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    Chapter Index

    यही बातें हो रही थीं कि फैजू और कर्तारसिंह ने सामने आकर सलाम किया। ज्ञानशंकर ने पूछा, कहो खैरियत तो है।

    फैजू-हुजूर, खैरियत क्या कहें! रात को किसी ने खाँ साहब को मार डाला।

    ईजाद हुसेन और इर्फान अली चौंक पड़े, लेकिन ज्ञानशंकर लेश-मात्र भी विचलित न हुए, मानो उन्हें यह बात पहले ही मालूम थी। बोले, तुम लोग कहाँ थे? कहीं सैर-सपाटे करने चल दिये थे या अफीम की पिनक में पड़े हुए थे।

    फैजू-हुजूर, थे तो चौपाल में ही, पर किसी को क्या खबर कि यह वारदात होगी?

    ज्ञान-क्यों, खबर क्यों न थी? जो आदमी साँप को पैरों से कुचल रहा हो उसे यह मालूम होना चाहिए कि साँप के दाँत जहरीले होते हैं। जमींदारी करना साँप को नचाना है। वह सँपेरा अनाड़ी है जो साँप को काटने का मौका दे! खैर, कातिल का कुछ पता चला?

    फैज-जी हाँ, वही मनोहर अहीर है। उसने सवेरे ही थाने में जा कर एकवाल कर दिया। दोपहर को थाने दार साहब आ गये और तहकीकात कर कर रहे हैं। खाँ साहब का तार हुजूर को मिल गया था? जिस दिन खाँ साहब ने चरावर को रोकने का हुक्म दिया उसी दिन गाँव वालों में एका हो गया। खाँ साहब ने घबड़ाकर हुजूर को तार दिया। मैं तीन बजे तारघर से लौटा तो गाँव में मुकदमा लड़ने के लिए चन्दे का गुट हो रहा था। रात को यह वारदात हो गयी।

    अकस्मात् प्रेमशंकर लाला प्रभाशंकर के साथ आ गये। ज्ञानशंकर को देखते ही प्रेमशंकर टूटकर उनसे गले मिले और पूछा, कब आये? सब कुशल है न?

    ज्ञानशंकर ने रुखाई से उत्तर दिया, कुशल का हाल इन आदमियों से पूछिए जो अभी लखनपुर से आये हैं। गाँव वालों ने गौस खाँ का काम तमाम कर दिया।

    प्रेमशंकर स्तम्भित हो गये। मुँह से निकला, अरे! यह कब?

    ज्ञान-आज ही रात को।

    प्रेम-बात क्या है?

    ज्ञान-गाँव वालों की बदमाशी और सरकशी के सिवा और क्या बात हो सकती है। मैंने चरावर को रोकने का हुक्म दिया था। वहाँ एक बाग लगाने का विचार था। बस, इतना बहाना पाकर सब खून-चच्चर पर उद्यत हो गये।

    प्रेम-कातिल का कुछ पता चला?

    ज्ञान-अभी तो मनोहर ने थाने में जाकर एक बाल किया है।

    प्रेम-मनोहर तो बड़ा सीधा, गम्भीर पुरुष है।

    ज्ञान-(व्यंग्य से) जी हाँ, देवता था।

    डॉक्टर साहब ने मार्मिक भाव से देखकर कहा, यह किसी एक आदमी का फेल हार्गिज नहीं है।

    ज्ञान-वही मेरा भी ख्याल है। मनोहर की इतनी मजाल नहीं है कि वह अकेला यह काम कर सके। निस्सन्देह सारा गाँव मिला हुआ है। मनोहर को सबने तबेले का बन्दर बना रखा है। देखिए थानेदार की तहकीकात का क्या नतीजा होता है। कुछ भी हो, अब मैं इस मौजे को वीरान करके ही छोडूंगा। क्यों फैजू, तुम्हारा क्या ख्याल है? मनोहर अकेले यह काम कर सकता है?

    फैजू-नहीं हुजूर, साठ बरस का बुड्ढा भला क्या खाकर हिम्मत करता! और कोई चाहे उसका मददगार न हो, लेकिन उसका लड़का तो जरूर ही साथ रहा होगा।

    कर्तार-वह बुड्ढा है तो क्या, बड़े जीवट का आदमी है। उसके सिवा गाँव में किसी का इतना कलेजा नहीं है।

    ज्ञान-तुम गँवार आदमी हो, इन बातों को क्या समझो। तुम्हें भंग का गोला चाहिए। डॉक्टर साहब, मुआमले में मुद्दई तो सरकार होगी, लेकिन आप भी मेरी तरफ से पैरवी कीजिएगा। मैंने फैसला कर लिया है कि गाँव के किसी बालिग आदमी को बेदाग न छोडूंगा।

    प्रेमशंकर ने दबी जबान से कहा, अगर तुम्हें विश्वास हो कि यह एक आदमी का काम है तो सारे गाँव को समेटना उचित नहीं। ऐसा न हो कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाय।

    ज्ञानशंकर क्रुद्ध होकर बोले, बहुत अच्छा हो अगर आप इस विषय में अपने सत्य और न्याय के नियमों का स्वाँग न रचें। यह इन्हीं की बरकत है कि आज इन दुष्टों को इतना साहस हुआ है। आप मुझे साफ-साफ कहने पर मजबूर कर रहे हैं। ये सब आपके ही बल पर कूद रहे हैं। आपने प्रत्येक अवसर पर मेरे विपक्ष में उनकी सहायता की है, उनसे भाईचारा किया है। और उनके सिर पर हाथ रखने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

    आपके इसी भ्रातृ-भाव ने उनके सिर फिरा दिये। मेरा भय उनके दिल से जाता रहा। आपके सिद्धान्तों और विचारों का मैं आदर करता हूँ, लेकिन आप कड़वी नीम को दूध से सींच रहे हैं। और आशा करते हैं कि मीठे फल लगेंगे। ऐसे कुपात्रों के साथ ऊँचे नियमों का व्यवहार करना दीवाने के हाथ में मशाल दे देना है।

    प्रेमशंकर ने फिर जबान न खोली और न सिर उठाया। लाला प्रभाशंकर को ये बातें बुरी लगीं कि वह तुरन्त उठकर चले गये। लेकिन प्रेमशंकर आत्म-परीक्षा में मौन मूर्तिवत् बैठे रहे। दीन देहातियों के साथ साधारण सज्जनता का बर्ताव करने का परिणाम ऐसा भयंकर होगा यह एक बिलकुल नया अनुभव था। केवल एक आदमी की जान ही नहीं गयी, वरन् और भी कितने ही प्राणों के बलिदान होने की आशंका थी। भगवान् उन गरीबों पर दया करो। मैंने सच्चे हृदय से उनकी सेवा नहीं की। द्वेष का भाव मुझे प्रेरित करता रहा। मैं ज्ञानशंकर को नीचा दिखाना चाहता था। यह समस्या उसी द्वेष भाव का दंड है। क्या एक लखनपुर ही अपने जमींदार के अत्याचार से पीड़ित था? ऐसा कौन-सा इलाका है जो जमींदार के हाथों रक्त के आँसू न बहा रहा हो। तो लखनपुर के ही प्रति मेरी इतनी सहानुभूति क्यों प्रचंड हो गयी और फिर ऐसे अत्याचार क्या इससे पहले न होते थे? यह तो आये दिन ही होता रहता था; लेकिन कभी असामियों को यूँ करने की हिम्मत न पड़ती थी। इस बार वह क्यों मार-काट पर उद्यत हो गये! इन शंकाओं का उन्हें एक ही उत्तर मिलता था। और वही उस उत्तरदायित्व के भार को और गुरुतर बना देता था। हाय! मैंने कितने प्राणों को अपनी ईर्ष्याग्नि के कुंड में झोंक दिया। अब मेरा कर्तव्य क्या है? क्या यह आग लगाकर दूर से खड़ा तमाशा देखूँ ? यह सर्वथा निन्द्य है। अब तो इन अभागों की यथा योग्य सहायता करनी ही पडेगी, चाहे ज्ञानशर को कितना ही बुरा लगे। इसके सिवा मेरे लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

    प्रेमशंकर इन्हीं विचारों में डूबे हुए थे कि मायाशंकर ने आकर कहा, चाचा जी, अम्मा कहती हैं अब तो बहुत देर हो गयी, हाजीपुर में कैसे जाइएगा? यहीं भोजन कर लीजिए, और आज यहीं रह जाइए।

    प्रेमशंकर शोकमय विचारों की तरंग में भूल गये कि अभी मुझे हाजीपर लौटना है। माया को प्यार करके बोले, नहीं बेटा, मैं चला जाऊँगा, अभी ज्यादा रात नहीं गयी है। यहाँ रह जाऊँ, तो वहाँ बड़ा हर्ज होगा।

    यह कहकर वह उठ खड़े हुए। ज्ञानशंकर की ओर करुण नेत्रों से देखा और बिना कुछ कहे ही चले गये। ज्ञानशंकर ने उनकी तरफ ताका भी नहीं।

    उनके जाने के बाद डॉक्टर महोदय बोले, मैं तो इनकी बड़ी तारीफ सुना करता था पर पहली ही मुलाकात में तबीयत आसूदा हो गयी। कुछ क्रुद्ध से मालूम होते हैं।

    ज्ञान-बड़े भाई हैं, उनकी ज्ञान मैं क्या कहूँ, कुछ दिनों अमेरिका क्या रह आये हैं गोया हक और इन्साफ का ठेका ले लिया है। हालाँकि अभी तक अमेरिका में भी यह खयालात अमल के मैदान से कोसों दूर हैं। दुनिया में इन खयालों के चर्चे हमेशा रहे हैं और हमेशा रहेंगे। देखना सिर्फ यह है कि यह कहाँ तक अमल में लाए जा सकते हैं। मैं खुद इन उसूलों का कायल हूँ, मेरे खयाल में अभी बहुत दिनों तक इस जमीन में यह बीज सरसब्ज नहीं हो सकता है।

    इसके बाद कुछ देर तक इस दुर्घटना के सम्बन्ध में बातचीत होती रही। जब डॉक्टर साहब और ईजाद हुसेन चले गये तब ज्ञानशंकर घर में जाकर बोले, देखा भाई साहब ने लखनपुर में क्या गुल खिलाया? अभी खबर आई है कि गौस खाँ को लोगों ने मारा डाला। दोनों स्त्रियाँ हक्की-बक्की होकर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगीं।

    ज्ञानशंकर ने फिर कहा, यह वर्षों से वहाँ जा-जा कर असामियों से जाने क्या कहते थे; न जाने क्या सिखाते थे, जिसका यह नतीजा निकला है। मैंने जब इनके वहाँ आने-जाने की खबर पाई तो उसी वक्त मेरे कान खड़े हुए और मैंने इनसे विनय की थी कि आप गँवारों को अधिक सिर न चढ़ायें। उन्होंने मुझे भी वचन दिया कि उनसे कोई सम्बन्ध न रखूँगा। लेकिन अपने आगे किसी की समझते ही नहीं। मुझे भय है कि कहीं इस मामले में वह भी न फँस जाएँ। पुलिवाले एक ही कट्टर होते हैं। वह किसी न किसी मोटे असामी को जरूर फाँसेंगे। गाँव वालों पर जरा सख्ती की, सब खुल पड़ेंगे और सारा अपराध भाई साहब के सिर डाल देंगे।

    श्रद्धा ने ज्ञानशंकर की ओर कातर नजरों से देखा और सिर झुका लिया। अपने मन के भावों को प्रकट न कर सकी। विद्या ने कहा, तुम जरा थानेदार के पास क्यों नहीं चले जाते? जैसे बने, उन्हें राजी कर लो।

    ज्ञान-हाँ, कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा, लेकिन एक छोटे आदमी की खुशामद करना, उसके नखरे उठाना कितने अपमान की बात है! भाई साहब को ऐसा न समझता था।

    श्रद्धा ने सिर झुकाये हुए सरोष स्वर में कहा, पुलिसवाले उन पर जो अपराध लगायें; वह ऐसे आदम नहीं हैं कि गाँववालों को बहकाते फिरें; बल्कि अगर गाँववालों की नीयत उन्हें पहले मालूम हो जाती तो यह नौबत ही न आती। तुम्हें थानेदार की खुशामद करने की कोई जरूरत नहीं। वह अपनी रक्षा आप कर सकते हैं।

    विद्या-मैं तुम्हें बराबर समझाती आती थी कि देहातियों से राड़ न बढ़ाओ। बिल्ली भी भागने को सह नहीं पाती तो शेर हो जाती है। लेकिन तुमने कभी कान ही न दिये।

    ज्ञान-कैसी बेसिर पैर की बातें करती हो? मैं इन टकड़गदे किसानों से दबता फिरूँ? जमींदार न हुआ कोई चरकटा हुआ। उनकी मजाल थी कि मेरे मुकाबले में खड़े होते? हाँ, जब अपने ही घर में आग लगाने वाले मौजूद हों तो जो कुछ न हो जाय वह थोड़ा है। मैं एक नहीं सौ बार कहूँगा कि अगर भाई साहब ने इन्हें सिर न चढ़ाया होता तो आज इनके हौसले इतने न बढ़ते।

    विद्या-(दबी जबान से) सारा शहर जिसकी पूजा करता है उसे तुम घर में आग लगानेवाले कहते हो?

    ज्ञान-यही लोक-सम्मान तो सारे उपद्रवों का कारण है।

    श्रद्धा और ज्यादा न सुन सकी। उठकर अपने कमरे में चली गयी। तब ज्ञानशंकर ने कहा, मुझे तो इनके फँसने में जरा सन्देह नहीं है।

    विद्या-तुम अपनी ओर से उनके बचाने में कोई बात उठा न रखना, यह तुम्हारा धर्म है। आगे विधाता ने जो लिखा है वह तो होगा ही।

    ज्ञान-भाभी की तबियत का कुछ और ही रंग दिखाई देता है।

    विद्या-तुम उनका स्वभाव जानते नहीं। वह चाहे दादा जी के साये से भागे, पर उनके नाम पर जान देती हैं, हृदय से उनकी पूजा करती हैं।

    ज्ञान-इधर भी चलती हैं, उधर भी।

    विद्या-इधर लोक लाज से चलती हैं, हृदय उधर ही है।

    ज्ञान-तो फिर मुझे कोई और ही उपाय सोचना पड़ेगा।

    विद्या-ईश्वर के लिए ऐसी बातें न किया करो।

    श्रद्धा की बातों से पहले तो ज्ञानशंकर को शंका हुई, लेकिन विचार करने पर यह शंका निवृत्त हो गयी; क्योंकि इस मामले में प्रेमशंकर का अभियुक्त हो जाना अवश्यम्भावी था। ऐसी अवस्था में श्रद्धा के क्रोध से ज्ञानशंकर को कोई हानि न हो सकती थी।

    ज्ञानशंकर ने निश्चय किया कि इस विषय में मुझे हाथ-पैर हिलाने की कोई जरूरत नहीं है। सारी व्यवस्था मेरे इच्छानुकूल है। थानेदार स्वार्थवश इस इस मामले को बढ़ायेगा, सारे गाँव को फँसाने की चेष्टा करेगा और उसका सफल होना असन्दिग्ध है। गाँव में कितनी ही एका हो, पर कोई न कोई न कोई मुखबिल निकल ही आयेगा। थानेदार ने लखनपुर के जमींदार दफ्तर की जाँच-पड़ताल अवश्य ही की होगी। वहाँ मेरे ऐसे दो-चार पत्र अवश्य ही निकल आयेंगे जिनसे गाँववालों के साथ भाई साहब की सहानुभूति और सदिच्छा सिद्ध हो सके। मैंने अपने कई पत्रों में गौस खाँ को लिखा है कि भाई साहब का यह व्यवहार मुझे पसन्द नहीं। हाँ, एक बात हो सकती है। सम्भव है कि गाँववाले रिश्वत देकर अपना गला छुड़ा लें और थानेदार अकेले मनोहर का चालान करे। लेकिन ऐसे संगीन मामले में थानेदार को इतना साहस नहीं हो सकता। वह यथासाध्य इस घटना को महत्त्वपूर्ण सिद्ध करेगा। भाई साहब से अधिकारी वर्ग उनके निर्भय लोकवाद के कारण पहले से ही बदगुमान हो रहा है। सब इन्स्पेक्टर उन्हें इस षड्यन्त्र का प्रेरक साबित करके अपना रंग जरूर जमायेगा। अभियोग सफल हो गया तो उसकी तरक्की भी होगी, पारितोषिक भी मिलेगा। गाँव वाले कोई बड़ी रकम देने की सामर्थ्य नहीं रखते और थानेदार छोटी रकम के लिए अपनी आशाओं को मिट्टी में न मिलायेगा। बन्धु-विरोध का विचार मिथ्या है। संसार में सब अपने लिए जीते और मरते हैं, भावुकता के फेर में पड़कर अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारना हास्यजनक है।

    ज्ञानशंकर का अनुमान अक्षरशः सत्य निकला। लखनपुर के प्रायः सभी बालिग आदिमयों का चालान हुआ। बिसेसर साह को टैक्स की धमकी ने भेदिया बना दिया। जमींदारी दफ्तर का भी निरीक्षण हुआ। एक सप्ताह पीछे हाजीपुर में प्रेमशंकर की खाना तलाशी हुई और वह हिरासत में ले लिए गये।

    सन्ध्या का समय था। ज्ञानशंकर मुन्नू को साथ लिये हवा खाने जा रहे थे कि डॉक्टर इर्फान ने यह समाचार कहा। ज्ञानशंकर के रोयें खड़े हो गये और आँखों में आँसू भर आये। एक क्षण के लिए बन्धु-प्रेम ने छुद्र भावों को दबा दिया लेकिन ज्यों ही जमानत का प्रश्न सामने आया, यह आवेग शान्त हो गया। घर में खबर हुई तो कुहराम मच गया। श्रद्धा मूर्छित हो गयी, बड़ी बहू तसल्ली देने आयीं। मुन्नू भी भीतर चला गया और माँ की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा।

    प्रेम शंकर शहर से कुछ ऐसे अलग रहते थे कि उनका शहर के बड़े लोगों से परिचय बहुत कम था। वह रईसों से बहुत कम मिलते थे। कुछ विद्वज्जनों ने पत्रों में कृषि सम्बन्धी लेख अवश्य देखे थे और उनकी योग्यता के कायल थे; किन्तु उन्हें झक्की समझते थे। उनके सच्चे शुभचिन्तकों में अधिंकाश कॉलेज के युवक, दफ्तरों के कर्मचारी या देहातों के लोग थे। उनके हिरासत में आने की खबर पाते ही हजारों आदमी एकत्र हो गये और प्रेमशंकर के पीछे-पीछे पुलिस स्टेशन तक गये; लेकिन उनमें कोई भी ऐसा न था, जो जमानत देने-का प्रयत्न कर सकता।

    By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text

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