पाठ-खंड 36
byपहला अंक
राजा-हाय! हाय! बैद्यो ने जवाब दिया, हकीमों ने जवाब दिया, डाकदरों ने जवाब दिया, किसी ने रोग को न पहचाना। सब-के-सब लुटेरे थे। अब जिन्दगानी की कोई आशा नहीं। यह सारा राज-पाट छूटता है। मेरे पीछे परजा पर न जाने क्या बीतेगी! राजकुमार अल्हड़ नादान है, उसकी संगत अच्छी नहीं है। (प्रेमशंकर की ओर कटाक्ष से देखकर) किसानों से मेल रखता है। उसके पीछे सरकारी आदमियों से रार करता है। जिन दीन-दुखी रोगियों की परछाईं से भी डाकदर लोग डरते हैं उनकी दवा-दारू करता है। उसे अपनी जान का, धन का तनिक भी लोभ नहीं है। यह इतना बड़ा राज कैसे सँभालेगा? अत्याचारियों को कैसे दण्ड देगा? हाय, मेरी प्यारी रानी, जिससे मैंने अभी महीने भर हुए ब्याह किया है, मेरे बिना कैसे जिएगी? कौन उससे प्रेम करेगा? हाय!
रानी-स्वामी जी, मैं सोग में मर जाऊँगी। यह उजले सनके-से बाल, यह पोपला मुँह कहाँ देखुंगी (कटाक्ष भाव से) किसको गोद में लूँगी? किससे ठुनकूँगी? अब मैं किसी तरह न बनूंगी।
राजा की साँस उखड़ जाती है, आँखें पथरा जाती है, नाड़ी छूट जाती है। रानी छाती पीटकर रोने लगती है। दरबार में हाहाकार मच जाता है।
राजा के कानों में आकाशवाणी होती है-हम तुझे एक घण्टे की मोहलत देते हैं, अगर तुझे तीन मनुष्य ऐसे मिल जाएँ जो दिल से तेरे जीने की इच्छा रखते हों तू अमर हो जाएगा।
राजा सचेत हो जाता है, उसके मुखारविन्द पर जीवन ज्योति झलकने लगती है। वह प्रसन्नमुख उठ बैठता है और आप ही आप कहता है, अब मैं अमर हो गया, अकंटक राज्य करूँगा, शत्रओं का नाश कर दूँगा। मेरे राज्य में ऐसा कौन प्राणी है जो हृदय से मेरे जीने की इच्छा न रखता हो। तीन नहीं, तीन लाख आदमी बात-बात में निकल आएँगे।
दूसरा अंक
(राजा एक साधारण नागरिक के रूप में आप-ही-आप)
समय कम है, ऐसे तीन सज्जनों के पास चलना चाहिए जो मेरे भक्त थे। पहले सेठ के पास चलूँ। वह परोपकार के प्रत्येक काम में मेरी सहायता करता था। मैंने उसकी कितनी बार रक्षा की है और उसे कितना लाभ पहुँचाया है। यह सेठ जी का घर आ गया। सेठ जी,! जरा बाहर आओ।
सेठ-क्या है? इतनी रात गए कौन काम है?
राजा-कुछ नहीं, अपने स्वर्गवासी राजा का यश गाकर उनकी आत्मा को शान्ति देना चाहता हूँ। कैसे धर्मात्मा, प्रजा-प्रिय. पुरुष थे! उनका परलोक हो जाने से सारे देश में अन्धकार-सा छा गया है। प्रजा उनको कभी न भूलेगी। आपसे तो उनकी बड़ी मैत्री थी, आपको तो और भी दुःख हो रहा होगा?
सेठ-मुझे उनके राज्य में कौन-सा सुख था कि अब दुःख होगा? मर गए, अच्छा हुआ। उनकी बदौलत लाखों रुपये साधु सन्तों को खिलाने पड़ते थे।
राजा (मन में) हाय! इस सेठ पर मुझे कितना भरोसा था। यह मेरे इशारे पर लाखों रुपये दान कर दिया करता था। सच कहा है, कि बनिए किसी के मित्र नहीं होते। मैं जन्म भर इसके साथ रहा, पर इसे पहचान न सका। अब चलूँ मन्त्री के पास, वह बड़ा स्वामि-भक्त सज्जन पुरुष है। उसके साथ मैंने बड़े-बड़े सलूक किए हैं। यह उसका भवन आ गया। शायद अभी दरबार में शोक मनाया जा रहा होगा। ऐसे धर्मात्मा राजा की मृत्यु पर जितना शोक किया जाय वह थोड़ा है। अब फिर ऐसा राजा न होगा। आपको तो बहुत ही दुःख हो रहा होगा।
मन्त्री-मुझे उनसे कौन सा सुख मिलता था कि अब दुःख होगा? मर गए, अच्छा हुआ। उनके मारे साँस लेने की भी छुट्टी न मिलती थी। प्रजा के पीछे आप मरते थे। रात-दिन कमर कसे खड़े रहना पड़ता था।
राजा-(आप-ही-आप) हाय! इस परम हितैषी सेवक ने भी धोखा दिया। मेरी आँख बन्द होते ही सारा संसार मेरा बैरी हो गया। ऐसे-ऐसे आदमी धोखा दे रहे हैं जो मेरे पसीने की जगह लोहू बहाने को तैयार रहते थे। तीन आदमी भी ऐसे नहीं, जिन्हें मेरा जीना पसन्द हो। जब दोनों निकल गए तो दूसरों से क्या आशा रखू? अब रानी के पास जाता हूँ वह साध्वी सती स्त्री है। उसकी जितनी ही सखियाँ हैं सभी मुझ पर प्राण देती थीं। वहाँ मेरी इच्छा अवश्य पूरी होगी। अब केवल थोड़ा-सा समय और रह गया है। यह राजभवन आ गया रानी अकेली मन मारे शोक में बैठी हुई है। महारानी जी, अब धीरज से काम लीजिए, आपके स्वामी ऐसे प्रतापी थे कि संसार में सदा उनका लोग यश गाया करेंगे। देह हत्या करके वह अमर हो गए।
रानी-अमर नहीं, पत्थर हो गए। उनसे संसार को चाहे जो सुख मिला हो, मुझ तो कोई सुख न मिला! उनके साथ बैठते लज्जा आती थी। मैं उनका क्या यश गाऊँ? मैं तो उसी दिन विधवा हो गई जिस दिन उनसे विवाह हुआ। वह जीते थे तब भी राँड़ थी, मर गए तब भी राँड़ हूँ। देखो तो कुँवर साहब कैसे सजीले, बाँके जवान हैं। मेरे योग्य यह न थे, कि वैसा खूसट बुड्ढा, जिसके मुँह में दाँत तक नहीं थे।
यह सुनते ही राजा एक लम्बी साँस लेता है और मूर्छित होकर गिर पड़ता है।
(अभिनय समाप्त होता है)
प्रेमशंकर को इन गँवारों के अभिनय-कौशल पर विस्मय हुआ? बनावट का कहीं नाम न था। प्रत्येक व्यक्ति ने अपना-अपना भाग स्वाभाविक रीति से पूरा किया। यद्यपि न परदे थे न कोई दूसरा सामान, तथापि अभिनय रोचक और मनोरंजक था।
सवेरे प्रेमशंकर टहलते हुए-पड़ाव की ओर चले तो देखा कि लश्कर कूच की तैयारी कर रहा है। खेमे उखड़ रहे हैं। गाड़ियों पर असबाब लद रहा है। साहब बहादुर की मोटर तैयार है और बिसेसर साह तहसीलदार के सामने कागज का एक पुलिन्दा लिये खड़े हैं। तेली, तमोली, बूचड़ आदि भी एक पेड़ के नीचे अभियुक्तों की भाँति दाम वसूल करने के लिए बैठे हुए हैं। प्रेमशंकर ने तहसीलदार से हाथ मिलाया और बैठकर तमाशा देखने लगे।
तहसीलदार-कहाँ हैं, गाड़ीवान लोग? बुलाओ, रसद का हिसाब करें। इस पर एक गाड़ीवान ने कहा, हजूर यहाँ रसद मिली है कि हमारी जान मारी गई है! आटे में इस बेईमान बनिए ने न जाने क्या मिला दिया है कि उसी दिन से पेट में दर्द हो रहा है। घी मे तेल मिलाया था, उस पर हिसाब करने को कहता है। अभी साहब से कह दें तो बच्चू को लेने के देने पड़ जाएँ।
अर्दली के कई चपरासी बोले, यह बनिया गोली मार देने के लायक है। ऐसा खराब आटा उम्र भर नहीं खाया। न जाने क्या चीज मिला दी है कि हजम ही नहीं होता। घी ऐसा बदबू करता था कि दाल खाते न बनती थी इस पर तो जुर्माना होना चाहिए। उल्टे हिसाब करने को कहता है।
एक कान्स्टेबिल महाशय ने कहा, हम इसे खूब जानते हैं, छँटा हुआ है। चीनी दी तो उसमें आधी बालू, घी में आधी घुइयाँ, आटे में आधा चोकर, दाल में आधा कूड़ा। इसे तो ऐसी जगह मारे जहाँ पानी न मिले।
कई साईस बोले, घोड़ों को जो दोना दिया है वह बिल्कुल घुना हुआ, आधा चना आधा चोकर। घोड़ों ने सूंघा तक नहीं। साहब से कह दें तो अभी हंटर पड़ने लगें।
तहसीलदार-ये सब शिकायतें पहले क्यों नहीं की?
कई आदमी-हजूर रोज तो हाय-हाय कर रहे हैं।
तहसीलदार-(प्रेमशंकर की ओर देखकर) मुझसे किसी ने भी नहीं कहा। अब यह सब मैं कुछ नहीं सुनूँगा। जिसके जिम्मे जो कुछ निकले, कौड़ी-कौड़ी दे दो। साह जी, अपना हिसाब निकालो।
बिसेसर-मौला बखश अर्दली आटा, ऽ8 घी ऽ3।। चावल ऽ2, दाल ऽ।, मसाला ऽ1, कथ्था-सपारी ऽ-चीनी ऽ1-कुल 3 रुपये।
तहसीलदार-कहाँ है मौला बख्श। दाम देकर रसीद लो।
एक अर्दली-इस नाम का हमारे यहाँ कोई आदमी नहीं है।
बिसेसर-क्यों नहीं? लम्बे-लम्बे हैं, छोटी दाढ़ी है, मुँह पर शीतला का दाग है, सामने के दो-तीन दाँत टूटे हैं।
कई अर्दली-इस हुलिया का यहाँ आदमी ही नहीं है। पहचान हममें से कौन है?
बिसेसरा-कहीं चल दिए होंगे और क्या?
तहसीलदार-अच्छा दूसरा नाम बोलो।
बिसेसर-धन्नू अहीर, चावल ऽ3, आटा ऽ2, घी ऽ1, खली ऽ4, दाना और चोकर ऽ8, तमाखू-)-कुल दो रुपये।
तहसीलदार-कहाँ है धन्नू अहीर? निकाल रुपये।
एक अर्दली-वह तो पहर रात रहे साहब का ढेरा लादकर चला गया।
तहसीलदार-हिसाब नहीं चुकाया और चल दिया। अच्छा वाजिर जी उसका नाम लिख लीजिए। कहाँ जाते हैं बच्चू? एक-एक पाई वसूल कर लूँगा।
प्रेमशंकर-यह लश्कर वालों की बड़ी ज्यादती है।
तहसीलदार-कुछ न पूछिए, कमबख खा-खा कर चल देते हैं, बदनामी बेचारे तहसीलदार की होती है।
बिसेसर साह ने फिर ऐसा ही ब्यौरा पढ़ सुनाया। यह जयराम चपरासी का पुर्जा था। जयराम उपस्थित थे। आगे बढ़कर बोले, क्यों रे घी ऽ।। लिया था कि ऽ-?
बिसेसर-कागद में तो लिखा हुआ है।
जयराम-झूठ लिखा है, सोलहों आने झूठ।
तीहसीलदार-अच्छा ऽ-का दाम दो, या कुछ भी नहीं देना चाहते?
यह झमेला नौ-दास बजे तक रहा। एक तिहाई से अधिक आदमी बिना हिसाब चुकाए ही प्रस्थान कर चुके थे। एक चौथाई से अधिक आदमी लापता हो गए। आधे आदमी मौजूद थे, लेकिन उन्हें भी हिसाब के ठीक होने में सन्देह था। ऐसे दस ही पाँच सज्जन निकले जिन्होंने खरे-दाम चुका दिए हों। जब सब चिटें समाप्त हो गईं तो बिसेसर साह ने उन्हें लाकर तहसीलदार के सामने पटक दिया और बोला, मैं और किसी को नहीं जानता, एक हुजूर को जानता हूँ और हुजूर के हुक्म से मैंने रसद दी है।
तहसीलदार-मैं क्या अपनी गिरह से दूँगा?
बिसेसर-हुजूर जैसे चाहे दें या दिला दें। 200 रु. में यह 70 रु. मिले हैं। मैं टके का आदमी इतना धक्का कैसे उठाऊँगा? महाजन मेरा घर बिकवा लेगा।
तहसीलदार-अच्छी बात है, तुम्हारे दाम मिलेंगे। नाजिर जी, चपरासियों को लेकर जाइए,। इसके बही खाते उठा लाइए और खुद इसकी सालाना आमदनी का हिसाब कीजिए। देखिए, अभी कलई खुली जाती है। मैं इसके सब रुपये का हिसाब दूँगा, पर इसी से लेकर। बच्चू, दो हजार रुपये साल नफा करते हो, उस पर एक बार 100 रुपये का घाटा हुआ तो दम निकल गया?
कहाँ तो बिसेसर साह इतने गरम हो रहे थे, कहाँ यह धमकी सुनते ही भीगी बल्ली बन गए। बोले, हाँ हुजूर, सब हिसाब-किताब जाँच लें। इस गाँव में ऐसा कौन रोजगार है कि दो हजार का नफा हो जाएगा? खाने भर को मिल जाए यही बहुत है।
तहसीलदार-और यह आस-पास के देहातों का अनाज किसके घर में भरा जाता है? तुम समझते हो कि हाकिमों को खबर ही नहीं होती। यहाँ इतना बतला सकते हैं कि आज तुम्हारे घर में क्या पक रहा है। यह रिआयत इसी दिन के लिए करते हैं, कुछ तुम्हारी सूरत देखने के लिए नहीं।
बिसेसर साह चुपके से सरक गए। तेली-तमोली ने भी देखा कि यहाँ मिलता-जुलता तो कुछ नहीं दीखता, उल्टे और पलेथन लगने का भय है तो उन्होंने भी अपनी राह ली। तहसीलदार ने प्रेमशंकर की ओर देखकर कहा, देखा आपने टैक्स के नाम से इन सबों की जान निकल जाती है। मैं जानता हूँ कि इसकी सालाना आमदनी ज्यादा-से-ज्यादा 1000 रु. होगी। लेकिन चाहे इस तरह कितना ही नुकसान बरदाश्त कर लें, अपने बही-खाते न दिखाएँगे। यह इनकी आदत है।
प्रेमशंकर-खैर, यह तो आपनी चाल-बाजी की बदौलत नुकसान से बच गया, मगर और बेचारे तो मुफ्त में पिस गए, उस पर जलोल हुए वह अलग।
तहसीलदार-जनाब, इसकी दवा मेरे पास नहीं है। जब तक कौम को आप लोग एक सिरे से जगा न देंगे, इस तरह के हथकण्डों का बन्द होना मुश्किल है। जहाँ दिलों में इतनी खुदगरजी समाई हुई है और जहाँ रियाया इतनी कच्ची वहाँ किसी तरह की इसलाह नहीं हो सकती। (मुस्कराकर) हम लोग एक तौर पर आपके मददगार है। रियाया को सताकर, पीसकर मजबूत बनाते हैं और आप जैसे कौमी हमदर्दो के लिए मैदान साफ करते हैं।
प्रभात का समय था और कुआर का महीना। वर्षा समाप्त हो चुकी थी। देहातों में जिधर निकल जाइए, सड़े हुए सन की सुगन्ध उड़ती थी। कभी जेयेष्ठ को लज्जित करने वाली धूप होती थी, कभी सावन को सरमाने वाले बादल घिर आते थे। मच्छर और मलेरिया का प्रकोप था, नीम की छाल और गिलोय की बाहर थी। चरावर में दूर तक हरी-हरी घास लहरा रही थी। अभी किसी को उसे काटने का अवकाश न मिलता था। इसी समय बिन्दा महाराज और कर्तारसिंह लाठी कंधे पर रखे एक वृक्ष के नीचे आकर खड़े हो गये। कर्तार ने कहा, इस बुड्ढे को खुचट सूझती रहती है। भला बताओ, जो यहाँ मवेशी न चरने पायेंगे तो कहाँ जाएँगे और जो लोग सदा से चराते आये हैं वे मानेंगे कैसे? एक बेर कोई इसकी मरम्मत कर देता तो यह आदत छूट जाती।
बिन्दा-हमका तो ई मौजा मा तीस बरसें होय गईं। तब से कारिन्दे आये पर चरावर कोऊ न रोका।गाँव भर के मवेशी मजे से चरत रहे।
कर्तार-उन्हें हुकुम देते क्या लगता है! जायगी तो हमारे माथे।
बिन्दा-हमारे जी तो अस ऊब गया है कि मन कत है छोड़-छाड़ के घर चला जाई। सुनित है मालिक अवैया हैं। बस, एक बेर उनसे भेंट होय जाय और अपने घर के राह लेई।
कर्तार-फैज दिन भर खाट पर पड़ा रहता है, उससे कुछ नहीं कहते। जब देखो कर्तार को ही दौड़ाते हैं, मानो कर्तार उनके बाप का गुलाम है। और देखो, पीपल के नीचे जहाँ हम तुम जल चढ़ाते हैं। वहाँ नमाज पढ़ते हैं, वहीं दतुअन-कुल्ली करते हैं, वहीं नहाते हैं। बताओ, धरम नष्ट भया कि रहा? आप तो रोज कुरान पढ़ते हैं और मैं रामायण पढ़ने लगता हूँ तो कैसे डाँट के कहते हैं, क्या शोर मचा रखा है। अबकी असाढ़ में 300 रु. नजराना मिला; मुझे एक पाई से भेंट न हुई।
बिन्दा-हमका तो एक रुपया मिला रहे।
कर्तार-यह भी कोई मिलने में मिलना है। और सब कहा चपरासियों को रुपये में आठ आने मिलते हैं। यह कुछ न दें तो चार आने तो दें, लेना-देना दूर रहा उस पर आठों पहर सिर पर सवार। कल तुम कहीं गये थे। मुझसे बोले, कर्तार एक घड़ा पानी तो खींच लो। मैंने तुरन्त जवाब दिया, इसके नौकर नहीं हैं, फौजदारी करा लो, लाठी चलवा लो, अगर कदम पीछे हटाये तो कहो, लेकिन चिलम भरना, पानी खींचना हमारा काम नहीं है। इस पर आँखें लाल-पीली की। एक दिन पीपल के नीचे दाली मूरतों को देखकर बोले, यह क्या ईंट-पत्थर जमा कर रखे हैं। मैंने तो ठान लिया है कि जहाँ अबकी कोई नजराना लेकर आया और मैंने हाथ पकड़ा कि चार आने इधर रखिये। जरा भी गरम-नरम हुए, मुँह से लाम काफ निकाली और मैंने गरदन दबायी। फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा। फैजू बोले तो उनसे भी मैं समझूगा। खूब पड़े-पड़े रोटी गोस उड़ा रहे हैं, सब निकाल दूँगा। वह देखो मवेशी इधर आ रहे हैं। बलराज तो नहीं है न?
By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text
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