधी बनती है। भला, अकेले घर में एक दिन भी तेरा निबाह होगा? दिन-दहाडे़ आबरू लुट जाएगी। इससे तो हजार दर्जे यही अच्‍छा है कि तुम अपने शौहर ही के पास चली जाओ।

    सुमन-उसकी तो सूरत देखने को जी नहीं चाहता। अब तुमसे क्‍या छिपाऊं, अभी परसों वकील साहब के यहाँ तुम्‍हारा मुजरा हुआ था। उनकी स्‍त्री मुझसे प्रेम रखती है। उन्‍होंने मुझे मुजरा देखने को बुलाया और बारह-एक बजे तक मुझे आने न दिया। जब तुम्‍हारा गाना खत्‍म हो चुका तो मैं घर आई। बस, इतनी-सी बात पर वह इतने बिगड़े कि जो मुँह में आया, बकते रहे। यहाँ तक कि वकील साहब से भी पाप लगा दिया। कहने लगे, चली जा, अब सूरत न दिखाना। बहन, मैं ईश्‍वर को बीच देकर कहती हूँ, मैंने उन्‍हें मनाने का बड़ा यत्‍न किया। रोई, पैर पड़ी, पर उन्‍होंने घर से निकाल ही दिया। अपने घर में कोई नहीं रखता,तो क्‍या जबरदस्‍ती है। वकील साहब के घर गई कि दस-पांच दिन रहूँगी फिर जैसा होगा देखा जाएगा, पर इस निर्दयी ने वकील साहब को बदनाम कर डाला। उन्‍होंने मुझे कहला भेजा कि यहाँ से चली जाओ। बहन, और सब दु:ख था, पर यह संतोष तो था कि नारायण इज्‍जत से निबाहें जाते हैं ; पर कलंक की कालिख मुँह में लग गई, अब चाहे सिर पर जो कुछ पड़े, मगर उस घर में न जाऊंगी।

    यह कहते-कहतेसुमन की आंखें भर आई। भोली ने दिलासा देकर कहा-अच्‍छा, पहले हाथ-मुँह तो धो डालो, कुछ नाश्‍ता कर लो, फिर सलाह होगी। मालूम होता है कि तुम्‍हें रात-भर नींद नहीं आई।

    सुमन-यहाँ पानी मिल जाएगा?

    भोली ने मुस्‍कराकर कहा-सब इंतजाम हो जाएगा। मेरा कहार हिंदू है। यहाँ कितने ही हिंदू आया करते हैं। उनके लिए एक हिंदू कहार रख लिया है।

    भोली की बूढ़ी मामी सुमन को गुसलखाने में ले गई। वहाँ उसने साबुन से स्‍नान किया। तब मामी ने उसके बाल गूंथे। एक नई रेशमी साड़ी पहनने के लिए लाई। सुमन जब ऊपर आई और भोली ने उसे देखा, तो मुस्‍कराकर बोली-जरा जाकर आईने में मुँह देख लो।

    सुमन शीशे के सामने गई। उसे मालूम हुआ कि सौंदर्य की मूर्ति सामने खड़ी है। सुमन अपने को कभी इतना सुंदर न समझती थी। लज्‍जायुक्‍त अभिमान से मुख-कमल खिल उठा और आंखों में नशा छा गया। वह एक कोच पर लेट गई।

    भोली ने अपनी मामी से कहा-क्‍यों जहूरन, अब तो सेठजी आ जाएंगे पंजे में?

    जहूरन बोली-तलुवे सहलाएंगे-तलुवे।

    थोड़ी देर में कहार मिठाइयां लाया। सुमन ने जलपान किया। पान खाया और फिर आईने के सामने खड़ी हो गई। उसने अपने मन में कहा, यह सुख छोड़कर उस अंधेरी कोठरी में क्‍यों रहूँ?

    भोली ने पूछा-गजाधर शायद मुझसे तुम्‍हारे बारे में कुछ पूंछे, तो क्‍या कह दूंगी?

    सुमन ने कहा-कहला देना कि यहाँ नहीं है।

    भोली का मनोरथ पूरा हो गया-उसे निश्‍चय हो गया कि सेठ बलभद्रदास जो अब तक मुझसे कन्‍नी काटते फिरते थे, इस लावण्‍यमयी सुंदरी पर भ्रमर की भांति मंडराएंगे।

    सुमन की दशा उस लोभी डाक्‍टर की-सी थी, जो अपने किसी रोगी मित्र को देखने जाता है और फिस के रुपये अपने हाथों से नहीं लेता। संकोचवश कहता है, इसकी क्‍या जरूरत है, लेकिन जब रुपये उसकी जेब में डाल दिए जाते हैं, तो हर्ष से मुस्‍कराता हुआ घर की राह लेता है।

    By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text

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