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    81 Results with the "Rural fiction" genre


    • पाठ-खंड 51 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री-उन्हें मजूरी दी जाती है न? ज्ञान-जी हाँ, लेकिन जमींदारी की दर से दी जाती है। जमींदारी शरह दो आने हैं, आम शरह छह आने हैं। गायत्री-आप उचित समझें तो रामसनेही को लिख दीजिए कि चार आने के हिसाब से…
    • पाठ-खंड 60 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राधा-नदी में अथाह जल है। वैद्य-जिस के पास नौका है उसे जल का क्या भय? राधा-आँधी है, भयानक लहरें हैं और बड़े-बड़े भयंकर जलजन्तु हैं। वैद्य-मल्लाह चतुर है। राधा-सूर्य भगवान् निकल आये, पर तारे क्यों…
    • पाठ-खंड 59 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह कह कर राय साहब धीरे से उठे और चले गये। तब विद्या ग्लानि, लज्जा और नैराश्य से मर्माहत हो कर पलँग पर लेट गई और बिलख-बिलख कर रोने लगी। राय साहब के पहले आक्षेप का उसने प्रतिवाद किया था, पर इस दूसरे…
    • पाठ-खंड 58 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लेकिन जब ज्ञानशंकर बनारस चले गये और उनकी चिट्ठियों का आना बिलकुल बन्द हो गया, तब गायत्री को ऐसा अनुभव होने लगा मानो मैं इस संसार में हूँ ही नहीं। या कोई दूसरा निर्जन, नीरव, अचेतन संसार है। उसे…
    • पाठ-खंड 57 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मस्ता-भैया, यह न जाने कौन आदमी है। फाटक से चिपटा खड़ा था। अभी मैं फाटक बन्द करने गया तो इसे देखा। मुझे देखते ही और दबक गया। बस मैंने चुपके से आकर सबको साथ लिया और बच्चू को पकड़ लिया। जरूर से जरूर कोई…
    • पाठ-खंड 56 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह कहते-कहते बुढ़िया रोने लगी। प्रेमशंकर की आँखें भी भर गईं, पूछा-बिसेसर साह की क्या हाल है? बुढ़िया-क्या जानूँ भैया, मैंने तो साल भर से उसके द्वार पर झाँका भी नहीं। अब कोई उधर नहीं जाता। ऐसे आदमी का…
    • पाठ-खंड 55 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सहसा डॉ. प्रियनाथ ने उच्च स्वर से कहा, अधमरा ही क्यों छोड़ दिया। एक लाठी और क्यों न जड़ दी कि काम तमाम हो जाता? मूर्यो! तुम्हारा अपराधी तो मैं था, 'इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था? यह कह कर वह…
    • पाठ-खंड 54 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एकाएक भीतर से द्वार खुला और राय साहब बाहर निकले। उनका मुखड़ा रक्तवर्ण हो रहा था। आँखें भी लाल थीं, पसीने से तर थे माने कोई लोहार भट्ठी के सामने से उठ कर आया हो। दोनों थाल समेट कर एक जगह रख दिये गये थे।…
    • पाठ-खंड 53 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर स्नान करके जल से निकल आये। उनका चेहरा विजय-ज्योति से चमक रहा था। लेकिन जिस प्रकार विजयी सैना शत्रुदल को मैदान से हटा कर और भी उत्साहित हो जाती है और शत्रु को इतना निर्बल और अपंग बना देती…
    • पाठ-खंड 52 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह कह कर राय साहब ने ज्ञानशंकर को तीव्र नेत्रों से देखा। उनके सन्देह का निशाना - इतना ठीक बैठा था कि ज्ञानशंकर का हृदय काँप उठा। इस भ्रम का मूलोच्छेद करना परमाश्यक था। राय साहब के मन में इसका जगह…
    • पाठ-खंड 61 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री विस्मित हो कर विद्या का मुँह ताकने लगी। लेकिन ज्ञानशंकर मन में मुग्ध हुए जाते थे। दोनों बहिनों में वह जो भेद-भाव डालना चाहते थे वह आप में यहाँ अब आपको कष्ट होगा। क्यों न बैंगले में एक कमरा…
    • पाठ-खंड 50 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पंडित जी ने अपना रंग जमते न देखा तो अपनी वक्तृता समाप्त कर दी और जगह पर आ बैठे। श्रोताओं ने समझा अब इत्तहादियों के राग सुनने में आयेंगे। सबने कुर्सियाँ आगे खिसकायीं और सावधान हो बैठे किन्तु…
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