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    81 Results with the "Rural fiction" genre


    • पाठ-खंड 80 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सहसा बलराज ने कहा-बाबू जी, आपने सुना नहीं? मियाँ फैजुल्ला पर जो मुकदमा चल रहा था, उसका आज फैसला सुना दिया गया। अपनी पड़ोसिन बुढ़िया के घर में घुस कर चोरी की थी। तीन साल की सजा हो गयी। डपटसिंह ने…
    • प्रेमाश्रम · Premashram Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गाँव, किसान और ज़मींदारी के बीच न्याय और मानवीय संबंधों की तलाश। Village life, land and the struggle for justice in colonial India.
    • पाठ-खंड 71 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — इस तर्क-वितर्क में गायत्री बद्रीनाथ की यात्रा पर आरूढ़ न हो सकी। हृषीकेश में पड़े-पड़े तीन महीने गुजर गये और हेमन्त सिर पर आ पहुँचा, यात्रा दुस्साध्य हो गयी। पौष मास था, पहाड़ों पर बर्फ गिरने लगी…
    • पाठ-खंड 72 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लेकिन चाट बुरी लत है। अच्छे दिनों में वह गले की जंजीर है, किन्तु बुरे दिनों में तो यह पैनी छुरी हो जाती है जो आत्म-सम्मान और लज्जा का तसमा भी नहीं छोड़ती। माघ का महीना, सर्दी का यह हाल था कि नाड़ियों…
    • पाठ-खंड 73 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — हाय! अभी तक लाश में जान नहीं आयी। उसे उसकी ओर ताकते हुए अब भय होता था। नैराश्य-व्यथा, शोकाघात, परिणाम-भय, प्रेमोद्गार, ग्लानि-इन सभी भावों ने उसके हृदय को कुचल दिया! तिस पर भी अभी तक उसकी आशाओं का…
    • पाठ-खंड 74 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — महाराज-हुजूर, मैंने तो आज बहुत कम मसाले दिये हैं। दारोगी जी के सामने यह भोजन जाता तो कहते यह क्या फीकी पोच पकाई है। प्रेमशंकर ने रूखे चावल खाये, मगर प्रियनाथ ने मिरचा की परवाह नहीं की। दोनों आदमी…
    • पाठ-खंड 76 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — एक बार ज्ञानशंकर लखनऊ से आये तो माया के वास्ते एक बहुत सुन्दर रेशमी सूट मिला लाये, लेकिन माया ने उसको उस वक्त तक न पहना जब तक मित्र-भवन के और छात्रों के लिए वैसे ही सूट न तैयार हो गये। ज्ञानशंकर मन…
    • पाठ-खंड 77 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — श्रद्धा ने प्रेम से आँसू पोंछते हुए कहा-बेटा, चल कर थोड़ा सा खाना खा लो। सवेरे मैं फिर उनसे कहूँगी। डॉ. इर्फानअली ने बात बिगाड़ दी, नहीं तो मैंने तो राजी कर लिया था। माया-चाची, मेरी खाने की बिलकुल…
    • पाठ-खंड 78 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — माया-जी हाँ, लिखा तो है, पर बना नहीं। इर्फान-वाह! इससे अच्छा तो मैं भी नहीं लिख सकता। यह सिफत तुम्हें बाबू ज्ञानशंकर से विरासत में मिली है। माया-तो भेज दूँ, जायगा? इर्फान-छपेगा क्यों नहीं? मैं खुद भेज…
    • पाठ-खंड 79 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — मायाशंकर ज्यों ही अपना कथन समाप्त कर के अपनी जगह बैठा कि हजारों आदमी चारों तरफ से आ-आ कर उसके इर्द-गिर्द जमा हो गये। कोई उसके पैरों पर गिरा पड़ता था, कोई रोता था, कोई दुआएँ देता था, कोई आनन्द से विहल…
    • पाठ-खंड 75 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — माया-रुपये बहुत हैं। क्या कहूँ, मुझे पहले यह बात न सूझी। दोपहर तक भजन होता रहा। शहर के हजारों आदमी इस आनन्दोत्सव में शरीक थे। प्रेमशंकर ने सबको आदर से बिठाया। इतने में बाजार से मिठाइयाँ आ गयीं,…
    • पाठ-खंड 58 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — लेकिन जब ज्ञानशंकर बनारस चले गये और उनकी चिट्ठियों का आना बिलकुल बन्द हो गया, तब गायत्री को ऐसा अनुभव होने लगा मानो मैं इस संसार में हूँ ही नहीं। या कोई दूसरा निर्जन, नीरव, अचेतन संसार है। उसे…
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