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    81 Results with the "Rural fiction" genre


    • पाठ-खंड 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर-ईश्वर की लीला विचित्र है! प्रभाशंकर-अभी उम्र ही क्या थी! बिलकुल लड़का था। तुम्हारे विवाह में देखा था, चेहरे से तेज बरसता था। ऐसा प्रतापी लड़का मैंने नहीं देखा। ज्ञानशंकर-इसी से तो ईश्वर…
    • पाठ-खंड 12 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इतने में एक चपरासी ने कहा, चलिए आपको सरकार याद करते हैं। ईज़ाद हुसेन पान खाए हुए थे। तुरन्त कुल्ली की, पगड़ी बाँधी और ज्वालासिंह के सामने जाकर सलाम किया। ज्वालासिंह ने कहा, मीर साहब, चपरासियों को…
    • पाठ-खंड 11 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बलराज अपने बाप के पीछे-पीछे घर पहुँचा। रास्ते में कोई बात-चीत नहीं हुई। बिलासी बलराज को देखकर बोली, कहाँ जाके बैठ रहे? तुम्हारे दादा कब से खोज रहे हैं। चलो रोटी तैयार है। बलराज-अखाड़े की ओर चला गया…
    • पाठ-खंड 20 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — राय-तो अब कुछ लिखे। विषय और सामग्री मैं देता हूँ। सिपाही की तलवार में मोरचा न लगना चाहिए। पहला लेख तो इस साल के बजट पर लिख दो और दूसरा गायत्री पर। ज्ञान-मैंने तो आजकल कोई बजट सम्बन्धी लेख…
    • पाठ-खंड 9 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — किन्तु कादिर निश्चित और निश्शंक अपने काम में लगा रहता था। उसे एक क्षण के लिए भी यह भय न होता था कि गाँव के जमींदार और कारिन्दा मेरे शत्रु हो रहे हैं और उनकी शत्रुता मेरा सर्वनाश कर सकती है। यदि इस…
    • पाठ-खंड 8 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर पर इन विनयपूर्ण शब्दों का कुछ भी असर न हुआ। उनके विचार में यह विकृत भावुकता थी, जो मानसिक दुर्बलता का चिह्न है। हाँ, उस पर कृत्रिमता का सन्देह नहीं हो सकता था। उन्हें विश्वास हो गया कि…
    • पाठ-खंड 7 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर-जरा ज्वालासिंह से मिलने गया था। विद्या-तुम्हारी ये बातें मुझे अच्छी नहीं लगती। ज्ञान-कौन-सी बातें? विद्या-यही, अपने घर के लोगों की हाकिमों से शिकायत करना। भाइयों में खटपट सभी जगह होती…
    • पाठ-खंड 6 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्वालासिंह ने स्थिति को खूब बढ़ाकर दर्शाया, क्योंकि इस विषय में वह ज्ञानशंकार के विचारों से परिचित थे। उनका अभिप्राय केवल यह था कि इस समय दयाशंकर के अभियोग की चर्चा न आने पाए। ज्ञानशंकर ने…
    • पाठ-खंड 5 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर बगलें झाँक रहे थे कि बड़ी बहू बोल उठी, यह जा चुके। लल्लू कहते थे कि ज्ञान झूठ भी जाकर कुछ कह दें तो सारा काम बन जाए, लेकिन इन्हें क्या परवाह है, चाहे कोई चूल्हे भाड़ में जाए। फँसाना होता तो…
    • पाठ-खंड 4 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्वालासिंह ने दिलासा दिया, नहीं साहब, आप घर के मालिक है, यह आपकी गोद के पाले हुए लड़के हैं, इनकी अबोध बातों पर ध्यान न दीजिए। इसकी भूल है जो कहते हैं कि आपका कोई अधिकार नहीं है। आपको सब कुछ अधिकार है,…
    • पाठ-खंड 3 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यह कहकर गौस खाँ टाँगन पर सवार होने चले। बिलासी रोती हुई उनके सामने हाथ बाँधकर खड़ी हो गई और बोली, सरकार कहीं की न रहूँगी। जो डाँड़ चाहें लगा दीजिए, जो सजा चाहे दीजिए, मालिकों के कान में यह बात न…
    • पाठ-खंड 2 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर के हृदय में भावी उन्नति की बड़ी-बड़ी अभिलाषाएँ थीं। वह अपने परिवार को फिर समृद्धि और सम्मान के शिखर पर ले जाना चाहते थे। घोड़े और फिटन की उन्हें बड़ी-बड़ी आकांक्षा थी। वह शान से फिटन पर…
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