पाठ-खंड 50
byपंडित जी ने अपना रंग जमते न देखा तो अपनी वक्तृता समाप्त कर दी और जगह पर आ बैठे। श्रोताओं ने समझा अब इत्तहादियों के राग सुनने में आयेंगे। सबने कुर्सियाँ आगे खिसकायीं और सावधान हो बैठे किन्तु उपदेशक-समाज इसे कब पसन्द कर सकता था कि कोई मुसलमान उनसे बाजी ले जाय? एक संन्यासी महात्मा ने चट अपना व्याख्यान न शुरू कर दिया। यह महाशय बेदान्त के पंडित और योगाभ्यासी थे। संस्कृत के उद्भट विद्वान् थे। वह सदैव संस्कृत में ही बोलते थे। उनके विषय में किंवदन्ती थी कि संस्कृत ही उनकी मातृ-भाषा है। उनकी वक्तृता को लोग उसी शौक से सुनते थे, जैसे चंडूल का गाना सुनते हैं। किसी की भी समझ में कुछ न आता था, पर उनकी विद्वता और वाक्य प्रवाह का रोब लोगों पर छा जाता था। वह एक विचित्र जीव ही समझे जाते थे और यही उनकी बहुप्रियता का मन्त्र था। श्रोतागण कितने ही ऊबे हुए हों, उनके मंच पर आते ही उठने वाले बैठ जाते थे, जाने वाले थम जाते थे। महफिल जम जाती थी। इसी घमंड पर इस वक्त उन्होंने अपना भाषण आरम्भ किया पर आज उनका जादू भी न चला। इत्तहादियों ने उनका रंग भी फीका कर दिया? उन्होंने संस्कृत की झड़ी लगा दी, खूब तड़पे, खूब गरजे, पर यह भादों की नहीं, चैत की वर्षा थी। अन्त में वह भी थक कर बैठ रहे और अब किसी अन्य उपदेशक को खड़े होने का साहस न हुआ। इत्तहादियों ने मैदान मार लिया।
ज्ञानशंकर ने खड़े हो कर कहा, अब इत्तहाद संस्था के संचालक सैयद ईजाद हुसेन अपनी अमृत वाणी सुनायेंगे। आप लोग ध्यानपूर्वक श्रवण करें।
सभा भवन में सन्नाटा छा गया। लोग सँभल बैठे। ईजाद हुसेन ने हारमोनियम उठा कर मेज पर रखा, साजिन्दों ने साज निकाले, अनाथ बालकवृन्द वृत्ताकार बैठे। सैयद इर्शाद हुसेन ने इत्तहाद सभा की नियमावली का पुलिन्दा निकाला। एक क्षण में ईशवन्दना के मधुर स्वर पंडाल में गूंजने लगे। बालकों की ध्वनि में एक खास लोच होता है। उनका परस्पर स्वर में स्वर मिला कर गाना उस पर साजों का मेल, एक समाँ छा गया…सारी सभा मुग्ध हो गयी।
राग बन्द हो गया और सैयद ईजाद हुसेन ने बोलना शुरू किया-प्यारे दोस्तो, आपको यह हैरत होगी कि हंसों में यह कौवा क्योंकर आ घुसा, औलिया की जमघट में यह भाँड कैसे पहुँचा? यह मेरी तकदीर की खूबी है। उलमा फरमाते हैं, जिस्म हादिम (अनित्य) है, रूह कदीम (नित्य) है। मेरा तजुर्बा बिलकुल बरअक्स (उल्टा) है। मेरे जाहिर में कोई तबदीली नहीं हुई। नाम वही है, लम्बी दाढ़ी वही है, लिबास-पोशाक वही है, पर मेरे रूह की काया पलट गयी। जाहिर से मुगालते में न आइए, दिल में बैठ कर देखिए, वहाँ मोटे हरूफ में लिखा हुआ है :"हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।"
लड़कों और साजिन्दों ने इकबाल की गजल अलापनी शुरू की। सभा लोट-पोट हो गयी। लोगों की आँखों से गौरव की किरणें-सी निकलने लगीं, कोई मूँछों पर ताव देने लगा, किसी ने बेबसी की लम्बी साँस खींची, किसी ने अपनी भुजाओं पर निगाह डाली और कितने ही सहृदय सज्जनों की आँखें भर आयीं। विशेष करके इस मिसरे पर-"हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा।" तो सारी मजलिस तड़प उठी, लोगों ने कलेजे थाम लिये।, "वन्देमातरम्" से भवन गूंज उठा। गाना बन्द होते ही फिर व्याख्यान शुरू हुआ –
"भाइयो, मजहब दिल की तस्कीन के लिए है, दुनिया कमाने के लिए नहीं, मुल्की हकूम हासिल करने के लिए नहीं। वह आदमी जो मजहब की आड़ में दौलत और इज्जत हासिल करना चाहता है, अगर हिन्दू है जो मलिच्छ है, मुसलमान है तो काफिर है। हाँ काफिर है, मजदूर है, रूसियाह है।"
करतल ध्वनि से पंडाल काँप उठा।
'हम सत्तर पुश्तों से इसी सरजमीन का दाना खा रहे हैं, इसी सरजमीन के आब व गिल (पानी और मिट्टी) से हमारी शिरशिरी हुई है। तुफ है उस मुसलमान पर जो हिजाज और इराक को अपना बतन कहता है!'
फिर तालियाँ बजीं। एक घंटे तक व्याख्यान हुआ। सैयद ने सारी सभा पर मानो मोहिनी डाल दी। उनकी गौरवयुक्त विनम्रता, उनकी निर्भीक यथार्थवादिता, उनकी मीठी चुटकियाँ, उनकी जातीयता में डूबी वाक्य-कुशलता, उनकी उत्तेजनापूर्ण आलोचना, उनके स्वदेशाभिमान, उस पर उनके शब्दप्रवाह, भावोत्कर्ष और राष्ट्रीय गाने ने लोगों को उन्मत्त कर दिया। हृदयों में जागृति की तरंगें उठने लगीं। कोई सोचता था, न हुए मेरे पास एक लाख रुपये, नहीं तो इसी दम लुटा देता। कोई मन में कहता था, बाल-बच्चों की चिंता न होती तो गले में झोली लटका कर जाति के लिए भिक्षा माँगता।
इस तरह जातीय भाव को उभाड़ कर भूमि को पोली बना कर सैयद साहब मतलब पर आये, बीज डालना शुरू किया।
"दोस्तो, अब मजहबपरवरी का जमाना नहीं रहा। पुरानी बातों को भूल जाइए। एक जमाना था कि आरियों ने यहाँ के असली बाशिन्दों पर सदियों तक हुकूमत की, आज वही शुद्र आरियों में घुले-मिले हुए हैं। दुश्मनों को अपने सलूक से दोस्त बना लेना आपके बुजुर्गों का जौहर था। वह जौहर आप में मौजूद है। आप बारहा हमसे गले मिलने के लिए बढ़े, लेकिन हम पिदरम सुलताबूद के जोश में हमेशा आप से दूर भागते रहे। लेकिन दोस्तो, हमारी बदगुमानी से नाराज न हों। तुम जिन्दा कौम हो। तुम्हारे दिल में दर्द है, हिम्मत है, फैयाजी है। हमारी तंगदिली को भूल जाइए। उसी बेगाना कौम का एक फ़र्द हकीर आज आपकी खिदमत में इत्तहाद का पैगाम लेकर हाजिर हुआ है, उसकी अर्ज कबूल कीजिए। यह फकीर इत्तहाद का सौदाई है, इत्तहाद का दीवाना है, उसका हौसला बढ़ाइए। इत्तहाद का यह नन्हा-सा मुर्झाया हुआ पौधा आपकी तरफ भूखी-प्यासी आँखों से ताक रहा है। उसे अपनी दरियादिली के उबलते हुए चश्मों से सैराब कर दीजिए। तब आप देखेंगे कि यह पौधा कितनी जल्द तनावर दरख्त हो जाता है और उसके मीठे फलों से कितनों की जबानें तर होती हैं। हमारे दिल में बड़े-बड़े हौसले हैं। बड़े-बड़े मनसूबे हैं। हम इत्तहाद की सदा से इस पाक जमीन के एक-एक गोशे को भर देना चाहते हैं। अब तक जो कुछ किया है आप ही ने किया है, आइन्दा जो कुछ करेंगे आप ही करेंगे। बन्दे की फिहरिस्त देखिए, वह आपके ही नामों से भरी हुई है और हक पूछिए तो आप ही उसके बानी हैं। रानी गायत्री कुँयर साहब की सखावत की एक यक्त सारी दुनिया में शोहरत है। भगत ज्ञानशंकर की कौमपरस्ती क्या पोशीदा है? वजीर ऐसा, बादशाह ऐसा? ऐसी पाक रूहें जिस कौम में हों वह खुशनसीब है। आज मैंने इस शहर की पाक जमीन पर कदम रखा तो बाशिन्दों के एखलाक और पुरोक्त, मेहमाननवाजी और खातिरदारी ने मुझे हैरत में डाल दिया। तहकीकात करने से मालूम हुआ कि यह इसी मजहबी जोश की बरकत है। यह प्रेम के औतार सिरी किरिश्न की भगती का असर है जिसने लोगों को इन्सानियत के दर्जे से उठा कर फरिश्तों का हमसर बना दिया है। हजरात, मैं अर्ज नहीं कर सकता कि मेरे दिल में सिरी किरिश्न जी की कितनी इज्जत है। इससे चाहे मेरी मुसलमानी पर ताने ही क्यों न दिए जायँ, पर मैं बेखौफ कहता हूँ कि वह रूहे पाक उलूहियत (ईश्वरत्व) के उस दर्जे पर पहुँची हुई थी जहाँ तक किसी नबी या पैगम्बर को पहुँचाना नसीब न हुआ। आज इस सभा में सच्चे दिल से अंजुमन इत्तहाद को उसी रूहेपाक के नाम मानूम (समर्पित) करता हूँ। मुझे उम्मीद ही नहीं, यकीन है कि उनके भगतों के सामने मेरा सवाल खाली न जाएगा। इत्तहादी यतीमखाने के बच्चे और बच्चियाँ आप ही की तरफ बेकस निगाहों से देख रही हैं। यह कौमी भिखारी आपके दरवाजे पर खड़ा दुआएँ दे रहा है। इस लम्बी दाढ़ी पर निगाह डालिए, इन सुफेद बालों की लाज रखिए।'
फिर हारमोनियम बजा, तबले पर थाप पड़ी, करताल ने झंकार ली और ईजाद हुसेन की करुण-रस-पूर्ण गजल शुरू हुई। श्रोताओं के कलेजे मसोस उठे। चन्दे की अपील हुई तो रानी गायत्री की ओर से 100 रुपये की सूचना हुई, भक्त ज्ञानशंकर ने यतीमखाने के लिए एक गाय भेंट की, चारों तरफ से लोग चन्दा देने को लपके। इधर तो चन्दे की सूची चक्कर लगा रही थी, उधर इर्शाद हुसेन ने अंजुमन के पैम्फलेट और तमगे बेचने शुरू किए। तमगे अतीव सुन्दर बजे हुए थे। लोगों ने शौक से हाथों-हाथ लिये। एक क्षण में हजारों वक्षस्थलों पर यह तमगे चमकने लगे। हृदयों पर दोनों तरफ से इत्तहाद की छाप पड़ी गयी। कुल चन्दे का योग 5000 रुपये हुआ। ईजाद हुसेन का चेहरा फूल की तरह खिल उठा। उन्होंने लोगों को धन्यवाद देते हुए एक गजल गायी और आज की कार्यवाही समाप्त हुई रात के दस बजे थे।
जब ईजाद हुसेन भोजन करके लेटे और खमीरे का रस-पान करने लगा तब उनके सुपुत्र ने पूछा, इतनी उम्मीद तो आपको भी न थी।
ईजाद-हर्गिज नहीं। मैंने ज्यादा से ज्यादा 1000 रुपये का अन्दाज किया था, मगर आज मालूम हुआ कि ये सब कितने अहमक होते हैं। इसी अपील पर किसी इस्लामी जालले में मुश्किल से 100 रुपये मिलते। इन बछिया के ताऊओं की खूब तारीफ कीजिए। हर्जोमलीह की हद तक हो तो मुजायका नहीं, फिर इनसे जितना चाहें वसूल कर लीजिए।
इर्शाद-आपकी तकरीर लाजवाब थी।
ईजाद-उसी पर तो जिन्दगी का दारोमदार है न किसी के नौकर, न गुलाम। बस, दुनिया में कामयाबी का नुसखा है तो यह शतरंजबाजी है। आदमी जरा लस्सान(वाक्-चतुर) हो, जरा मर्दुमशनास हो और जरा गिरहबाज हो, बस उसकी चाँदी है। दौलत उसके घर की लौंडी है।
इर्शाद-सच फरमाइएगा अब्बा जान, क्या आपका कभी यह खयाल था कि यह सब दुनियासाजी है?
ईजाद-क्या मुझे मामूली आदमियों से भी गया-गुजरा समझते हो? यह दगाबाजी है, पर करूँ क्या? औलाद और खानदान की मुहब्बत अपनी नजात की फिकर से ज्यादा है।
जलसा बड़ी सुन्दरता से समाप्त हुआ रानी गायत्री के व्याख्यान पर समस्त देश में वाह-वाह मच गयी। उसमें सनातन-धर्म संस्था का ऐतिहासिक दिग्दर्शन कराने के बाद उसकी उन्नति और पतन, उसके उद्धार और सुधार उसकी विरोधी तथा सहायक शक्तियों की बड़ी योग्यता से निरूपण किया गया था। संस्था की वर्तमान दशा और भावी लक्ष्य की बड़ी मार्मिक आलोचना की गयी थी। पत्रों में उस वक्तृता को पढ़ कर लोग चकित रह जाते थे और जिन्होंने उसे अपने कानों से सुना वे उसका स्वर्गीय आनन्द कभी न भूलेंगे। क्या वाक्य-शैली थी, कितनी सरल, कितनी मधुर, कितनी प्रभावशाली, कितनी भावमयी! वक्तृता क्या थी-एक मनोहर गान था।
तीन दिन बीत चुके थे। ज्ञानशंकर अपने भव्य-भवन में समाचार-पत्रों का एक दफ्तर सामने रखे बैठे हुए थे। आजकल उनका यही काम था कि पत्रों में जहाँ कहीं इस जलसे की आलोचना हुई तुरत काट कर रख लेते। गायत्री अब ज्ञानशंकर को देवतुल्य समझती थी। उन्हीं की बदौलत आज समस्त देश में उसकी सुकीर्ति की धूम मची हुई थी। उसके इस अतुल उपकार का एक ही उपहार था और वह प्रेमपूर्ण श्रद्धा थी।
सन्ध्या हो गयी थी कि अकस्मात्? ज्ञानशंकर पत्रों की एक पोट लिये हुए अन्दर गये और गायत्री से बोले, देखिए रायसाहब ने यह नया शिगूफा छोड़ा।
गायत्री ने भौहें चढ़ाकर कहा, मेरे सामने उनका नाम न लीजिए। मैंने उनकी कितनी चिरौरी की थी कि एक दिन के लिए जलसे में अवश्य आइए, पर उनके हाथों भी अपना अपमान नहीं सह सकती।
ज्ञान-मैंने तो समझा था, यह उनकी लापरवाही है, लेकिन इस पत्र से विदित होता है कि आजकल वह एक दूसरी ही धुन में है। शायद इसी कारण अवकाशन मिला हो।
गायत्री-क्या बात है, किसी अँगरेज से लड़ तो नहीं बैठे?
ज्ञान-नहीं, आजकल एक संगील-सभा की तैयारी कर रहे हैं।
गायत्री-उनके यहाँ तो बारहों मास संगीत-सभा होती रहती है।
ज्ञान-नहीं, यह उत्सव बड़ी धूम से होगा। देश के समस्त गवैयों के नाम निमंत्रण-पत्र भेजे गये हैं। यूरोप से भी कोई जगद्विख्यात गायनाचार्य बुलाये जा रहे हैं। रईसों और अधिकारियों को दावत दी गयी है। एक सप्ताह तक जलसा होगा। यहाँ के संगीत-शास्त्र और पद्धति में सुधार करना उनका उद्देश्य है।
गायत्री-हमारा संगीत-शास्त्र ऋषियों का रचा हुआ है। उसमें क्या कोई सुधार करेगा? इस भैरव और ध्रुपद के शब्द यशोदानन्दन की वंशी से निकलते थे। पहले कोई गा तो ले, सुधारना तो छोटा मुँह बड़ी बात है।
ज्ञान-राय साहब को कोई और चिन्ता तो है नहीं, एक न एक स्वाँग रचते रहते हैं, कर्ज बढ़ता जाता है, रियासत बोझ से दबी जाती है, पर वह अपनी धुन में किसी का कब सुनते हैं। मेरा अनुमान है कि इस समय उन पर कोई 3।। लाख देना है।
गायत्री-इतना धन कृष्ण भगवान की सेवा में खर्च करते तो परलोक बन जाता ! चिट्ठियाँ तो खोलिए, जरूर कोई पत्र होगा।
ज्ञान-हाँ, देखिए यह लिफाफा उन्हीं का मालूम होता है। हाँ, उन्हीं का है! मुझे बुला रहे हैं और आपको भी बुला रहे हैं।
गायत्री-मैं जा चुकी। जब वह यहाँ आने में अपनी हेठी समझते हैं, तो मुझे क्या पड़ी है कि उनके जलसों-तमाशों में जाऊँ। हाँ, विद्या को चाहे पहुँचा दीजिए; मगर शर्त यह है कि आप दो दिन से ज्यादा वहाँ न ठहरें?
ज्ञान-इसके विषय में सोच कर निश्चय करूँगा। यह दो पत्र बरहाल और आम-गाँव के कारिन्दों के हैं। दोनों लिखते हैं कि असामी सभा का चन्दा देने से इन्कार करते हैं।
गायत्री की त्योरियों बदल गयीं। प्रेम की देवी क्रोध की मूर्ति बन गयी। बोली, क्या देहातों, में भी वह हवा फैलने लगी? कारिन्दों को लिख दीजिए कि इन पाजियों के घर में आग लगवा दें और उन्हें कोड़ों से पिटवायें। उनका यह दिल कि मेरी आज्ञा का अनिरादर करें! देवकीनन्दन, तुम इन नर-पिशाचों को क्षमा करो! आप आज ही वहाँ आदमी रवाना करें! मैं यह अवज्ञा नहीं सह सकती। यह सब के सब कृज्ञघ्न हैं। किसी दूसरे राज में होते तो आटे-दाल का भाव खलता। मैं उनके साथ उतनी रिआयत करती हैं, उनकी मदद के लिए तैयार रहती हूँ, उनके लिए नुकसान उठाती हूँ और उसका यह फल!
ज्ञान-यह मुंशी रामसनेही का पत्र है। लिखते हैं, ठाकुरद्वारे का काम तीन दिन से बन्द है। बेगारों को कितनी ताकीद की जाती है, मगर काम पर नहीं आते।
By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text
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