Find your next favourite story.
    Chapter Index

    किन्तु कादिर निश्चित और निश्शंक अपने काम में लगा रहता था। उसे एक क्षण के लिए भी यह भय न होता था कि गाँव के जमींदार और कारिन्दा मेरे शत्रु हो रहे हैं और उनकी शत्रुता मेरा सर्वनाश कर सकती है। यदि इस समय भी दैवयोग से खाँ साहब बीमार पड़ जाते, तो वह उनका इशारा पाते ही तुरन्त उनके उपचार और सेवाशुश्रूषा में दत्तचित्त हो जाता। उसके हृदय में राग और द्वेष न था और न इस बात की ही परवाह थी कि मेरे विषय में कैसे-कैसे मिथ्यालाप हो रहे हैं! बह गाँव में विद्रोहाग्नि भड़का सकता था; खाँ साहब और उनके सिपाहियों की खबर ले सकता था। गाँव में ऐसे उदंड नवयुवक थे, जो इस अनिष्ट के लिए आतुर थे, किन्तु कादिर उन्हें संभाले रहता था। दीन रक्षा उसका लक्ष्य था, किन्तु क्रोध और द्वेष को उभाड़कर नहीं, वरन् सद्व्यवहार तथा सत्य प्रेरणा से।

    मनोहर की दशा इसके प्रतिकूल थी। जिस दिन से वह ज्ञानशंकर की कठोर बातें सुनकर लौटा था, उसी दिन से विकृत भावनाएँ उसके हृदय और मस्तिष्क में गूँजती रहती थीं। एक दीन मर्माहत पक्षी था, जो घावों से तड़प रहा था! वह अपशब्द उसे एकक्षण भी नहीं भूलते थे। वह ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहता था। वह जानता था कि सबलों से बैर बढ़ाने में मेरा ही सर्वनाश होगा, किन्तु इस समय उसकी अवस्था उस मनुष्य की-सी हो रही थी, जिसके झोंपड़े में आग लगी हो और वह उसके बुझाने में असमर्थ होकर शेष भागों में भी आग लगा दे कि किसी प्रकार इस विपत्ति का अंत हो। रोगी अपने रोग को असाध्य देखता है, तो पथ्यापथ्य की बेड़ियों को तोड़ कर मृत्यु की ओर दौड़ता है। मनोहर चौपाल के सामने से निकलता तो अकड़कर चलने लगता। अपनी चारपाई पर बैठे हुए कभी खाँ साहब या गिरधर महाराज को आते देखता, तो उठकर सलाम करने के बदले पैर फैलाकर लेट जाता। सावन में उसके पेड़ों के आम पके, उसमें सब आम तोड़कर घर में रख लिए, जमींदार का चिरकाल से बँधा हुआ चतुर्थांश न दिया और जब गिरधर महाराज माँगने आए तो उन्हें दुत्कार दिया। वह सिद्ध करना चाहता था कि मुझे तुम्हारी धमकियों की जरा भी परवाह नहीं है, कभी-कभी नौ-दस बजे रात तक उसके द्वार पर गाना होता, जिसका अभिप्राय केवल खाँ साहब और सुक्खू चौधरी को जलाना था। बलराज को अब वह स्वेच्छाचार प्राप्त हो गया, जिसके लिए पहले उसे झिड़कियों खानी पड़ती थीं। उसके रंगीले सहचरों का यहाँ खूब आदर-सत्कार होता, भंग छनती, लकड़ी के खेल होते, लावनी और ख्याल की तानें उड़ती इफली बजती। मनोहर जवानी के जोश के साथ इन जमघटों में सम्मिलित होता। ये ही दोनों पक्षों के विचार विनिमय के माध्यम थे। खाँ साहब को एक-एक बात की सूचना यहाँ हो जाती थी। यहाँ का एक-एक शब्द वहाँ पहुँच जाता था। यह गुप्त चालें आग पर तेल छिड़कती रहती थीं। खाँ साहब ने एक दिन कहा, आजकल तो उधर गुलछर्रे उड़ रहे हैं, बेदखली का सम्मन पहुँचेगा तो होश ठिकाने हो जाएगा। मनोहर ने उत्तर दिया, बेदखली की धमकी दूसरों को दें, यहाँ हमारे खेत के मेड़ों पर कोई आया तो उसके बाल-बच्चे उसके नाम को रोएँगे।

    एक दिन सन्ध्या समय, मनोहर द्वार पर बैठा हुआ बैलों के लिए कड़वी छाँट रहा था और बलराज अपनी लाठी में तेल लगाता था कि ठाकुर डपटसिंह आकर माचे पर बैठ गए और बोले, सुनते हैं डिप्टी ज्वालासिंह हमारे बाबू साहब के पुराने दोस्त हैं! छोटे सरकार के लड़के थानेदार थे, उनका मुकदमा उन्हीं के इजलास में था। वह आज बरी हो गए।

    मनोहर-रिसवत तो साबित हो गई थी न?

    डपटसिंह-हाँ, साबित हो गई थी। किसी को उनके बरी होने की आशा न थी। पर बाबू शंकर ने ऐसी सिफारिस पहुँचाई कि डिप्टी साहब को मुकदमा खारिज करना पड़ा।

    मनोहर-हमारे परगने का हाकिम भी तो वहीं डिप्टी है।

    डपट-हाँ, इसी को तो चिन्ता है। इजाफा लगान का मामला उसी के इजलास में जाएगा और ज्ञान बाबू अपना पूरा जोर लगाएँगे?

    मनोहर-तब क्या करना होगा?

    डपट-कुछ समझ में नहीं आता।

    मनोहर-ऐसा कोई कानून नहीं बन जाता कि बेसी का मामला इन हाकिमों के इजलास में न पेश हुआ करे। हाकिम लोग आप भी तो जमींदार होते हैं, इसलिए वह जमींदारों का पक्ष करते हैं। सुनते हैं, लाट साहब के यहाँ कोई पंचायत होती है। यह बातें उस पंचायत में कोई नहीं कहता?

    डपट-वहाँ भी तो सब जमींदार होते हैं, काश्तकारों की फरयाद कौन करेगा?

    मनोहर-हमने तो ठान लिया है कि एक कौड़ी भी बेसी न देंगे।

    बलराज ने लाठी कन्धे पर रखकर कहा, कौन इजाफा करेगा, सिर तोड़ के रख दूँगा।

    मनोहर-तू क्यों बीच में बोलता है? तुझसे तो हम नहीं पूछते। यह तो न होगा कि साँझ हो गई है, लाओ भैंस दुह लूँ, बैल की नाद में पानी डाल दूँ। बे बात की बात बकता है। (ठाकुर से) यह लौंडा घर का रत्ती भर काम नहीं करता। बस खाने भर का घर से नाता है, मटरगस किया करता है।

    डपट-मुझसे क्या कहते हो मेरे यहाँ तो तीन-तीन मूसलचन्द हैं।

    मनोहर-मैं तो एक कौड़ी बेसी न दूँगा, और न खेत ही छोईंगा। खेतों के साथ जान भी जाएगी और दो-चार के साथ लेकर जाएगी।

    बलराज-किसी ने हमारे खेतों की ओर आँख भी उठाई तो कुशल नहीं।

    मनोहर-फिर बीच में बोला ?

    बलराज-क्यों न बोलूँ, तुम तो दो-चार दिन के मेहमान हो, जो कुछ पड़ेगी। वह तो हमारे ही सिर पड़ेगी। जमींदार कोई बादशाह नहीं है कि चाहे जितनी जबरदस्ती करे और वह मुँह न खोलें। इस जमाने में तो बादशाहों का भी इतना अख्तियार नहीं, जमींदार किस गिनती में है! कचहरी-दरबार में कहीं सुनाई नहीं है तो (लाठी दिखला कर) यह तो कहीं नहीं गई है।

    डपट-कहीं खाँ साहब यह बातें सुन लें तो गजब हो जाए।

    बलराज-तुम खाँ साहब से डरो, यहाँ उनके दबैल नहीं हैं। खेत में चाहे कुछ उपज हो या न हो, बेसी होती चली जाए, ऐसा क्या अन्धेर है? 'सरकार के घर कुछ तो न्याय होगा, किस बात पर बेसी मंजूर करेगी।

    डपट-अनाज का भाव नहीं चढ़ गया है?

    बलराज-भाव चढ़ गया है तो मजदूरों की मजदूरी भी चढ़ गई है, बैलों का दाम भी तो चढ़ गया है, लोहे-लक्कड़ का दाम भी तो चढ़ गया है, यह किसके घर से आएगा?

    इतने में तो कादिर मियाँ घास का गट्ठर सिर पर रखे हुए आकर खड़े हो गए। बलराज की बातें सुनी तो मुस्कराकर बोले, भाँग का दाम भी तो चढ़ गया है। चरस भी महँगी हो गई है, कत्था-सुपारी भी तो दूने दामों में बिकती हैं, इसे क्यों छोड़े जाते हो?

    मनोहर-हाँ, कादिर दादा, तुमने हमारे मन की कही।

    बलराज-तो क्या अपनी जवानी में तुम लोगों ने बूटी-भाँग न पी होगी? या सदा इसी तरह एक जून चबेना और दूसरी जून रोटी-साग खाकर दिन काटे हैं? और फिर तुम जमींदार के गुलाम बने रहो तो उस जमाने में और कर ही क्या सकते थे? न अपने खेत में काम करते, किसी दूसरे के खेत में मजदूरी करते। अब तो शहरों में मजदूरों की माँग है, रुपया रोज खाने को मिलता है, रहने को पक्का घर अलग। अब हम जमींदारों की धौंस क्यों सहें, क्यों भर पेट खाने को तरसें?

    कादिर-क्यों मनोहर, क्या खाने को नहीं देते?

    बलराज-यह भी कोई खाना है कि एक आदमी खाय और घर के सब आदमी उपास करें? गाँव में सुक्खू चौधरी को छोड़कर और किसी के घर दोनों बेला चूल्हा जलता है? किसी कबो एक जून चबेना मिलता है, कोई चुटकी भर सत्तू फाँककर रह जाता है। दूसरी बेला भी पेट भर रोटी नहीं मिलती।

    कादिर-भाई, बलराज बात तो सच्ची कहता है। इस खेती में कुछ रह नहीं गया, मजदूरी भी नहीं पड़ती। अब मेरे ही घर देखो, कुल छोटे-बड़े मिलाकर दस आदमी हैं, पाँच-पाँच रुपये भी कमाते तो दह सौ रुपये साल भर के होते। खा-पी कर पचास रुपये बचे ही रहते। लेकिन इस खेती में रात-दिन लगे रहते हैं, फिर भी किसी को भर पेट दाना नहीं मिलता।

    डपट-बस, एक मरजाद रह गई है, दूसरों की मजूरी नहीं करते बनती, इसी बहाने से किसी तरह निबाह हो जाता है। नहीं तो बलराज की उमिर में हम लोग खेत के डाँढ पर न जाते थे। न जाने क्या हुआ कि जमीन की बरक्कत ही उठ गई। जहाँ बीघा पीछे बीस-बीस मन होते थे, वहाँ अब चार-पाँच मन से आगे नहीं जाता।

    मनोहर-सरकार को यह हाल मालूम होता तो जरूर काश्तकारों पर निगाह करती।

    कादिर-मालूम क्यों नहीं है? रत्ती-रती का पता लगा लेती है।

    डपट-(हँसकर) बलराज से कहो, सरकाल के दरबार में हम लोगों की ओर से फरियाद कर आए।

    बलराज-तुम लोग तो ऐसी हँसी उड़ाते हो, मानो कास्तकार कुछ होता ही नहीं। वह जमींदार की बेगार ही भरने के लिए बनाया गया है। लेकिन मेरे पास जो पत्र आता है, उसमें लिखा है कि रूस देश में कास्तकारों का राज है, वह जो चाहते हैं करते हैं। उसी के पास कोई और देश बलगारी है। वहाँ अभी हाल की बात है, कास्तकारों ने राजा को गद्दी से उतार दिया है और अब किसानों और मजदूरों की पंचायत राज करती है।

    कादिर-(कूतूहल से) तो चलो ठाकुर! उसी देश में चलें वहाँ मालगुजारी न देनी पड़ेगी।

    डपट-वहाँ के कास्तकार बड़े चतुर और बुद्धिमान होंगे तभी राज सँभालते होंगे।

    कादिर-मुझे तो विश्वास नहीं आता।

    मनोहर-हमारे पत्र में झूठी बातें नहीं होती।

    बलराज-पत्रवाले झूठी बातें लिखें तो सजा पा जाएँ।

    मनोहर-जब उस देश के किसान राजा का बन्दोबस्त कर लेते हैं, तो क्या हम लोग लाट साहब से अपना रोना भी न रो सकेंगे?

    कादिर-तहसीलदार साहब के सामने तो मुँह खुलता नहीं, लाट साइब से कौन फरियाद करेगा?

    बलराज-तुम्हारा मुँह न खुले, मेरी तो लाट साहब से बातचीत हो, तो सारी कथा कह सुनाऊँ।

    कादिर-अच्छा, अबकी हाकिम लोग दौरे पर आएँगे, तो हम तुम्हीं को उनके सामने खड़ा कर देंगे।

    यह कहकर कादिर खाँ घर की ओर चले। बलराज ने भी लाठी कन्धे पर रखी और उनके पीछे चला।

    बलराज-अच्छा तो बीच में न पड़ोगे न?

    कादिर-तो क्या तुम लोग सचमुच मार-पीट पर उतारू हो क्या? हमारी बात न मानोगे तो मैं जाकर थाने में इत्तला कर दूँगा। यह मुझसे नहीं हो सकता कि तुम लोग गाँव में आग लगाओ और मैं देखता रहूँ।

    बलराज-तो तुम्हारी सलाह है नित यह अन्याय सहते जाएँ!

    कादिर-जब अल्लाह को मन्जूर होगा तो आप-ही-हाप सब उपाय हो जाएगा। जिस भाँति सूर्यास्त के पीछे विशेष प्रकार के जीवधारी; जो न पशु हैं न पक्षी, जीविका की खोज में निकल पड़ते हैं, अपनी लम्बी श्रेणियों से आकाश मण्डल को आच्छादित कर लेते हैं, उसी भाँति कार्तिक का आरम्म होते ही एक अन्य प्रकार के जन्तु देहातों में निकल पड़ते हैं और अपने खेमों तथा छोलदारियों से समस्त ग्राममण्डल को उज्ज्वल कर देते हैं। वर्षा के आदि में राजसिक कीट और पतंग का उद्भव होता है, उसके अन्त में तामसिक कीट और पतंग का। उनका उत्थान होते ही देहातों में भुकम्प-सा आ जाता है और लोग भय से प्राण छिपाने लगते हैं।

    इसमें सन्देह नहीं कि अधिकारियों के यह दौरे सदिच्छाओं से प्रेरित होकर होते हैं। उनका अभिप्राय है जनता की वास्तविक दशा का ज्ञान प्राप्त करना न्यायप्रार्थी के द्वार तक पहुँचता, प्रजा के दुःखों को सुनना, उनकी आवश्यकताओं को देखना, उनके कष्टों का अनुमान करना, उनके विचारों से परिचित होना। यदि यह अर्थ सिद्ध होते तो यह दौरे वसन्तकाल से भी अधिक प्राण-पोषक होते, लोग वीणा, पखावज से, ढोल-मजीरे से उनका अभिवादन करते। किन्तु जिस भाँति प्रकाश की रश्मियाँ पानी में वक्रगामी हो जाती हैं, उसी भाँति सदिच्छाएँ भी बहुधा मानवीय दुर्बलताओं के सम्पर्क से विषम हो जाया करती हैं। सत्य और न्याय पैरों के नीचे आ जाता है, लोभ और सवार्थ की विजय हो जाती है। अधिकारी वर्ग और उनके कर्मचारी विरहिणी की भाँति इस सुख काल के दिन गिना करते हैं। शहरों में तो उनकी दाल नहीं गलती, या मलती है तो बहुत कम! बहाँ प्रत्येक वस्तु के लिए उन्हें जेब में हाथ डालना पड़ता है, किन्तु देहातों में जेब की जगह उनका हाथ अपने सोटे पर होता है या किसी दीन किसान की गर्दन पर! स्वप्न में भी दर्शन नहीं होता था, उन पदार्थों की यहाँ केवल जिह्वा और बाहु के बल से रेल-पेल हो जाती है। जितना खा सकते हैं, खाते हैं, बार-बार खाते हैं, और जो नहीं खा सकते, वह घर भेजते हैं। घी से भरे हुए कनस्तर, दूध से भरे हुए मटके, उपले और लकड़ी घास और चारे से लदी हुई गाड़ियाँ शहरों में आने लगती हैं। घरवाले हर्ष से फूले नहीं समाते, अपने भाग्य को सराहते हैं, क्योंकि अब दुःख के दिन गए और सुख के दिन आए। उनकी तरी वर्षा के पीछे आती है, वह खुश्की में तरी का आनन्द उठाते हैं। देहातवालों के लिए वह बड़े संकट के दिन होते हैं, उनकी शामत आ जाती है, मार खाते हैं, बेगार में पकड़े जाते है; दासत्व के दारुण निर्दय आघातों से आत्मा का भी ह्रास हो जाता है।

    अगहन का महीना था, साँझ हो गई थी। कादिर खाँ के द्वार पर अलाव लगी हुई थी। कई आदमी उसके इर्द-गिई बैठे हुए बातें कर रहे थे। कादिर ने बाजार के तम्बाकू की निन्दा की, दुखरन भगत ने उनका अनुमोदन किया। इसके बाद डपटसिंह पत्थर और बेलन के कोल्हुओं के गुण-दोष की विवेचना करने लगे, अन्त में लोहे ने पत्थर पर विजय पाई।

    दुखरन बोले, आजकल रात को मटर में सियार और हरिन बड़ा उपद्रव मचाते हैं। जाड़े के मारे उठा नहीं जाता।

    कादिर-अब की ठण्ड पड़ेगी। दिन को पछुआ चलता है। मेरे पास तो कोई कम्बल भी नहीं, वही एक दोहर लपेटे पड़ा रहता हूँ। पुआल न हो गया होता तो रात को अकड़ जाता।

    डपट-यहाँ किसके पास कम्बल है। उसी एक पुराने धुस्से की भुगुत है। लकड़ी भी इतनी नहीं मिलती कि रात भर तापें।

    By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text

    0 Comments

    Note