81 Results with the "Rural fiction" genre
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Chapter
पाठ-खंड 1
सन्ध्या हो गई है। दिन भर के थके-माँदे बैल खेत से आ गए हैं। घरों से धुएँ के काले बादल उठने लगे। लखनपुर में आज परगने के हाकिम की परताल थी। गाँव के नेतागण दिन भर उनके घोड़े के पीछे-पीछे दौड़ते रहे थे। इस…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 30
शील-तो तुम कुछ रुपये क्यों नहीं दे देते? ज्वाला-वाह, जिस अन्याय से भागता हूँ, वही करूँ। शील-प्रेमशंकर जी बड़े दयालु हैं। उनके पास रुपये हों तो वह खेतिहारों की मदद करें। ज्वाला-मेरे विचार से वह इस…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 39
यही बातें हो रही थीं कि फैजू और कर्तारसिंह ने सामने आकर सलाम किया। ज्ञानशंकर ने पूछा, कहो खैरियत तो है। फैजू-हुजूर, खैरियत क्या कहें! रात को किसी ने खाँ साहब को मार डाला। ईजाद हुसेन और इर्फान अली…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 38
खेत में पहुँचकर दोनों मचान पर लेटे। अमावस की रात थी। आकाश पर कुछ बादल भी हो आये थे। चारों ओर घोर अन्धकार छाया हुआ था। मनोहर तो लेटते ही खर्राटे लेने लगा; लेकिन बलराज पड़ा-पड़ा करवटें बदलता रहा।…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 37
बिन्दा-होवे करी तो कौनो डर हौ। अबकी अस जर आवा है कि ठठरी होय गया है। कर्तार-बड़े कस-बल का पट्ठा है। सुक्खू चौधरी का तालाब जहाँ बन रहा था वहीं एक दिन अखाड़े में उससे मेरी एक पकड़ हो गई थी। मैं उसे पहले…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 36
पहला अंक राजा-हाय! हाय! बैद्यो ने जवाब दिया, हकीमों ने जवाब दिया, डाकदरों ने जवाब दिया, किसी ने रोग को न पहचाना। सब-के-सब लुटेरे थे। अब जिन्दगानी की कोई आशा नहीं। यह सारा राज-पाट छूटता है। मेरे पीछे…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 35
प्रेमशंकर-मुझे नहीं मालूम था कि गरीबों को जूते लगवाना भी सरकारी काम है। इसने क्या खता की थी, जिसके लिए आपने यह सजा तजवीज की? तहसीलदार-सरकारी हुक्म की तामील से इन्कार किया। इससे कहा गया था कि इस…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 34
सबने अलग-अलग और फिर मिलकर सुक्खू को समझाया; लेकिन वह टस से मस न हुए। अन्त में लोगों ने कादिर को घेरा। नूर आलम ने उन्हें अलग से जाकर कहा, खाँ साहब, इस बूढ़े का जरा समझाओ, क्यों जान देने पर तुला हुआ है? दो…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 33
ज्ञान-इसका कारण यही है कि हम भीरु प्रकृति के हैं, यथार्थ का सामना न करके मिथ्या आदर्श-प्रेम की आड़ में अपनी कमजोरी छिपाते हैं। गायत्री-मैंने आपका आशय नहीं समझा। ज्ञान-मेरा आशय केवल यही है कि…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 32
सन्ध्या समय था। दरबार समाप्त हो चुका था। ज्ञानशंकर नगर के मान्य जनों के साथ गवर्नर को स्टेशन तक विदा करके लौटे थे और एक कोच पर आराम से लेटे सिगार पी रहे थे। आज उन्हें सारा दिन दौड़ते गुजरा था, जरा भी…-
304.7 K • Completed
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Chapter
पाठ-खंड 31
ज्ञानशंकर को अपील सफल होने का पूरा विश्वास था। उन्हें मालूम था कि किसानों में धनाभाव के कारण अब बिल्कुल दम नहीं है। लेकिन जब उन्होंने देखा, काश्तकारों की ओर से भी मुकदमे की पैरवी उत्तम रीति से की…-
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Story
प्रेमाश्रम · Premashram
गाँव, किसान और ज़मींदारी के बीच न्याय और मानवीय संबंधों की तलाश। Village life, land and the struggle for justice in colonial India.-
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