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    81 Results with the "Rural fiction" genre


    • पाठ-खंड 66 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक दिन वे एक पत्र लिये हुए गायत्री के पा आ कर बोले, गोरखपुर से यह बहुत जरूरी खत आया है। मुख्तार साहब ने लिखा है कि वे फसल के दिन हैं। आप लोगों का आना जरूरी है, नहीं तो सीर की उपज हाथ न लगेगी, नौकर-चाकर खा…
    • पाठ-खंड 65 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री ने रोते हुए कहा-विद्या, तुम कुछ बोलती क्यों नहीं? कैसा जी है, डॉक्टर बुलाऊँ? विद्या ने निराश दृष्टि से देखा और दोनों हाथ जोड़ लिये। आँखें बन्द हो गयीं। गायत्री व्याकुल होकर नीचे दीवानखाने…
    • पाठ-खंड 64 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — विद्या-मैंने भी तो कुछ ऐसा तमाशा देखा था। तुम मेरे आने के बहुत देर पीछे गई थी। मुझे लखनऊ में ही सारी कथा मालूम हो गई थी। इसी भयंकर परिणाम को रोकने के लिए मैं वहाँ से दौड़ी आई, किन्तु यहाँ का रंग देखकर…
    • पाठ-खंड 63 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री पुलकित हो गयी। उस आनन्दमय जीवन का दृश्य उसकी कल्पना में सचित्र हो गया। उसकी तबियत लहराने लगी। इस समय उसे अपने पति की वह वसीयत याद न रही जो उन्होंने जायदाद का प्रबन्ध के विषय में की थी और…
    • पाठ-खंड 62 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — किन्तु जब उसने गायत्री को सिर झुका कर चीख-चीख कर रोते देखा तो उसका हृदय नम्र हो गया; और जब गायत्री आ कर पैरों पर गिर पड़ी तब स्नेह और भक्ति के आवेश से आतुर हो कर वह बैठ गयी और गायत्री का सिर उठा कर अपने…
    • पाठ-खंड 10 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मनोहर-अबकी बेटी के ब्याह में इमली का पेड़ कटवाया था। क्या सब जल गई? डपट-नहीं बची तो बहुत थी, पर कल डिप्टी ज्वालासिंह के लश्कर में चली गई।-खाँ साहब से कितना कहा कि इसे मत ले जाइए, पर उनकी बला सुनती है।…
    • पाठ-खंड 19 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राय साहब को नैनीताल आए हुए एक महीना हो गया। "एक सुरम्य झील के किनारे हरे-भरे वृक्षों के कुन्ज में उनका बैंगला स्थित है, जिसका एक हजार रुपया मासिक किराया देना पड़ता है। कई घोड़े हैं, कई मोटर…
    • पाठ-खंड 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — कादिर-तो मैं तुमसे कब कहता हूँ कि उसकी हिमायत करो। वह बुरी राह चलेगा तो आप ठोकर खाएगा। मेरा कहना यही है कि हम लोग अपनी आँखों की देखी और कानों की सुनी बातों में किसी के भय से उलट-फेर न करें। अपनी जान…
    • पाठ-खंड 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — वह कह रही थीं कि यह अपमान मुझसे नहीं सहा जा सकता। मैं अब जान पर खेलता हूँ। आप क्या कहते हैं? मनोहर ने बेटे की यह दशा देखी तो रक्त खौल उठा। बावला हो गया। कुछ न सूझा कि मैं क्या कर रहा हूँ। बाज की तरह…
    • पाठ-खंड 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राय साहब-जिस काम में सेठ जगतराम और मिस्टर मनचूरजी शरीक हों उसके विषय में यह संदेह नहीं हो सकता। एजेण्ट-तो क्या आप समझते हैं कि कम्पनी का संचालन उत्तम रीति न होगा? राय साहब-कदापि नहीं? एजेण्ट-तो फिर…
    • पाठ-खंड 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गायत्री जरा सँभल गई, उसने ज्ञानशंकर की ओर सजल आँखों से देखा। कहना चाहती थी, जो कुछ तुमने किया उसका बदला तुम्हें परमात्मा देंगे। लेकिन यदि सौजन्यता का अल्पांश भी रह गया है तो मेरी लाज रखना, सतीत्व…
    • पाठ-खंड 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — किन्तु उसका यह सरल-सीधा व्यवहार ज्ञानशंकर की मलिन दृष्टि में परिवर्तित हो जाता था। उज्ज्वलता में वैचित्र्य और समता में विषमता दीख पड़ती थी। उन्हें गायत्री संकेत द्वारा कहती हुई मालूम होती,…
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