पाठ-खंड 80
byसहसा बलराज ने कहा-बाबू जी, आपने सुना नहीं? मियाँ फैजुल्ला पर जो मुकदमा चल रहा था, उसका आज फैसला सुना दिया गया। अपनी पड़ोसिन बुढ़िया के घर में घुस कर चोरी की थी। तीन साल की सजा हो गयी।
डपटसिंह ने कहा-बहुत अच्छा। सौ बेंत पड़ जाते तो और भी अच्छा होता। यह हम लोगों की आह पड़ी है।
माया-बिन्दा महाराज और कर्तारसिंह का भी कहीं पता है?
बलराज-जी हाँ, बिन्दा महाराज, तो यहीं रहते हैं। उनके निर्वाह के लिए हम लोगों ने उन्हें यहाँ का वया बना दिया है। कर्तार पुलिस में भरती हो गये।
दस बजते-बजते लोग विदा हुए। मायाशंकर ऐसे प्रसन्न थे माने स्वर्ग में बैठे हुए हैं।
स्वार्थ-सेवी, माया के फन्दों में फँसे हुए मनुष्यों को यह शान्ति, यह सुख, यह आनन्द यह आत्मोल्लास कहाँ नसीब!
By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text
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