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    Chapter Index

    मनोहर-अबकी बेटी के ब्याह में इमली का पेड़ कटवाया था। क्या सब जल गई?

    डपट-नहीं बची तो बहुत थी, पर कल डिप्टी ज्वालासिंह के लश्कर में चली गई।-खाँ साहब से कितना कहा कि इसे मत ले जाइए, पर उनकी बला सुनती है। चपरासियों को ढेर दिखा दिया। बात की बात में सारी लकड़ी उठ गई।

    मनोहर-तुमने चपरासियों से कुछ कहा नहीं?

    डपट-क्या कहता, दस-पाँच मन लकड़ी के पीछे अपनी जान साँसत में डालता! गालियाँ खाता, लश्कर में पकड़ा जाता, मार पड़ती ऊपर से, तब तुम भी पास न फटकते। दोनों लड़के और झपट तो गरम हो पड़े थे, लेकिन मैंने उन्हें डाँट दिया। जबरदस्त का ठेंगा सिर पर।

    कादिर-हाकिमों का दौर क्या है, हमारी मौत है। बकरीद में कुर्बानी के लिए जो बकरा पाल रखा था, वह कल लश्कर में पकड़ गया। रब्बी बूचड़ पाँच रुपये नगद देता था, मगर मैंने न दिया था। इस बखत सात से कम का माल न था।

    मनोहर-यह लोग बड़ा अन्धेर मचाते हैं इंतजाम करने, इन्साफ करने; लेकिन हमारे गले पर छुरी चलाते। इससे कहीं अच्छा तो यही था कि दौरे बन्द हो जाते। यही न होता कि मुकदमे वालों को सदर जाना पड़ता, इस साँसत से तो जान बचती।

    कादिर-इसमें हाकिमों का कसूर नहीं। यह सब उनके लश्करवालों की धाँधली है। वही सब हाकिमों को भी बदनाम कर देते हैं।

    मनोहर-कैसी बातें कहते हो दादा? यह सब मिलीभगत है। हाकिम का इशारा न होता तो मजाल है कि कोई लश्करी पराई चीज पर हाथ डाल सके। सब कुछ हाकिमों की मर्जी से होता है और उनकी मर्जी क्यों न होगी? सेत का माल किसको बुरा लगता है?

    डपट-ठीक बात है। जिसकी जितनी आमद होती है वह उतना ही और मुँह फैलाता है।

    दुखरन-परमात्मा यह अन्धेर देखते हैं, और कोई जतन नहीं करते। देखें बिसेसर साह को अबकी कितनी घटी आती है।

    डपट-परसाल तो पूरे तीन सौ की चपत पड़ी थी। वही अबकी भी समझो, अगर जिन्स ही तक रहे तो इतना घाटा न पड़े, मगर यहाँ तो इलायची, कत्था, सुपारी, मेवा और मिश्री सभी कुछ चाहिए और सब टके सेर। लोग खाने के इतने शौकीन बनते हैं, पर यह नहीं होता कि वे सब चीजें अपने साथ रखें।

    मनोहर-शहर में खरे दाम लगते हैं, यहाँ जी में आया दिया न दिया।

    कादिर-कल लश्कर का एक चपरासी बिसेसर के यहाँ साबूदाना माँग रहा था। बिसेसर हाथ जोड़ता था, पैरों पड़ता था कि मेरे यहाँ नहीं है, लेकिन चपरासी एक न सुनता था, कहता था जहाँ से चाहो मुझे लाकर दो। गालियाँ देता था, डण्डा दिखाता था। बारे बलराज पहुँच गया। जब वह कड़ा पड़ा तो चपरासी मियाँ नरम पड़े, और भुनभुनाते चले गए।

    दुखरन-बिसेसर की एक बार मरम्मत हो जाती तो अच्छा होता। गाँव भर का गला मरोड़ता है, यह उसकी सजा है।

    डपट-और हम-तुम किसका गला मरोड़ते हैं?

    मनोहर ने चिन्तित भाव से कहा, बलराज अब सरकारी आदमियों के मुँह आने लगा। कितना समझा के हार गया मानता नहीं।

    कादिर-यह उमिर हो ऐसी होती है।

    यही बातें हो रही थी कि एक बटोही आकर अलाव के पास खड़ा हो गया। उसके पीछे-पीछे एक बुढ़िया लाठी टेकती हुई आई और अलाव से दूर सिर झुकाकर बैठ गई।

    कादिर ने पूछा-कहो भाई, कहाँ घर है?

    घर तो देवरी पार, अपनी बुढ़िया माता को लिये अस्पताल जाता था। मगर वह जो सड़क के किनारे बगीचे में डिप्टी साहब का लश्कर उतरा है, वहाँ पहुँचा तो चपरासी ने गाड़ी रोक ली और हमारे कपड़े-लत्ते फेंक-फाँक कर लकड़ी लादने लगे, कितनी अरज-बिनती की, बुढ़िया बीमार है, रातभर का चला हूँ, आज अस्पताल नहीं पहुंचा तो कल न जाने इसका क्या हाल हो। मगर कौन सुनता है? मैं रोता ही रहा, वहाँ गाड़ी लद गई। तब मुझसे कहने लगे, गाड़ी हाँक। क्या करूँ अब गाड़ी हाँक सदर जा रहा हूँ। बैल और गाड़ी उनके भरोसे छोड़कर आया हूँ जब लकड़ी पहुँचा के लौटूँगा तब अस्पताल जाऊँगा। तुम लोगों को हो सके तो बुढ़िया के लिए खटिया दे दो और कहीं पड़ रहने का ठिकाना बता दो। इतना पुण्य करो, मैं बड़ी विपत्तियों में हूँ।

    दुखरन-यह बड़ा अन्धेर है। यह लोग आदमी काहे के,पूरे राक्षस हैं, जिन्हें दयाधरम का विचार नहीं।

    डपट-दिन भर के थके-माँदे बैल हैं, न जाने कहाँ गाड़ी ले जानी पड़ेगी और न जाने जब लौटोगे। तब तक बुढ़िया अकेली पड़ी रहेगी? जाने कैसी पड़े कैसी न पड़े! हम लोग कितने भी हों, हैं तो पराए ही, घर के आदमी की और बात है।

    मनोहर-मेरा तो ऐसा ही जी चाहता है कि इस दम डिप्टी साहब के सामने चला जाऊँ और ऐसी खरी-खरी सुनाऊँ कि वह भी याद करेंगे। बड़े हाकिम की पोंग बने हैं। इन्साफ तो क्या करेंगे, उल्टे और गरीबों को पीसते हैं। खटिया की तो कोई बात नहीं है और न जगह की ही कमी है, लेकिन यह अकेली रहेंगी कैसे?

    बटोही-कैसे बताऊँ? जो भाग्य में लिखा है वही होगा।

    मनोहर-यहाँ से कोई तुम्हारी गाड़ी हाँक ले जाए तो कोई हरज है?

    बटोही-ऐसा हो जाए तो क्या पूछना। है कोई आदमी?

    मनोहर-आदमी बहुत हैं, कोई न कोई चला जाएगा।

    कादिर-तुम्हारा हलवाहा तो खाली है, उसे भेज दो।

    मनोहर-हलवाहे से बैल सधे न सधे, मैं ही चला जाऊँगा।

    कादिर-तुम्हारे ऊपर मुझे विश्वास नहीं आता। कहीं झगड़ा कर बैठो तो और बन जाए। दुखरन भगत, तुम चले जाओ तो अच्छा हो।

    दुखरन ने नाक सिकोड़कर कहा, मुझे तो जानते ही, रात को कहीं नहीं जाता। भजन-भाव की यही खेला है।

    कादिर-चला तो मैं जाता, लेकिन मेरा मन कहता है कि बूढ़ी को अच्छा करने का जस मुझी को मिलेगा। कौन जाने अल्लाह को यहीं मंजूर हो। मैं उन्हें अपने घर लिये जाता हूँ। जो कुछ बन पड़ेगा करूँगा। गाड़ी हसनू से हैंकवाए देता हूँ। बैलों को चारा-पानी देना है, बलराज को थोड़ी देर के लिए भेज देना।

    कादिर के बरौठे में वृद्धा की चारपाई पड़ गई। कादिर का लड़का हसनू गाड़ी हाँकने के लिए पड़ाव की तरफ चला। इतने में सुक्खू चौधरी और गौस खाँ दो चपरासियों के साथ आते दिखाई दिए। दूसरी ओर से बलराज भी आकर खड़ा हो गया।

    गौस खाँ ने कहा, सब लोग यहाँ बैठे गलचौड़ कर रहे हो, कुछ लश्कर की भी खबर है? देखो, यही चपरासी लोग दूध के लिए आए हैं, उसका बन्दोबस्त करो।

    कादिर-कितना दूध चाहिए?

    एक चपरासी-कम-से-कम दस से।

    कादिर-दस सेर! इतना दूध तो चाहे गाँव भर में न निकले। दो ही चार आदमियों के पास भैंसें हैं और वह भी दुधार नहीं हैं। मेरे यहाँ तो दोनों जून में सेर भर से ज्यादा नहीं होता।

    चपरासी–भैंसें हमारे सामने लाओ, दूध तो हमारा चपरास निकालता है। हम पत्थर से दूध निकाल लें। चोरों के पेट की बात तक निकाल लेते हैं, भैंसें तो फिर भैंसें हैं। इस चपरास में वह जादु है, कि चाहे तो जंगल में मंगल कर दे। लाओ, भैंसें यहाँ खड़ी करो।

    गौस खाँ-इतने तूल-कलाम की क्या जरूरत है? दूध का इन्तजाम हो जाएगा। दो सेर सुक्खू देने को कहते हैं। कादिर के यहाँ दो सेर मिल ही जाएगा, दुखरन भगत दो सेर देगें; मनोहर और डपटसिंह भी दो-दो सेर दे देंगे। बस हो गया।

    कादिर-मैं दो-चार सेर का बीमा नहीं लेता। यह दोनों भैंसें खड़ी हैं। जितना दूध। दे दें उतना ले लिया जाए।

    दुखरन-मेरी तो दोनों मैंसे गाभिन हैं। बहुत देंगी तो आधा सेर। पुवाल तो खाने को पाती हैं और वह भी आधा पेट। कहीं चराई हैं नहीं, दूध कहाँ से हो?

    डपटसिंह-सुक्खू चौधरी जितना देते हैं, उसका आधा मुझसे ले लीजिए। हैसियत के हिसाब से न लीजिएगा।

    गौस खाँ-तुम लोगों की यह निहायत बेहूदी आदत है कि हर बात में लाग-डाँट करने लगते हो। शराफत और नरमी से आधा भी न दोगे, लेकिन सख्ती से पूरा लिये हाजिर हो जाओगे। मैंने तुमसे दो सेर कह दिया है, इतना तुम्हें देना होगा।

    डपट-इस तरह आप मालिक हैं, भैंसें खेल ले जाइए, लेकिन दो सेर दूध मेरे यहाँ न होगा।

    मौस खाँ-मनोहर तुम्हारी भैंसें दुधार हैं?

    मनोहर ने अभी जवाब न दिया था कि बलराज बोल उठा, मेरी भैसें बहुत दुधार हैं, मन भर दूध देती हैं, लेकिन बेगार के नाम से छटाँक भर भी न देंगी।

    मनोहर-तू चुपचाप क्यों नहीं रहता? तुमसे कौन पूछता है। हमसे जितना हो सकेगा। देंगे, तुमसे मतलब?

    चपरासी ने बलराज की ओर अपमान-जनक क्रोध से देखकर कहा, महतो, अभी हम लोगों के पंजे में नहीं पड़े हो। एक बार पड़ जाओगे तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जाएगा। मुँह से बातें न निकलेंगी।

    दूसरा चपरासी-मालूम होता है, सिर पर गरमी चढ़ गई है तभी इतना ऐंठ रहा है। इसे लश्कर ले चलो तो गरमी उत्तर जाए।

    बलराज ने मर्माहत होकर कहा, मियाँ, हमारी 'गरमी पाँच-पाँच रुपल्ली के चपरासियों के मान की नहीं है, जाओ, अपने साहब बहादुर के जूते सीधे करो, जो तुम्हारा काम है; हमारी गरमी के फेर में न पड़ो; नहीं तो हाथ लग जाएँगे। उस जन्म के पापों का दण्ड, भोग रहे हो, लेकिन अब भी तुम्हारी आँखें नहीं खुलतीं?

    बलराज ने यह शब्द ऐसी सगर्व गम्भीरता से कहे कि दोनों चपरासी खिसिया से गए। इस घोर अपमान का प्रतिकार करना कठिन था। यह मानो वाद को बाणी की परिधि से निकालकर कर्म के क्षेत्र में लाने की ललकार थी। व्यंगाघात शाब्दिक कलह की चरम सीमा है। उसका प्रतिकार मुँह से नहीं हाथ से होता है। लेकिन बलराज की चौड़ी छाती और पुष्ट भुजदण्ड देखकर चपरासियों को हाथापाई करने का साहस न हो सका। गौस ख़ाँ से बोला, खाँ साहब, आप इस लौंडे को देखते हैं, कैसा बढ़ा जाता है? इसे समझा दीजिए, हमारे मुँह न लगे। ऐसा न हो शामत आ जाए और छह महीने तक चक्की पीसनी पड़े। हम आप लोगों का मुलाहिजा करते हैं, नहीं तो इस हेकड़ी का मजा चखा देते।

    गौस खाँ-सुनते हो मनोहर, अपने बेटे की बात? भला सोचो तो डिप्टी साहब केकानों में यह बात पड़ जाए तो तुम्हारा क्या हाल हो? कहीं एक पत्ती का साया भी न मिलेगा।

    मनोहर ने दीनता से खाँ साहब की ओर देखकर कहा, खाँ साहब, मैं तो इसे सब तरह से समझा-बुझा कर हार गया। न जाने क्या हाल करने पर तुला है? (बलराज से) अरे, तू यहाँ से जाएगा कि नहीं?

    बलराज-क्यों जाऊँ, मुझे किसी का डर नहीं है। यह लोग डिप्टी साहब से मेरी शिकायत करने की धमकी देते हैं। मैं आप ही उनके पास जाता हूँ। इन लोगों को उन्होंने कभी ऐसा नादिरशाही हुक्म न दिया होगा कि जाकर गाँव में आग लगा दो। और मान लें कि वह ऐसा कड़ा हुक्म दे भी हैं, तो इन लोगों को तो सोचना चाहिए कि गरीब किसान भी हमारे भाई बन्द हैं, इन्हें व्यर्थ न सताएँ। लेकिन इन लोगों को तो पैसे के लोभ और चपरास के मद ने ऐसा अन्धा बना दिया है कि कुछ सूझता ही नहीं। आज उस बेचारी बुढ़िया का क्या हाल होगा, मरेगी कि जिएगी; नौकरी तो की है पाँच रुपये की, काम है बस्ते ढोना, मेज साफ करना, साहब के पीछे-पीछे खिदमतगारों की तरह चलना और बनते हैं रईस!

    मनोहर-तू चुप होगा कि नहीं?

    एक चपरासी-नहीं, इसे खूब गालियाँ दे लेने दो, जिसमें इसके दिल की हवस निकल जाय। इसका मजा कल मिलेगा। खाँ साहब, आपने सुना है, आपको गवाही देनी पड़ेगी। आपका इतना मुलाहिजा बहुत किया। होगा, दूध का कुछ इन्तजाम।

    गौस खाँ-नहीं जी, दूध लो, और दस सेर से ज्यादा। यही लोग झख मारेंगे। क्या बताएँ आज इस छोकड़े की बदौलत हमको तुम लोगों के सामने इतना शर्मिन्दा होना पड़ा। इस गाँब की कुछ हवा ही बिगड़ी हुई। मैं खूब समझता हूँ। यह लोग जो भी बिल्ली बने बैठे हुए हैं, इन्हीं के शह देने से लौंडे को इतनी जुर्रत हुई है। नहीं तो इसकी मजाल धी कि यो टर्राता। बछड़ा झूटे के ही बल कूदता है। खैर, अगर मेरा नाम गौस खाँ है तो एक-एक से समयूँगा।

    इस तिरस्कार का आशातीत प्रभाव हुआ। सब दहल उठे। यह अविनय-शीलता, जो पहले सबके चेहरे से झलक रही थी, लुप्त हो गई। मनोहर तो ऐसा सिटपिटा गया, मानो सैकड़ों जूते पड़े हों। इस खटाई ने सबके नशे उतार दिए।

    कादिर खाँ बोल-मनोहर, जाओ, जितना दूध है सब यहाँ भेज दो।

    गौस खाँ-हमको मनोहर के दूध की जरूरत नहीं है। बलराज-यहाँ देता ही कौन है?

    मनोहर खिसिया गया। उठ खड़ा हुआ और बोला, अच्छा ले अब तू ही बोल, जो तेरे जी में आए कर, मैं जाता हूँ। अपना घर-द्वार सँभाला मेरा निवाह तेरे साथ न होगा। चाहे घर को रख, चाहे आग लगा दे।

    यह कहकर वह सशंक क्रोध से भरा हुआ वहाँ से चल दिया। बलराज भी धीरे-धीरे अपने अखाड़े की ओर चला। वहाँ इस समय सन्नाटा था। मुगदर की जोड़ी रखी हुई थी। एक पत्थर की नाल जमीन पर पड़ी हुई थी, और लेजिम आम की डाल से लटक रहा था। बलराज ने कपड़े उतारे और लँगोट कसकर अखाड़े में उतरा लेकिन आज व्यायाम में उसका मन न लगा। चपरासियों की बात एक फोड़े का भाँति उसके हृदय में टीस रही थी। यद्यपि उसने चपरासियों को निर्भय होकर उत्तर दिया था, लेकिन उसे इसमें तनिक भी सन्देह न था कि गाँव के अन्य पुरुषों को, यहाँ तक कि मेरे पिता को भी, मेरी बातें उदंड प्रतीत हुई। सब के सब कैसा सन्नाटा खींचे बैठे रहे। मालूम होता था किसी के मुँह में जीभ ही नहीं है, तभी तो यह दुर्गति हो रही है! अगर कुछ दम हो तो आज इतने पीसे-कुचले क्यों जाते? और तो और, दादा ने भी मुझी को डाँटा। न जाने इनके मन में इतना डर क्यों समा गया है? पहले तो ये इतने कायर न थे। कछाचित् अब मेरी चिन्ता इन्हें सताने लगी। लेकिन मझे अवसर मिला तो स्पष्ट कह दूँगा कि तुम मेरी ओर से निश्चित रहो। मुझे परमात्मा ने हाथ-पैर दिए हैं। मेहनत कर सकता हूँ और दो को खिलाकर खा सकता हूँ। तुम्हें अगर अपने खेत इतने प्यारे हैं कि उनके पीछे तुम अत्याचार और अपमान सहने पर तैयार हो तो शौक से सहो, लेकिन मैं ऐसे खेतों पर लात मारता हूँ। अपने पसीने की रोटी खाऊँगा और अकड़कर चलूँगा। अगर कोई आँख दिखाएगा तो उसकी आँख निकाल लूँगा। यह बुढा गौस खाँ कैसी लाल-पीली आँख कर रहा था, मालूम होता है इनकी मृत्यु मेरे ही हाथों लिखी हुई है। मुझपर दो चोट कर चुके हैं। अब देखता हूँ कौन आथ निकालते हैं। इनका क्रोध मुझी पर उतरेगा। कोई चिन्ता नहीं, देखा जाएगा। दोनों चपरासी मन में फूले ही न समाए होंगे कि सारा गाँव कैसा रोब में आ गया, पानी भरने को तैयार है। गाँव वालों ने भी लल्लो-चपों की होगी, कोई परवाह नहीं। चपरासी मेरा कर ही क्या सकते हैं? लेकिन मुझे कल प्रातःकाल डिप्टी साहब के पास जाकर उनसे सब हाल कह देना चाहिए। विद्वान् पुरुष हैं। दीन जनों पर उन्हें अवश्य दया आएगी। अगर वह गाड़ियों के पकड़ने की मनाही कर दें तो क्या पूछना? उन्हें यह अत्याचार कभी पसन्द न आता होगा। यह चपरासी लोग उनसे छिपा कर यो जबरदस्ती करते हैं। लेकिन कहीं उन्होंने मुझे अपने इजलास से खड़े-खड़े निकलवा दिया तो? बड़े आदमियों को घमण्ड बहुत होता। कोई हरज नहीं, मैं सड़क पर खड़ा हो जाऊँगा और देखूँगा कि कैसे कोई मुसाफिरों की गाड़ी पकड़ता है! या तो दो-चार का सिर तोड़ के रख दूँगा या आप वहीं मर जाऊँगा। अब बिना गरम पड़े काम नहीं चल सकता। वह दादा बुलाने आ रहे हैं।

    By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text

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