पाठ-खंड 79
byमायाशंकर ज्यों ही अपना कथन समाप्त कर के अपनी जगह बैठा कि हजारों आदमी चारों तरफ से आ-आ कर उसके इर्द-गिर्द जमा हो गये। कोई उसके पैरों पर गिरा पड़ता था, कोई रोता था, कोई दुआएँ देता था, कोई आनन्द से विहल हो करके उछल रहा था। आज उन्हें अमूल्य वस्तु मिल गयी थी जिसकी वह स्वप्न में भी कल्पना न कर सकते थे। दीन किसान को जमींदार बनने का हौसला कहाँ ? सैकड़ों आदमी गर्वनर महोदय के पैरों पर गिर पड़े, कितने ही लोग बाबा ज्ञानशंकर के पैरों से लिपट गये। शामियाने में हलचल मच गयी। लोग आपसे में एक दूसरे से गले मिलते थे और अपने भाग्य को सराहते थे। प्रेमशंकर सिर झुकाये खड़े थे, मानो किसी विचार में डूबे हुए हों; लेकिन उनके अन्य मित्र खुशी के फले न समाते थे। उनकी सगर्व आँखें कह रही थीं कि यह हमारी संगति और शिक्षा का फल है, हमको भी इसका कुछ श्रेय मिलना चाहिए, रईसों के प्राण संकट में पड़े हुए थे। आश्चर्य से एक दूसरे का मुँह ताकते थे, मानो अपने कानों और आँखों पर विश्वास न आता हो। कई विद्वान इस प्रश्न पर अपने विचार प्रकट करने के लिए आतुर हो रहे थे, पर यहाँ उसका अवसर न था।
गवर्नर महोदय बड़े असमंजस में पड़े हुए थे इस कथन का किन शब्दों में उत्तर दूँ? वह दिल में मायाशंकर के महान् त्याग की प्रशंसा कर रहे थे, पर उसे प्रकट करते हुए उन्हें भय होता था कि अन्य ताल्लुकेदारों और रईसों को बुरा न लगे। इसके साथ ही चुप रहना मायाशंकर के इस महान यज्ञ का अपमान करना था। उन्हें मायाशंकर में यह प्रेममय श्रद्धा हो गयी थी, जो पुनीत आत्माओं का भाग है। खड़े हो कर मृदु स्वर में बोले-
मायाशंकर! यद्यपि हममें से अधिकांश सज्जन उन सिद्धान्तों के कायल न होंगे। उसे प्रेरित होकर आपने यह अलौकिक संतोष व्रत धारण किया है; पर जो पुरुष सर्वथा हृदय-शून्य नहीं है वह अवश्य आपको देवतुल्य समझेगा। सम्भव है कि जीवन-पर्यन्त सुख भोगने के बाद किसी को वैराग्य हो जाय; किन्तु जिस युवक ने अभी प्रभुत्व और वैभव के मनोहर, सुखद उपवन में प्रवेश किया उसका यह त्याग आश्चर्यजनक है। पर यदि बाबू साहब को बुरा न लग तो मैं कहूँगा कि समाज की कोई व्यवस्था केवल सिद्धान्तों के आधार पर निर्दोष नहीं हो सकती, चाहे वे सिद्धान्त कितने ही उच्च और पवित्र हों। उसकी उन्नति मानव चरित्र के अधीन है। एकधिपतियों में देवता हो गये हैं और प्रज्ञावादियों में भयंकर राक्षस। आप जैसे उदार, विवेकशील, दयालु स्वामी की जात से प्रजा का कितना उपकार हो सकता था। आप उनके पथदर्शक बन सकते थे। अब यह प्रजाहितसाधनों से वंचित हो जायगी; लेकिन मैं इन कुत्सित विचारों से आपको भ्रम में नहीं डालना चाहता। शुभ कार्य सदैव ईश्वर की ओर से होते हैं। यह भी ईश्वरीय इच्छा है और हमें आशा करनी चाहिए कि इसका फल अनुकूल होगा। मैं परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि वह इन नये जमींदारों का कल्याण करे और आपकी कीर्ति अमर हो।
इधर तो मित्र-भवन की मंडली नाटक खेल रही थी, मस्ताने की तानें और प्रियनाथ की सरोद-ध्वनि रंग-भवन में गूँज रही थी, उधर बाबू ज्ञानशंकर नैराश्य के उन्मत्त आयश में गंगातट की ओर लपके चले जाते थे जैसे कोई टूटी हुई नौका जल-तरंगों में बहती चली जाती हो। आज प्रारब्ध ने उन्हें परास्त कर दिया। अब तक उन्होंने सदैव प्रारब्ध पर विजय पाई आज पाँसा पलट गया और ऐसा पलटा कि सँभलने की कोई आशा न थी। अभी एक क्षण पहले उनका भाग्य-भवन जगमगाते हुए दीपकों से प्रदीप्त हो रहा था; पर वायु के एक प्रचण्ड झोंके ने उन दीपकों को बुझा दिया। अब उनके चारों तरफ गहरा, घना, भयावह अँधेरा था जहाँ कुछ न सूझता था।
वह सोचते चले जाते थे, क्या इसी उद्देश्य के लिए मैंने अपना जीवन समर्पण किया? क्या अपनी नाव इसीलिए बोझी थी कि वह जलमग्न हो जाय?
हाँ वैभव लालसा! तेरी बलिवेदी पर मैंने क्या नहीं चढ़ाया? अपना धर्म, अपनी आत्मा तक भेंट कर दी। हा! तेरे भाड़ में मैंने क्या नहीं झोंका? अपना मन, वचन, कर्म सब कुछ आहुति कर दी। क्या इसीलिए कि कालिमा के सिवा और कुछ हाथ न लगे।
मायाशंकर का कसूर नहीं, प्रेमशंकर का दोष नहीं, यह सब मेरे प्रारब्ध की कूटलीला है। मैं समझता था मैं स्वयं अपना विधाता हूँ। विद्वानों ने भी ऐसा कहा है; पर आज मालूम हुआ कि मैं इसके हाथों का खिलौना था। उसके इशारों पर नाचने वाली कठपुतली था। जैसे बिल्ली चूहे को खिलाती है, जैसे मछुआ मछली को खेलाता है उसी भाँति इसमें मुझे अभी तक खेलाया। कभी पंजे से पकड़ लेता था, कभी छोड़ देता था।
वह एक अचेत, शून्य दशा में उठे और गंगा में कूद पड़े। शीतल जल ने हृदय को शान्त कर दिया।
दो साल हो गये हैं। सन्ध्या का समय है। बाबू मायाशंकर घोड़े पर सवार लखनपुर में दाखिल हुए। उन्हें वहाँ रौनक और सफाई दिखायी दी। प्रायः सभी द्वारों पर सायबान थे। उनमें बडे-बडे तख्ने बिछे हुए थे। अधिकांश घरों पर सुफेदी हो गयी थी। फूल के झोंपडे गायब हो गये थे। अब सब घरों पर खपरैल थे। द्वारों पर बैलों के लिए पक्की चरनियाँ बनी हुई थी और कई द्वारों पर घोड़े बँधे हुए नजर आते थे। पुराने चौपाल में पाठशाला थी और उसके सामने एक पक्का कुओं और धर्मशाला थी। मायाशंकर को देखते ही लोग अपने-अपने काम छोडकर दौड़े और एक क्षण में सैकड़ों आदमी जमा हो गये। मायाशंकर सक्खू चौधरी के मन्दिर पर रुके। वहाँ इस वक्त बड़ी बहार थी। मन्दिर के सामने सहन में भांति-भांति के फल खिले हुए थे। चबूतरे पर चौधरी बैठे हुए रामायण पढ़ रहे थे और कई स्त्रियों बैठी हई सुन रही थीं। मायाशंकर घोड़े से उतर कर चबूतरे पर जा बैठे।
सुखदास हड़बड़ा कर खड़े हो गये और पूछा-सब कुशल है न? क्या अभी चले आ रहें हैं।
माया-हाँ, मैंने कहा चलूं तुम लोगों से भेंट-माँट करता आऊँ।
सुख-बड़ी कृपा की। हमारे धन्य-भाग कि घर बैठे स्वामी के दर्शन होते हैं। यह कह कर वह लपके हुए घर में गये, एक ऊनी कालीन ला कर बिछा दी, कल्से में पानी खींचा और शरबत घोलने लगे। मायाशंकर ने मुँह-हाथ धोया, शरबत पिया, घोड़े की लगाम उतार रहे थे कि कादिर खाँ ने आ कर सलाम किया। माया ने कहा, कहिए खाँ साहब, मिजाज तो अच्छा है?
कादिर-सब अल्लाताला का फजल है। तुम्हारे जान-माल की खैर मनाया करते हैं। आज तो रहना होगा न?
माया-यही इरादा करके तो चला हूँ।
थोड़ी देर में वहाँ गाँव के सब छोटे-बड़े आ पहुँचे। इधर-उधर की बातें होने लगी। कादिर ने पूछा-बेटा, आजकल कौंसिल में क्या हो रहा है? असामियों पर कुछ निगाह होने की आशा है या नहीं?
माया-हाँ, है! चचा साहब और उनके मित्र लोग बड़ा जोर लगा रहे हैं। आशा है कि जल्दी ही कुछ न कुछ नतीजा निकलेगा।
कादिर-अल्लाह उनकी मेहनत सफल करे। और क्या दुआ दें? रोयें-रोयें से तो दुआ निकल रही है। काश्तकारों की दशा बहुत कुछ सुधरी है। बेटा, मुझी को देखो। पहले बीस बीघे का काश्तकार था, 100 रुपये लगान देना पड़ता था। दस-बीस रुपये साल नजराने में निकल जाते थे। अब जुमला 20 रुपये लगान है। आपके चपरासी-कारिन्दे वहीं गला दबा कर तुलवा लेते थे। अब अनाज घर में भरते हैं और सुभीते से बेचते हैं। दो साल में कुछ नहीं तो तीन-चार सौ बचे होंगे। डेढ़ सौ की एक जोड़ी बैल लाये, घर की मरम्मत करायी, सायबान डाला हाँड़ियों की जगह ताँबे और पीतल के बर्तन लिये और सबसे बड़ी बात यह है कि अब किसी की धौंस नहीं। मालगुजारी दाखिल करके चुपके घर चले आते हैं। नहीं तो हरदम जान सूली पर चढ़ी रहती थी। अब अल्लाह की इबादत में भी जी लगता है, नहीं तो नमाज की बोझ मालूम होती थी।
माया-तुम्हारा क्या हाल है दुखरन भगत?
दुखरन-भैया, अब तुम्हारे अकबाल से सब कुशल है। अब जान पड़ता है कि हम भी आदमी हैं, नहीं तो पहले बैलों से भी गये-बीते थे। बैल तो हर से आता है तो आराम से भोजन करके सो जाता है। यहाँ हर से आकर बैल की फिकिर करनी पड़ती थी। उससे छुट्टी मिले तो कारिन्दे साहब की खुशामद करने जाते। वहाँ से दस-ग्यारह बजे लौटते तो भोजन मिलता। 15 बीघे का काश्तकार था। 10 बीघे मौरूसी थे। उसके 50 रुपये लगान देता था। 5 बीघे सिकमी जोतते थे। उनके 60 रुपये देने पड़ते थे। अब 15 बीघे के कुल 30 रुपये देने पड़ते हैं। हरी-बेगारी, गजर-नियाज सबसे गला छूटा। दो साल में तीन-चार सौ हाथ में हो गये। 100 रुपये की एक पछाहीं भैंस लाया हूँ। कुछ करजा था, चुका दिया।
सुखदास-और तबला-हारमोनियम लिया है, वह क्यों नहीं कहते? एक पक्क कुआँ बनवाया है उसे क्यों छिपाते हो? भैया यह पहले ठाकुर जी के बड़े भगत थे। एक बार बेगार में पकड़े गये तो आकर ठाकुर जी पर क्रोध उतारा। उनकी प्रतिमा को तोड़-ताड़ कर फेंक दिया। अब फिर ठाकुर जी के चरणों में इनकी श्रद्धा हुई है। भजन-कीर्तन का सब सामान इन्होंने मँगवाया है।
दुखरन-छिपाऊँ क्यों? मालिक से कान परदा? यह सब उन्हीं का अकबाल तो है।
माया-यह बातें चचा जी सुनते, तो फूले न समाते।
कल्लू-भैया, जो सच पूछो तो चाँदी मेरी है। रंक से राजा हो गया। पहले 6 बीघे का असामी था, सब सिकमी, 72 रुपये लगान के देने पड़ते थे, उस पर हरदम गौस मियाँ की चिरौरी किया करता था कि कहीं खेत न छीन लें। 50 रुपये खाली नजगना लगना था। पिचादों की पूजा अलग करनी पड़ती थी। अब कुल 9 रुपये लगान देता हूँ। दो साल में आदमी बन गया। फूस के झोंपड़े में रहता था, अबकी मकान लिया है। पहले हरदम धड़का लगा रहता था कि कोई कारिन्दे से मेरी चुगली न कर आया हो। अब आनन्द से मीठी नींद सोता हूँ और तुम्हारा जस गाता हूँ।
माया-(सुक्खू चौधरी से) तुम्हारी खेती तो सब मजदूरों से ही होती होगी? तुम्हें भजन-भाव से कहाँ छुट्टी?
सुक्खू-(हंस कर) भैया, मुझे अब खेती-बारी करके क्या करना है। अब तो यही अभिलाषा है कि भगवत-भजन करते-करते यहाँ से सिधार जाऊँ। मैंने अपने चालीसों बीधे जन बेचारों को दे दिये हैं जिनके हिस्से में कुछ न पड़ा था। इस तरह सात-आठ घर जो पहले मजूरी करते थे और बेगार के मारे मजूरी भी न करने पाते थे, अब भले आदमी हो गये। मेरा अपना निर्वाह भिक्षा से हो जाता है। हाँ, इच्छापूर्ण भिक्षा यहीं मिल जाती है, किसी दूसरे गाँव में पेट के लिए नहीं जाना पड़ता। दो-चार साधु-संत नित्य ही आते रहते हैं। उसी भिक्षा में उनका सत्कार भी हो जाता है।
माया-आज बिसेसर साह नहीं दिखायी देते।
सुक्खू-किसी काम से गये होंगे। वह भी अब पहले से मजे में हैं। दूकान बहुत बढ़ा दी है, लेन-देन कम करते हैं। पहले रुपये में आने से कम ब्याज न लेते थे और करते क्या? कितने ही असामियों से कौड़ी वसूल न होती थी। रुपये मारे पड़ते थे। उसकी कसर व्याज से निकालते थे। अब रुपये सैकड़े ब्याज देते हैं। किसी के यहाँ रुपये डूबने का इर नहीं है। दुकान भी अच्छी चलती है। लश्करों में पहले दिवाला निकल जाता था। अब एक तो गाँव का बल है, कोई रोब नहीं जमा सकता और जो कुछ थोड़ा बहुत घाटा हुआ भी तो गाँववाले पूरा कर देते हैं।
इतने में बलराज रेशमी साफा बाँधे, मिर्जई पहने, घोड़े पर सवार आता दिखायी दिया। मायाशंकर को देखते ही बेधड़क घोड़े पर से कूद पड़ा और उनके चरण स्पर्श किये। यह अब जिला-सभा का सदस्य था। उसी के जल्से से लौटा आ रहा था।
माया ने मुस्करा कर पूछा-कहिए मेम्बर साहब, क्या खबर है।
बलराज-हुजूर की दुआ से अच्छी तरह हूँ। आप तो मजे में है। बोर्ड के जल्से में गया था। बहस छिड़ गयी, वहीं चिराग जल गया।
माया-आज बोर्ड में क्या था।
बलराज-वही वेगार का प्रश्न छिड़ा हुआ था। खूप गर्मागर्म बहस हुई। मेरा प्रस्ताव था कि जिले का कोई हाकिम देहात में जा कर गाँववालों से किसी तरह की खिदमत का काम न लें, जैसे पानी भरना, घास छीलना, झाड़ू लगाना। जो रसद दरकार हो वह गाँव के मुखिया से कह दी जाय और बाजार भाव से उसी दम दाम चुका दिया जाय। इस पर दोनों तहसीलदार और कई हुक्काम बहुत भन्नाये। कहने लगे, इससे सरकारी काम में बड़ा हर्ज होगा। मैंने भी जी खोल कर जो कुछ कहते बना, कहा। सरकारी काम प्रजा को कर दे कर और उनका अपमान करके नहीं होना चाहिए। हर्ज होता है तो हो। दिल्लगी यह है कि कई जमींदार भी हुक्काम के पक्ष में थे। मैंने उन लोगों की खूब खबर ली। अन्त में मेरा प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। देखें जिलाधीश क्या फैसला करते हैं। मेरा एक प्रस्ताव यह भी था कि निर्खनामा लिखने के लिए एक सब-कमेटी बनायी जाय जिसमें अधिकांश व्यापारी लोग हों। यह नहीं कि तहसीलदार ने कलम उठाया और मनमाना निर्ख लिख कर चलता किया। वह प्रस्ताव भी मंजूर हुआ।
माया-मैं इन सफलताओं पर तुम्हें बधाई देता हूँ।
बलराज-यह सब आपका अकबाल है। यहाँ पहले कोई अखबार का नाम भी न जानता था। अब कई अच्छे-अच्छे पत्र भी आते हैं। सबेरे आपको अपना वाचनालय दिखलाऊँगा। गाँव के लोग यथायोग्य 1 रुपये, 2 रुपये मासिक चन्दा देते हैं, नहीं तो पहले हम लोग मिल कर पत्र माँगते थे तो सारा गाँव बिदकता था। जब कोई अफसर दौरे पर आता, कारिन्दा साहब चट उससे मेरी शिकायत करते। अब आपकी दया से गाँव में रामराज है। आपको किसी दूसरे गाँव में पूसा और मुजफ्फरपुर का गेहूँ न दिखायी देगा। हम लोगों ने अबकी मिल कर दोनों ठिकानों से बीज मँगवाये और डेवढ़ी पैदावार होने की पूरी आशा है। पहले यहाँ डर के मारे कोई कपास बोता ही न था। मैंने अबकी मालवा और नागपुर से बीच मँगवाये और गाँव में बाँट दिये। खूब कपास हुई। यह सब काम गरीब असामियों के मान के नहीं हैं जिनको पेट भर भोजन तक नहीं मिलता, सारी पैदावार लगान और महाजन के भेंट हो जाती है।
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