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    Novel Grove

    Stories 15
    Chapters 372
    Words 1.3 M
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    Reading 4 days, 8 hours4 d, 8 h
    • पाठ-खंड 67 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — जब वह मजिस्ट्रेट थे, तो उन्होंने अपने असामियों पर इजाफा लगान का दावा किया था। महीनों मेरी खुशामद करते रहे कि मैं बाबू जी से डिगरी करा दूँ। मैं क्या जानें, इनके चकमे में आ गयी। बाबू जी पहले तो बहुत…
    • पाठ-खंड 68 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इस भाँति तीन-चार महीने बीत गये। भादों का महीना था। जन्माष्टमी आ रही थी। शहर में उत्सव मनाने की तैयारी हो रही थी। कई वर्षों से गायत्री के यहाँ उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। दूर-दूर से गवैये…
    • पाठ-खंड 69 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — माया-यदि उनकी यह इच्छा होती तो यह वह मुझे ताल्लुकेदारों के स्कूलों में नहीं भेज देती? मुझे आपकी सेवा में रखने से उनका उद्देश्य यही होगा कि मैं आपके ही पदचिह्न पर चलूँ। प्रेम-तो यह रुपये खर्च…
    • पाठ-खंड 70 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — थोड़ी देर अपील के विषय में परामर्श करने के बाद ज्वालासिंह मिर्जासाहब को साथ ले कर हाजीपुर चले। डॉक्टर साहब भी साथ हो लिये। ज्यों ही दशहरे की छुट्टियों के बाद हाईकोर्ट खुला, अपील दायर हो गयी और…
    • पाठ-खंड 32 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सन्ध्या समय था। दरबार समाप्त हो चुका था। ज्ञानशंकर नगर के मान्य जनों के साथ गवर्नर को स्टेशन तक विदा करके लौटे थे और एक कोच पर आराम से लेटे सिगार पी रहे थे। आज उन्हें सारा दिन दौड़ते गुजरा था, जरा भी…
    • पाठ-खंड 33 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञान-इसका कारण यही है कि हम भीरु प्रकृति के हैं, यथार्थ का सामना न करके मिथ्या आदर्श-प्रेम की आड़ में अपनी कमजोरी छिपाते हैं। गायत्री-मैंने आपका आशय नहीं समझा। ज्ञान-मेरा आशय केवल यही है कि…
    • पाठ-खंड 34 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सबने अलग-अलग और फिर मिलकर सुक्खू को समझाया; लेकिन वह टस से मस न हुए। अन्त में लोगों ने कादिर को घेरा। नूर आलम ने उन्हें अलग से जाकर कहा, खाँ साहब, इस बूढ़े का जरा समझाओ, क्यों जान देने पर तुला हुआ है? दो…
    • पाठ-खंड 35 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रेमशंकर-मुझे नहीं मालूम था कि गरीबों को जूते लगवाना भी सरकारी काम है। इसने क्या खता की थी, जिसके लिए आपने यह सजा तजवीज की? तहसीलदार-सरकारी हुक्म की तामील से इन्कार किया। इससे कहा गया था कि इस…
    • पाठ-खंड 36 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पहला अंक राजा-हाय! हाय! बैद्यो ने जवाब दिया, हकीमों ने जवाब दिया, डाकदरों ने जवाब दिया, किसी ने रोग को न पहचाना। सब-के-सब लुटेरे थे। अब जिन्दगानी की कोई आशा नहीं। यह सारा राज-पाट छूटता है। मेरे पीछे…
    • पाठ-खंड 37 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बिन्दा-होवे करी तो कौनो डर हौ। अबकी अस जर आवा है कि ठठरी होय गया है। कर्तार-बड़े कस-बल का पट्ठा है। सुक्खू चौधरी का तालाब जहाँ बन रहा था वहीं एक दिन अखाड़े में उससे मेरी एक पकड़ हो गई थी। मैं उसे पहले…
    • पाठ-खंड 38 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — खेत में पहुँचकर दोनों मचान पर लेटे। अमावस की रात थी। आकाश पर कुछ बादल भी हो आये थे। चारों ओर घोर अन्धकार छाया हुआ था। मनोहर तो लेटते ही खर्राटे लेने लगा; लेकिन बलराज पड़ा-पड़ा करवटें बदलता रहा।…
    • पाठ-खंड 39 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यही बातें हो रही थीं कि फैजू और कर्तारसिंह ने सामने आकर सलाम किया। ज्ञानशंकर ने पूछा, कहो खैरियत तो है। फैजू-हुजूर, खैरियत क्या कहें! रात को किसी ने खाँ साहब को मार डाला। ईजाद हुसेन और इर्फान अली…
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