168 Results with the "Social drama" genre
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Chapter
अध्याय 12
पद्मसिंह के एक बड़े भाई मदनसिंह थे। वह घर का कामकाज देखते थे। थोड़ी-सी जमींदारी थी, कुछ लेन-देन करते थे। उनके एक ही लड़का था, जिसका नाम सदनसिंह था। स्त्री का नाम भामा था। मां-बाप का इकलौता लड़का…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 12
दूसरी वर्षा भी आधी से ज्यादा बीत गई, लेकिन चक्रधर ने माता-पिता से अहिल्या का वृत्तांत गुप्त ही रखा। जब मुंशीजी पूछते-वहां क्या बात कर आए? आखिर यशोदानंदन को विवाह करना है या नहीं? न आते हैं, न…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 12
पूर्णा कितना ही चाहती थी कि कमलाप्रसाद की ओर से अपना मन हटा ले, पर यह शंका उसके हृदय में समा गई थी कि कहीं इन्होंने सचमुच आत्म-हत्या कर ली तो क्या होगा? रात को वह कमलाप्रसाद की उपेक्षा करके चली तो आई…-
81.6 K • Completed
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Chapter
अध्याय 11
दरवाजे पर आकर सुमन सोचने लगी कि अब कहां जाऊं। गजाधर की निर्दयता से भी उसे इतना दु:ख न हुआ था, जितना इस समय हो रहा था। उसे अब मालूम हुआ कि मैंनेअपने घर से निकलकर बड़ी भूल की। मैं सुभद्रा के बल पर कूद…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 11
सभी लोग बड़े कुतूहल से आने वालों को देख रहे थे। कोई दस-बारह मिनट में वह विशालसिंह के घर के सामने आ पहुंचे। आगे-आगे दो घोड़ों पर मुंशी वज्रधर और ठाकुर हरिसेवकसिंह थे। पीछे कोई पचीस-तीस आदमी…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 11
पूर्णा प्रातःकाल और दिनों से आध घंटा पहले उठी। उसने दबे पाँव सुमित्रा के कमरे में कदम रखा। वह देखना चाहती थी कि सुमित्रा सोती है या जागती। शायद वह उसकी सूरत देख कर निश्चय करना चाहती थी कि उसे रात…-
81.6 K • Completed
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Chapter
अध्याय 10
दूसरे दिन सुमन नहाने न गई। सबेरे ही से अपनी एक रेशमी साड़ी की मरम्मत करने लगी। दोपहर को सुभद्रा की एक महरी उसे लेने आई। सुमन ने मन में सोचा था, गाड़ी आवेगी। उसका जी छोआ हो गया। वही हुआ जिसका उसे भय…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 10
मुंशी वज्रधर विशालसिंह के पास से लौटे, तो उनकी तारीफों के पुल बांध दिए। रईस हो तो ऐसा हो। आंखों में कितना शील है ! किसी तरह छोड़ते ही न थे। यों समझो कि लड़कर आया हूँ। प्रजा पर तो जान देते हैं। बेगार की…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 10
आदर्श हिंदू-बालिका की भाँति प्रेमा पति के घर आ कर पति की हो गई थी। अब अमृतराय उसके लिए केवल एक स्वप्न की भाँति थे, जो उसने कभी देखा था। वह गृह-कार्य में बड़ी कुशल थी। सारा दिन घर का कोई-न-कोई काम करती…-
81.6 K • Completed
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Chapter
अध्याय 1
पश्चाताप के कड़वे फल कभी-न-कभी सभी को चखने पड़ते हैं, लेकिन और लोक बुराइयों पर पछताते हैं, दारोगा कृष्णचन्द्र अपनी भलाइयों पर पछता रहे थे। उन्हें थानेदारी करते हुए पच्चीस वर्ष हो गए, लेकिन…-
178.8 K • Completed
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Chapter
अध्याय 1
दोपहर का समय था; चारों तरफ अंधेरा था। आकाश में तारे छिटके हुए थे। ऐसा सन्नाटा छाया हुआ था, मानो संसार से जीवन का लोप हो गया हो। हवा भी बंद हो गई थी। सूर्यग्रहण लगा हुआ था। त्रिवेणी के घाट पर…-
258.1 K • Completed
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Chapter
अध्याय 1
काशी के आर्य-मंदिर में पंडित अमरनाथ का व्याख्यान हो रहा था। श्रोता लोग मंत्रमुग्ध से बैठे सुन रहे थे। प्रोफेसर दाननाथ ने आगे खिसक कर अपने मित्र बाबू अमृतराय के कान में कहा - 'रटी हुई स्पीच है।'…-
81.6 K • Completed
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