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    81 Results with the "Rural fiction" genre


    • पाठ-खंड 1 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सन्ध्या हो गई है। दिन भर के थके-माँदे बैल खेत से आ गए हैं। घरों से धुएँ के काले बादल उठने लगे। लखनपुर में आज परगने के हाकिम की परताल थी। गाँव के नेतागण दिन भर उनके घोड़े के पीछे-पीछे दौड़ते रहे थे। इस…
    • पाठ-खंड 30 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — शील-तो तुम कुछ रुपये क्यों नहीं दे देते? ज्वाला-वाह, जिस अन्याय से भागता हूँ, वही करूँ। शील-प्रेमशंकर जी बड़े दयालु हैं। उनके पास रुपये हों तो वह खेतिहारों की मदद करें। ज्वाला-मेरे विचार से वह इस…
    • पाठ-खंड 39 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — यही बातें हो रही थीं कि फैजू और कर्तारसिंह ने सामने आकर सलाम किया। ज्ञानशंकर ने पूछा, कहो खैरियत तो है। फैजू-हुजूर, खैरियत क्या कहें! रात को किसी ने खाँ साहब को मार डाला। ईजाद हुसेन और इर्फान अली…
    • पाठ-खंड 38 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — खेत में पहुँचकर दोनों मचान पर लेटे। अमावस की रात थी। आकाश पर कुछ बादल भी हो आये थे। चारों ओर घोर अन्धकार छाया हुआ था। मनोहर तो लेटते ही खर्राटे लेने लगा; लेकिन बलराज पड़ा-पड़ा करवटें बदलता रहा।…
    • पाठ-खंड 37 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — बिन्दा-होवे करी तो कौनो डर हौ। अबकी अस जर आवा है कि ठठरी होय गया है। कर्तार-बड़े कस-बल का पट्ठा है। सुक्खू चौधरी का तालाब जहाँ बन रहा था वहीं एक दिन अखाड़े में उससे मेरी एक पकड़ हो गई थी। मैं उसे पहले…
    • पाठ-खंड 36 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — पहला अंक राजा-हाय! हाय! बैद्यो ने जवाब दिया, हकीमों ने जवाब दिया, डाकदरों ने जवाब दिया, किसी ने रोग को न पहचाना। सब-के-सब लुटेरे थे। अब जिन्दगानी की कोई आशा नहीं। यह सारा राज-पाट छूटता है। मेरे पीछे…
    • पाठ-खंड 35 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — प्रेमशंकर-मुझे नहीं मालूम था कि गरीबों को जूते लगवाना भी सरकारी काम है। इसने क्या खता की थी, जिसके लिए आपने यह सजा तजवीज की? तहसीलदार-सरकारी हुक्म की तामील से इन्कार किया। इससे कहा गया था कि इस…
    • पाठ-खंड 34 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सबने अलग-अलग और फिर मिलकर सुक्खू को समझाया; लेकिन वह टस से मस न हुए। अन्त में लोगों ने कादिर को घेरा। नूर आलम ने उन्हें अलग से जाकर कहा, खाँ साहब, इस बूढ़े का जरा समझाओ, क्यों जान देने पर तुला हुआ है? दो…
    • पाठ-खंड 33 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञान-इसका कारण यही है कि हम भीरु प्रकृति के हैं, यथार्थ का सामना न करके मिथ्या आदर्श-प्रेम की आड़ में अपनी कमजोरी छिपाते हैं। गायत्री-मैंने आपका आशय नहीं समझा। ज्ञान-मेरा आशय केवल यही है कि…
    • पाठ-खंड 32 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — सन्ध्या समय था। दरबार समाप्त हो चुका था। ज्ञानशंकर नगर के मान्य जनों के साथ गवर्नर को स्टेशन तक विदा करके लौटे थे और एक कोच पर आराम से लेटे सिगार पी रहे थे। आज उन्हें सारा दिन दौड़ते गुजरा था, जरा भी…
    • पाठ-खंड 31 Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — ज्ञानशंकर को अपील सफल होने का पूरा विश्वास था। उन्हें मालूम था कि किसानों में धनाभाव के कारण अब बिल्कुल दम नहीं है। लेकिन जब उन्होंने देखा, काश्तकारों की ओर से भी मुकदमे की पैरवी उत्तम रीति से की…
    • प्रेमाश्रम · Premashram Cover
      by प्रेमचंद · Premchand — गाँव, किसान और ज़मींदारी के बीच न्याय और मानवीय संबंधों की तलाश। Village life, land and the struggle for justice in colonial India.
    Note