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    168 Results with the "Social drama" genre


    • अध्याय 12 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पद्मसिंह के एक बड़े भाई मदनसिंह थे। वह घर का कामकाज देखते थे। थोड़ी-सी जमींदारी थी, कुछ लेन-देन करते थे। उनके एक ही लड़का था, जिसका नाम सदनसिंह था। स्‍त्री का नाम भामा था। मां-बाप का इकलौता लड़का…
    • अध्याय 13 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन के चले जाने के बाद पद्मसिंह के ह्रदय में एक आत्‍मग्‍लानि उत्‍पन्‍न हुई। मैंने अच्‍छा नहीं किया। न मालूम वह कहां गई तो पूछना ही क्‍या, किंतु वहाँ वह कदापि न गई होगी। मरता क्‍या न करता, कहीं…
    • अध्याय 14 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — दूसरे दिन पद्मसिंह सदन को साथ लेकर किसी स्‍कूल में दाखिल कराने चले। किंतु जहां गए, साफ जवाब मिला 'स्‍थान नहीं है। ' शहर में बारह पाठशालाएं थीं लेकिन सदन के लिए कहीं स्‍थान न था। शर्माजी ने विवश…
    • अध्याय 15 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्राचीन ऋषियों ने इंद्रियों को दमन करने के दो साधन बताए हैं --एक राग, दूसरा वैराग्‍य। पहला साधन अत्‍यंत कठिन और दुस्‍साध्‍य है। लेकिन हमारे नागरिक समाज ने अपने मुख्‍य स्‍थानों पर मीनाबाजार सजाकर…
    • अध्याय 16 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — महाशय विट्ठलदास इस समय ऐसे खुश थे मानो उन्‍हें कोई संपत्ति मिल गई हो। उन्‍हें विश्‍वास था कि पद्मसिंह इस जरा से कष्‍ट से मुँह न मोड़ेंगे, केवल उनके पास जाने की देर है। वह होली के कई दिन पहले से…
    • अध्याय 17 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — संध्‍या का समय है। सदन अपने घोड़े पर सवार दालमंडी में दोनों तरफ छज्‍जों और खिड़कियों की ओर ताकता जा रहा है। जब से सुमन वहाँ आई है, सदन उसके छज्‍जे के सामने किसी-न-किसी बहाने से जरा देर के लिए अवश्‍य…
    • अध्याय 18 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बाबू विट्ठलदास अधूरा काम न करते थे। पद्मसिंह की ओर से निराश होकर उन्‍हें यह चिंता होने लगी कि सुमनबाई के लिए पचास रुपये मासिक का चंदा कैसे करूं? उनकी स्‍थापित की हुई संस्‍थाएं चंदों ही से चल रही…
    • अध्याय 19 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शाम हो गई। सुमन ने दिन-भर विट्ठलदास की राह देखी, लेकिन वह अब तक नहीं आए। सुमन के मन में जो नाना प्रकार की शंकाएं उठ रही थीं, वह पुष्‍ट हो गई। विट्ठलदास अब नहीं आएंगे, अवश्‍य कोई विघ्‍न पड़ा। या तो वह…
    • अध्याय 20 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुभद्रा को संध्‍या के समय कंगन की याद आई। लपकी हुई स्‍नान-घर में गई। उसे खूब याद था कि उसने यहीं ताक पर रख दिया था, लेकिन उसका वहाँ पता न था। इस पर वह घबराई। अपने कमरे के प्रत्‍येक ताक और आलमारी को…
    • अध्याय 21 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — विट्ठलदास को संदेह हुआ कि सुमन तीस रुपये मासिक स्‍वीकार करना नहीं चाहती, इसलिए उसने कल उत्तर देने का बहाना करके मुझे टाला है। अतएव वे दूसरे दिन उसके पास नहीं गए, इसी चिंता में पड़े रहे कि शेष…
    • अध्याय 22 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सुमन पार्क से लौटी तो उसे खेद होने लगा कि मैंने शर्माजी को वे ही दुखानेवाली बातें क्‍यों कहीं? उन्‍होंने इतनी उदारता से मेरी सहायता की, जिसका मैंने यह बदला दिया? वास्‍तव में मैंने अपनी दुर्बलता का…
    • अध्याय 23 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सदन प्रात:काल घर गया, तो अपनी चाची के हाथ में कंगन देखा। लज्‍जा से उसकी आंखें जमीन में गड़ गईं। नाश्‍ता करके जल्‍दी से बाहर निकल आया और सोचने लगा, यह कंगन इन्‍हें कैसे मिल गया? क्‍या यह संभव है कि…
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