पाठ-खंड 60
byराधा-नदी में अथाह जल है।
वैद्य-जिस के पास नौका है उसे जल का क्या भय?
राधा-आँधी है, भयानक लहरें हैं और बड़े-बड़े भयंकर जलजन्तु हैं।
वैद्य-मल्लाह चतुर है।
राधा-सूर्य भगवान् निकल आये, पर तारे क्यों जगमगा रहे हैं?
वैद्य-प्रकाश फैलेगा तो वह स्वयं लुप्त हो जायेंगे।
वैद्य जी ने घरवालों को आँखों के इशारे से हटा दिया। जब एकान्त हो गया तब राधा ने मुस्करा कर कहा-प्रेम का धागा कितना दृढ़ है?
ज्ञानशंकर ने इसका कुछ उत्तर न दिया।
गायत्री फिर बोली-आग लकड़ी को जलाती है, पर लकड़ी जल जाती है तो आग भी बुझ जाती है।
ज्ञानशंकर ने इसका भी कुछ जवाब न दिया।
गायत्री ने उसके मुख की ओर विस्मय से देखा, यह मौन क्यों? अपना पार्ट भूल तो नहीं गये? तब तो बड़ी हँसी होगी।
ज्ञानशंकर के होठ बन्द ही थे, साँस बड़े वेग से चल रही थी। पाँव काँप रहे थे, नेत्रों में विषम प्रेरणा झलक रही थी और मुख से भयंकर संकल्प प्रकट होता था, मानो कोई हिंसक पशु अपने शिकार पर टूटने के लिए अपनी शक्तियों को एकाग्र कर रहा हो। वास्तव में ज्ञानशंकर ने छलाँग मारने का निश्चय कर लिया था। इसी एक छलाँग में वह सौभाग्य शिखर पर पहुँचना चाहते थे, इसके लिए महीनों से तैयार हो रहे थे, इसीलिए उन्होंने यह ड्रामा खेला था, इसीलिए उन्होंने यह स्वाँग भरा था। छलाँग मारने का यही अवसर था। इस वक्त चूकना पाप था। उन्होंने तोते का दाना खिला कर परचा लिया था, निःशंक हो कर उनके आँगन में दाना चुगता फिरता था। उन्हें विश्वास था कि दाने की चाट उसे पिंजरे में खींच ले जायगी। उन्होंने पिंजरे का द्वार खोल दिया था। तोते ने पिंजरे को देखते ही चौंक कर पर खोले और मुँडेरे पर उड़ कर जा बैठा। दाने की चाट उसकी स्वेच्छावृत्ति का सर्वनाश न कर सकी थी। गायत्री की भी यही दशा थी। ज्ञानशंकर की यह अव्यवस्त प्रेरणा देख कर झिझकी। यह उसका इच्छित क्रम न था। वह प्रेम का रस-पान कर चुकी थी, उसकी शीतल दाह और सुखद पीड़ा का स्वाद चख चुकी थी, वशीभूत हो चुकी थी, पर सतीत्व-रक्षा की आन्तरिक प्रेरणा अभी शिथिल न हुई थी। वह झिझकी और उसी भाँति उठ खड़ी हुई जैसे किसी आकमिक आघात को रोकने के लिए हमारे हाथ स्वयं अनिच्छित रूप से उठ जाते हैं। वह घबरा कर उठी और वेग से स्टेज के पीछे की ओर निकल गयी। वहाँ पर चारपाई पड़ी हुई थी, वह उस पर जा कर गिर पड़ी। वह संज्ञा-शून्य सी हो रही थी जैसे रात के सन्नाटे से कोई गीदड़ बादल की आवाज सुने और चिल्ला कर गिर पड़े। उसे कुछ ज्ञान था तो केवल भय का।
लेकिन उसमें तोते की-सी स्वाभाविक शंका थी, तो इसी तोते का-सा अल्प आत्म-सम्मान भी था। जैसे तोता एक ही क्षण में फिर दाने पर गिरता है और अंत में पिंजर-बद्ध हो जाता है, उसी भाँति गायत्री भी एक ही क्षण में अपनी झिझक पर लज्जित हुई। उसकी मानसिक पवित्रता कब की विनष्ट हो चुकी थी। अब वह अनिच्छित प्रतिकार की शक्ति भी विलुप्त हो गयी। उसके मनोभाव का क्षेत्र अब बहुत विस्तृत हो गया था पति-प्रेम उसके एक कोने में पैर फैला कर बैठ सकता था, अब हृद्देश पर उसका आधिपत्य न था। एक क्षण में वह फिर स्टेज पर आयी, शरमा रही थी कि ज्ञानशंकर मन में क्या कहते होंगे! हा! मैं भक्ति के वेग में अपने को न भूल सकी। यहाँ भी अहंकार को न मिटा सकी। दर्शक-वृन्द मन में न जाने क्या विचार कर रहे होंगे! वह स्टेज पर पहुँची तो ज्ञानशंकर एक पद गा कर लोगों का मनोरंजन कर रहे थे। उसके स्टेज पर आते ही पर्दा गिर गया।
आध घंटे के बाद तीसरी बार पर्दा उठा। फिर वही कदम का वृक्ष था, वही सघन कुंज। चारों सखियाँ बैठी हुई कृष्ण के वैद्य रूप धारण की चर्चा कर रही थीं। वह कितने प्रेमी, कितने भक्तवत्सल है। स्वयं भक्तों के भक्त हैं।
इस वार्तालाप के उपरान्स एक पधबद्ध रामायण होने लगा। जिसमें ज्ञान और भक्ति की तुलना की गयी और अन्त में भक्ति पक्ष को ही सिद्ध किया गया। चारों सखियों ने आरती गाई और अभिनय समाप्त हुआ। पर्दा गिर गया। गायत्री के भाव-चित्रण, स्वर-लालित्य और अभिनय-कौशल की सभी प्रशंसा कर रहे थे। कितने ही सरल हृदय भक्तजनों को तो विश्वास हो गया कि गायत्री को राधिका का इष्ट है। सभ्य समाज इतनी प्रगल्भ तो न था, फिर भी गायत्री की प्रतिभा, उसके विशाल गाम्भीर्य, उसकी अलौकिक मृदुलता का जाद सभी पर छाया हुआ था। ज्ञानशंकर के अभिनय-कौशल की भी सराहना हो रही थी। यद्यपि उनका गाना किसी को पसन्द न आया। उनकी आवाज में लोच का नाम भी न था, फिर भी वैद्य-लीला निर्दोष बताई जाती थी।
गायत्री अपने कमरे में आ कर कोच पर बैठी तो एक बज गया था। वह आनन्द से फूली न समाती थी, चारों तरफ उसकी वाह-वाह हो रही थी, शहर के कई रसिक सजनों ने चलते समय आ कर उसके मानब चरित्र-ज्ञान की प्रशंसा की थीं, यहाँ तक कि श्रद्धा भी उसके अभिनय नैपुण्य पर विस्मित हो रही। उसका गौरवशील हृदय इस विचार से उन्मत्त हो रहा था कि आज सारे नगर में मेरी ही चर्चा, मेरी ही धूम है और यह सब किसके सत्संग का, किसकी प्रेरणा का फल था? गायत्री के रोम-रोम से ज्ञानशंकर के प्रति श्रद्धाध्वनि निकलने लगी। उसने ज्ञानशंकर पर अनुचित सन्देह करने के लिए अपने को तिरस्कृत किया। मुझे उनसे क्षमा माँगनी चाहिए, उनके पैरों पर गिरकर उनके हृदय से इस दुःख को मिटाना चाहिए। मैं उनकी पदरज हूँ, उन्होंने मुझे धरती से उठा कर आकाश पर पहुँचाया है। मैंने उन पर सन्देह किया! मुझसे बड़े कृतघ्न और कौन होगा? वह इन्हीं विचारों में मग्न थी कि ज्ञानशंकर आकर खड़े हो गये और बोले-आज आपने मजलिस पर जादू कर दिया।
गायत्री बोली-यह जादू आपका सिखाया हुआ है।
ज्ञानशंकर-सुना करता था कि मनुष्य का जैसा नाम होता है वैसे ही गण भी उसमें आ जाते हैं, पर विश्वास न आता था। अब विदित हो रहा है कि यह कथन सर्वथा निस्सार नहीं है। मुझे दो बार से अनुभव हो रहा है कि जब अपना पार्ट खेलने लगता हूँ तब किसी दूसरे ही जगत् में पहुँच जाता हूँ। चित्त पर एक विचित्र आनन्द छा जाता है, ऐसा भ्रम होने लगता है कि मैं वास्तव में कृष्ण हूँ।
गायत्री-मैं भी यह कहनेवाली थी। मैं तो अपने को बिलकुल भूल ही जाती हूँ।
ज्ञान-सम्भव है उस आत्म-विस्मृति की दशा में मुझसे कोई अपराध हो गया हो तो उसे क्षमा कीजिएगा।
गायत्री सकुचाती हुई बोली-प्रेमोद्गार में अन्तःकरण निर्मल हो जाता है, वासनाओं का लेश भी नहीं रहता।
ज्ञानशंकर एक मिनट तक खड़े इन शब्दों के आशय पर विचार करते रहे और तब बाहर चले गये।
दूसरे दिन विद्यावती बनारस पहुँची। उसने अपने आने की सूचना न दी थी, केवल एक भरोसे के नौकर को साथ लेकर चली आयी थी ज्यों ही द्वार पर पहुँची उसे बृहत् पंडाल दिखायी दिया। अन्दर गयी तो श्रद्धा दौड़ कर उससे गले मिली। महरियाँ दौड़ी आयीं। वह सब-की-सब विद्या को करुणा-सूचक नेत्रों से देख रही थीं। गायत्री गंगा स्नान करने गयीं थी। विद्या के कमरे में गायत्री का राज्य था। उसके सन्दूक और अन्य सामान चारों ओर भरे हुए थे। विद्या को ऐसा क्रोध आया कि गायत्री का सब सामान उठाकर बाहर फेंक दे; पर कुछ सोचकर रह गयी। गायत्री के साथ कई महरियाँ भी आयी थीं। वे वहाँ की महरियों पर रोब जमाती थीं। विद्या को देखकर सब इधर-उधर हट गयीं, कोई कुशल समाचार पूछने पर भी न आयी। विद्या इन परिस्थितियों को उसी दृष्टि से देख रही थी जैसे कोई पुलिस अफसर किसी घटना के प्रमाणों को देखता है। उसके मन में जो शंका आरोपित हुई थी उसकी पग-पग पर पुष्टि होती जाती थी। ज्यों ही एकान्त हुआ, विद्या ने श्रद्धा से पूछा-यह शामियाना कैसे तना हुआ है?
श्रद्धा-सत को वहाँ कृष्णलीला हुई थी।
विद्या-बहिन ने भी कोई पार्ट लिया?
श्रद्धा-वह राधिका बनी थी और बाबू जी ने कृष्ण का पार्ट लिया था।
विद्या-बहिन से खेलते तो न बना होगा?
श्रद्धा-वाह! वह इस कला में निपुण हैं। सारी सभा लटू हो गयी। आती होंगी, आप ही कहेंगी।
विद्या-क्या नित्य गंगा स्नान करने जाती हैं?
श्रद्धा-हाँ, प्रात:काल गंगा स्नान होता है, संध्या को कीर्तन सुनने जाती हैं।
इतने में मायाशंकर ने आकर माता के चरण स्पर्श किए। विद्या ने उसे छाती से लगाया और बोली-बेटा, आराम से तो रहे?
माया-जी हाँ, खूब आराम से था।
विद्या-बहिन, देखो इतने ही दिनों में इसकी आवाज कितनी बदल गयी है। बिलकुल नहीं पहचानी जाती। मौसी जी के क्या रंग-ढंग हैं? खूब प्यार करती हैं न?
माया-हाँ, मुझे बहुत चाहती हैं, बहुत अच्छा मिजाज है।
विद्या-वहाँ भी कृष्णलीला होती थी कि नहीं?
माया-हाँ, वहाँ तो रोज ही होती रहती थी। कीर्तन नित्य होता था। मथुरा-वृन्दावन से रासवाले बुलाये जाते थे। बाबू जी भी कृष्ण का पार्ट खेलते हैं। उनके केश खुब बढ़ गये हैं। सूरत से महन्त मालूम होते हैं तुमने तो देखा होगा?
विद्या-हाँ, देखा क्यों नहीं! बहिन अब भी उदास रहती है?
माया-मैंने तो उन्हें कभी उदास नहीं देखा। हमारे घर में ऐसा प्रसन्नचित्त कोई है ही नहीं।
विद्या यह प्रश्न यों पूछ रही थी जैसे कोई वकील गवाह से जिरह कर रहा हो। प्रत्येक उत्तर सन्देह को दृढ करता था। दस बजे द्वार पर मोटर की आवाज सुनायी दी। सारे घर में हलचल मच गयी। कोई महरी गायत्री का पलँग बिछाने लगी, कोई उसके स्लीपरों को पोंछने लगी, किसी ने फर्श झाड़ना शुरू किया, कोई उसके जलपान की सामग्रियों निकाल कर तश्तरी में रखने लगी और एक ने लोटा-गिलास मौज कर रख दिया। इतने में गायत्री ऊपर आ पहुँची। पीछे-पीछे ज्ञानशंकर भी थे। विद्या अपने कमरे से न निकली, लेकिन गायत्री लपक कर उसके गले से लिपट गयी और बोली-तुम कब आयीं? पहले से भी न लिया।
विधा गला छुड़ा कर अलग खड़ी हो गयी और रूखाई से बोली-खत लिख कर क्या करती? यहाँ किसे फुरसत थी कि मुझे लेने जाता। दामोदर महाराज के साथ चली आगी।
ज्ञानशंकर ने विद्या के चेहरे की ओर प्रश्नात्मक दृष्टि से देखा। उत्तर मोटे अक्षरों में स्पष्ट लिखा हुआ था। विद्या भावों को छिपाने में कच्ची थी। सारी कथा उसके हो पर अंकित थी। उसने ज्ञानशंकर को आँख उठा कर भी न देखा, कुशल-समाचार पूछने की बात ही क्या! नंगी तलवार बनी हुई थी। उसके तेवर साफ कह रहे थे कि वह भरी-भरी बैठी है और अवसर पाते ही उबल पड़ेगी। ज्ञानशंकर का चित्त उद्विग्न हो गया। वे शंका, वह परिणाम-चिन्ता जो गायत्री के आने से दब गयी थी, फिर जाग उठी और उनके हृदय में काँटों के समान चुभने लगी। उन्हें निश्चय हो गया कि विद्या सब कुछ जान गयी, अब वह मौका पाते ही ईर्ष्यावेग में गायत्री से सब कुछ कह सुनायेगी। मैं उसे किसी भांति नहीं रोक सकता। समझाना, इराना, धककाना, विनय और चिरौरी करना सब निष्फल होगा। बस अगर अब प्राण-रक्षा का कोई उपाय है तो यही कि उसे गायत्री को ले कर गोरखपुर चला जाऊँ या दोनों बहनों में ऐसा मनमुटाव करा दूँ कि एक-दूसरी से खुल कर मिल ही न सकें। स्त्रियों को लड़ा देना कौन-सा कठिन काम है! एक इशारे में तो उनके तेवर बदलते हैं। ज्ञानशंकर को अभी तक यह ध्यान भी न था कि विद्या मेरी भक्ति और प्रेम के मर्म तक पहुँची हुई है। वह केवल अभी तक राय साहब वाली दुर्घटनाओं को ही इस मनोमालिन्य का कारण समझ रहे थे।
विद्या ने गायत्री से अलग हट कर उसके नख-शिन को चुभती हुई दृष्टि से देखा। उसने उसे छह साल पहले देखा था। तब उसका मुखकमल मुर्झाया हुआ था, वह सन्ध्या-काल के सदृश उदास, मलिन, निश्चेष्ट थी। पर इस समय उसके मुख पर खिले हुए कमल की शोभा थी। वह उषा की भाँति विकसित तेजोमय, सचेष्ट स्फूर्ति से भरी हुई दीख पड़ती थी। विद्या इस विद्युत् प्रकाश के सम्मुख दीपक के समान ज्योतिहीन मालूम होती थी।
गायत्री ने पूछा-संगीत सभा का तो खूब आनन्द उठाया होगा?
ज्ञानशंकर का हृदय धकधक करने लगा। उन्होंने विद्या की ओर बड़ी दीन दृष्टि से देखा पर उसकी आँखें जमीन की तरफ थीं, बोली-मैं तो कभी संगीत के जलसे में गयी ही नहीं। हाँ, इतना जानती हूँ कि जलसा बड़ा फीका रहा। लाला जी बहुत बीमार हो गये और एक दिन भी जलसे में शरीक न हो सके।
गायत्री-मेरे न जाने से नाराज तो अवश्य ही हुए होंगे?
विद्या-तुम्हें उनके नाराज होने की क्या चिन्ता है? यह नाराज हो कर तुम्हारा क्या बिगाड़ सकते हैं।
यद्यपि यह उत्तर काफी तौर पर द्वेषमूलक था, पर गायत्री अपनी कृष्णलीला की क्या करने के लिए इतनी उतावली हो रही थी कि उसने इस पर कुछ ध्यान न दिया। बोला, क्या कहूँ तुम कल न आ गयीं, नहीं तो यहाँ कृष्णलीला का आनन्द उठाती। भगवान् का कुछ ऐसी दया हो गयी कि सारे शहर में इस लीला की वाह-वाह मच गयी। किसी प्रकार की त्रुटि न रही। रंगभूमि तो तुमको अभी दिखाऊँगी पर उसकी सजावट ऐसी मनोहर थी कि तुमसे क्या कहूँ! केवल पर्दो को बदनवाने में हजारों रुपये खर्च हो गये। बिजली के प्रकाश से सारा मंडप ऐसा जगमगा रहा था कि उसकी शोभा देखते ही बनती थी। मैं इतनी बड़ी सभा के सामने आते ही डरती थी, पर कृष्ण भगवान ने ऐसी कृपा की कि मेरा पार्ट सबसे बढ़ कर रहा। "पूछो बाबू जी से, शहर में उसकी कैसी चर्चा हो रही है? लोगों ने मुझसे एक-एक पद कई-कई बार गवाया।'
विद्या ने व्यंग्य भाव से कहा-मेरा अभाग्य था कि कल न आयी।
गायत्री-एक बार फिर वही लीला करने का विचार है। अबकी तुम्हें भी कोई-न-कोई पार्ट दूँगी।
विद्या-नहीं, मुझे क्षमा करना। नाटक खेल कर स्वर्ग में जाने की मुझे आशा नहीं है।
By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text
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