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    Chapter Index

    थोड़ी देर अपील के विषय में परामर्श करने के बाद ज्वालासिंह मिर्जासाहब को साथ ले कर हाजीपुर चले। डॉक्टर साहब भी साथ हो लिये।

    ज्यों ही दशहरे की छुट्टियों के बाद हाईकोर्ट खुला, अपील दायर हो गयी और समाचार पत्रों के कॉलम उसकी कार्यवाही से भरे जाने लगे। समस्या बड़ी जटिल थी। दंड प्राप्तों में उन साक्षियों को फिर पेश किये जाने की प्रार्थना की थी जिनके आधार पर उन्हें दंड दिये गये थे। सरकारी वकील ने इस प्रार्थना का घोर विरोध किया; किन्तु इर्फानअली ने अपने दावे को ऐसी सबल युक्तियों से पुष्ट किया और दण्ड-भोगियों पर हुई निर्दयता को ऐसे करुणा-भाव से व्यक्त किया कि जजों ने मुकदमे की दुबारा जाँच किये जाने की अनुमति दे दी।

    मातहत अदालत ने विवश हो कर शहादतों को तलब किया। बिसेसर साह, डॉ. प्रियनाथ, दारोगा खुर्शेद आलम, कर्तारसिंह फैज और तहसीलदार साहब कचहरी में हाजिर हुए। बिसेसर साह का बयान तीन दिन तक होता रहा। बयान क्या था, पुलिस के हथकंडो और कूटनीति का विशद और शिक्षाप्रद निरूपण था। अब वह दुर्बल इनकम-टैक्स से डरने वाला, पुलिस के इशारों पर नाचने वाला बिसेसर साह न था। इन दो वर्षों की ग्लानि, पश्चात्ताप और दैविक व्याधियों ने सम्पूर्णतः उसकी काया पलट दी थी। एक तो उसका बयान यों ही भंडाफोड़ था, दूसरे इर्फानअली की जिरहों ने रहा-सहा पर्दा भी खोल दिया। सरकारी वकील ने पहले तो बिसेसर को अपने पिछले बयान से फिर जाने पर धमकाया, जज ने भी डाँट बतलायी पर बिसेसर जरा भी न डगमगाया। इर्फानअली ने बड़ी नम्रता से कहा, गवाह का यों फिर जाना बेशक सजा के काबिल है, पर इस मुकदमे की हालत निराली है। यह सारा तफान पुलिस का खड़ा किया हुआ है। इतने बेगुनाहों की जिन्दगी का ख्याल करके अदालत को शहादत के कानून की इतनी सख्ती से पाबन्दी न करनी चाहिए। इन विनीत शब्दों ने जज साहब को शान्त कर दिया। पुराना जज तबदील हो गया था, उसकी जगह नये साहब आये थे।

    सरकारी वकील ने भी अपने पत्र के अनुकूल खूब जिरह की, सिद्ध करना चाहा कि गाँववालों की धमकी, प्रेमशंकर के आग्रह या इसी प्रकार के अन्य सम्भावित कारणों ने गवाहों को विचलित कर दिया; पर बिसेसर किसी तरह फन्दे में न आया। अँगरेजी और जातीय पत्रों ने इस घटना की आलोचना करनी शुरू की। अँगरेजी पत्रों का अनुमान था कि गवाह का यह रूपान्तर राष्ट्रवादियों के दुराग्रह का फल है। उन्होंने पुलिस को नीचा दिखाने के लिए यह चाल खेली है। अदालत ने इस बयान को स्वीकार करने में बड़ी भूल की है। मुखबिर को यथोचित दंड मिलना चाहिए। हिन्दुस्तानी पत्रों को पुलिस पर छींटे उड़ाने का अवसर मिला। अदालत में मुकदमा पेश ही था, मगर पत्रों ने आग्रह करना शुरू किया कि पुलिस के कर्मचारियों से जवाब तलब करना चाहिए। एक मनचले पत्र ने लिखा, यह घटना इस बात का उज्ज्वल प्रमाण है कि हिन्दुस्तान की पुलिस प्रजा-रक्षण के लिए नहीं वरन् भक्षण के लिए स्थापित की गयी है। अगर खोज की जाय तो पूर्णतः सिद्ध हो जायगा कि यहाँ की 87 सैकड़े दुर्घटनाओं का उत्तरदायित्व पुलिस के सिर है। बाज पत्रों को पुलिस की आड़ में जमींदारों के अत्याचार का भयंकर रूप दिखायी देता था। उन्हें जमींदारों के न्याय पर जहर उगलने का अवसर मिला। कतिपय पत्रों ने जमींदारों की दुरवस्था पर आँसू बहाने शुरू किये। यह आन्दोलन होने लगा कि सरकार की ओर से जमींदारों को ऐसे अधिकार मिलने चाहिए कि वह अपने असामियों को काबू में रख सकें, नहीं तो बहुत सम्भव है कि उच्छृंखलता का यह प्रचंड झोंका सामाजिक संगठन को जड़ से हिला दे।

    बिसेसर साह के बाद डॉ. प्रियनाथ की शहादत हुई। पुलिस अधिकारियों को उन पर पूरा विश्वास था, पर जब उनका बयान सुना तो हाथों के तोते उड़ गये। उनके कुतूहल का पारावार न था, मानो किसी नये जगत् की सृष्टि हो गयी। वह पुरुष जो पुलिस का दाहिना हाथ बना हुआ था, जो पुलिस के हाथों की कठपुतली था, जिसने पुलिस की बदौलत हजारों कमाये वह आज यों दगा दे जाये, नीति को इतनी निर्दयता से पैरों तले कुचले।

    डॉक्टर साहब ने स्पष्ट कह दिया कि पिछला बयान शास्त्रोक्त न था, लाश के हृदय और यकृती की दशा देख कर मैंने जो धारणा की थी वह शास्त्रानुकूल नहीं थी। बयान देने के पहले मुझे पुस्तकों को देखने का अवसर न मिला था। वह स्थलों में खून का रहना सिद्ध करता है कि उसकी क्रिया आकस्मिक रीति पर बन्द हो गई। यन्त्राघात के पहले गला घोंटने से यह क्रियाक्रम से बन्द होती और इतनी मात्रा में रक्त का जमना सम्भव न था। अपनी युक्ति के समर्थन में उन्होंने कई प्रसिद्ध डॉक्टरों की सम्मति का भी उल्लेख किया। डॉ. इर्फान अली ने भी इस विषय पर कई प्रामाणिक ग्रंथों का अवलोकन किया था। उनकी जिरहों ने प्रियनाथ की धारणा को और भी पुष्ट कर दिया। तीसरे दिन सरकारी वकील की जिरह शुरू हुई। उन्होंने जब वैद्यक प्रश्नों से प्रियनाथ को काबू में आते न देखा तब उनकी नीयत पर आक्षेप करने लगे।

    वकील-क्या यह सत्य है कि पहले जिस दिन अभियोग का फैसला सुनाया गया था उस दिन उपद्रवकारियों ने आपके बँगले पर जाकर आपको घेर लिया था?

    प्रिय-जी हाँ।

    वकील-उस समय बाबू प्रेमशंकर ने आपको मार-पीट से बचाया था?

    प्रिय-जी हाँ, वह न आते तो शायद मेरी जान न बचती।

    वकील-यह भी सत्य है कि आपको बचाने में यह स्वयं जख्मी हो गये थे?

    प्रिय-जी हाँ, उन्हें बहुत चोट आयी थी। कन्धे की हड्डी टूट गयी थी।

    वकील-आप यह भी स्वीकार करेंगे कि वह दयालु प्रकृति के मनुष्य हैं और अभियुक्तों से उन्हें सहानुभूति है।

    प्रिय-जी हाँ, ऐसा ही है।

    वकील-ऐसी दशा में यह स्वाभाविक है कि उन्होंने आपको अभियुक्तों की रक्षा करने पर प्रेरित किया हो?

    प्रिय-मेरे और उनके बीच में इस विषय पर कभी बातचीत भी नहीं हुई।

    वकील-क्या सम्भव नहीं है कि उनके एहसान ने आपको ज्ञात रूप से बाधित किया हो।

    प्रिय-मैं अपने व्यक्तिगत भावों को अपने कर्तव्य से अलग रखता हूँ। यदि ऐसा होता तो बसे पहले बाबू प्रेमशंकर ही अवहेलना करते।

    वकील साहब एक पहलू से दूसरे पहलू पर आते थे, पर प्रियनाथ चालाक मछली की तरह चारा कुतर कर निकल जाते थे। दो दिन तक जिरह करने के बाद अन्त में हार कर बैठ रहे।

    दारोगा खुर्शेद आलम का बयान शुरू हुआ। यह उनके पहले बयान की पुनरावृत्ति थी, पर दूसरे दिन इर्फान अली की जिरहों ने उनको बिलकुल उखाड़ दिया। बेचारे बहुत तड़फड़ाये पर जिरह जाल से न निकल सके।

    इर्फान अली को अब अपनी सफलता का विश्वास हो गया। वह आज अदालत से निकले तो बाँछे खिली जाती थीं। इसके पहले भी बड़े-बड़े मुकदमों की पैरवी कर चुके थे और दोनों जेब नोटों से भर हुए घर चले थे, पर चित्त कभी इतना प्रफुल्लित न हुआ था। प्रेमशंकर तो ऐसे खुश थे मानो लड़के का विवाह हो रहा हो।

    इसके बाद तहसीलदार साहब का बयान हुआ। वह घंटों तक लखनपुर वालों की उद्दंडता और दुर्जनता का आल्हा गाते रहे, लेकिन इर्फान अली ने दस ही मिनट में उसका सारा ताना-बाना उधेड़ कर रख दिया।

    इर्फान-आप यह तसलीम करते हैं कि यह सब मुलजिम लखनपुर के खास आदमियों

    तहसीलदार-हो सकते हैं, लेकिन जात के अहीर, जुलाहे और कुर्मी हैं।

    इर्फान-अगर कोई चमार लखपती हो जाय तो आप उससे अपनी जूती गँठवाने का काम लेते हुए हिचकेंगे या नहीं?

    तहसीलदार-उन आदमियों में कोई लखपती नहीं है।

    इर्फान-मगर सब काश्तकार हैं, मजदूर नहीं। उनसे आपको घास छिलवाने का क्या मजाल था?

    तहसीलदार-सरकारी जरूरत।

    इर्फान-क्या यह सरकारी जरूरत मजदूरों को मजदूरी दे कर काम कराने से पूरी न हो सकती थी?

    तहसीलदार-मजदूरों की तायदाद उस गाँव में ज्यादा नहीं है।

    इर्फान-आपके चपरासियों में अहीर, कुर्मी या जुलाहे न थे? आपने उनसे यह काम क्यों न लिया?

    तहसीलदार-उनका यह काम नहीं है।

    इर्फान-और काश्तकारों का यह काम है?

    तहसीलदार-जब जरूरत पड़ती है तो उनसे भी यह काम लिये जाते हैं।

    इर्फान-आप जानते हैं जमीन लीपना किसका काम है?

    तहसीलदार-यह किसी खास जात का काम नहीं है।

    इर्फान-मगर आपको इससे तो इन्कार नहीं हो सकता कि आम तौर पर अहीर और ठाकुर यह नहीं करते?

    तहसीलदार-जरूरत पड़ने पर कर सकते हैं।

    इर्फान-जरूरत पड़ने पर क्या आप अपने घोड़े के आगे घास नहीं डाल देते? इस लिहाज से आप अपने को साईस कहलाना पसन्द करेंगे?

    तहसीलदार-मेरी हालत का उन काश्ताकारों से मुकाबला नहीं हो सकता।

    इर्फान-बहरहाल यह आपको मानना पड़ेगा कि जो लोग जिस काम के आदी नहीं हैं वह उसे करना अपनी जिल्लत समझते हैं, उनसे यह काम लेना बेइन्साफी है। कोई बरहमन खुशी से आपके बर्तन धोयेगा। अगर आप उससे जबरन यह काम लें तो वह चाहे खौफ से करे पर उसका दिल जख्मी हो जायेगा। वह मौका पायेगा तो आपकी शिकायत करेगा।

    तहसीलदार-हाँ, आपका यह फरमाना वजा है, लेकिन कभी-कभी अफसरों को मजबूर हो कर सभी कुछ करना पड़ता है।

    इर्फान-तो आपको ऐसी हालतों में नामुलायम बातें सुनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। फिर लखनपुर वालों पर इलजाम रखते हैं, यह इनसानी फिकरत का कसूर है। अब तो आप तसलीम करेंगे कि काश्तकारों से जो बेअदबी हुई वह आपकी ज्यादती का नतीजा था।

    तहसीलदार-अफसरों की आसाइश के लिए…….

    तहसीलदार साहब का आशय समझ कर जज ने उन्हें रोक दिया।

    इर्फान अली जब संध्या समय घर पहुंचे तब उन्हें बाबू ज्ञानशंकर का अर्जेंट तार मिला। उन्होंने एक जरूरी मुकदमे की पैरवी करने के लिए बुलाया था। एक हजार रुपये रोजाना मेहनताना का वादा था। डॉक्टर साहब ने तार फाड़ कर फेंक दिया और तत्क्षण तार से जवाब दिया-खेद है मुझे फुर्सत नहीं है। मैं लखनपुर के मामले की पैरवी कर रहा हूँ।

    गायत्री की दशा इस समय पथिक की सी थी जो साधु भेषधारी डाकुओं के कौशल जाल में पड़ कर लुट गया हो। वह उस पथिक की भाँति पछताती थी कि मैं कुसमय चली क्यों? मैंने चलती सड़क क्यों छोड़ दी? मैंने भेष बदले हुए साधुओं पर विश्वास क्यों किया और उनको अपने रुपयों की थैली क्यों दिखायी? उसी पथिक की भाँति अब वह प्रत्येक बटोही को आशंकित नेत्रों से देखती थी। यह विडम्बना उसके लिए सहनों उपदेशों से अधिक शिक्षाप्रद और सजगकारी थी। अब उसे याद आया था कि एक साधु ने मुझे प्रसाद खिलाया था। जरा दूर चलकर मुझे प्यास लगी तो उसने मुझे शर्बत पिलाया, जो तृषित होने के कारण मैंने पेट भर पिया। अब उसे यह भी ज्ञात हो रहा था कि वह प्यास उसी प्रसाद का फल था। ज्यों-ज्यों वह उस घटना पर विचार करती थी, उसके सभी रहस्य, कारण और कार्य सूत्र में बँधे हुए मालूम होते थे। गायत्री ने अपने आभूषण तो बनारस में ही उतार कर श्रद्धा को सौंप दिये थे, अब उसने रंगीन कपड़े भी त्याग दिये। पान खाने का उसे शौक था। उसे भी छोड़ा। आईने और कंघी को त्रिवेणी में डाल दिया। रुचिकर भोजन को तिलांजलि दी। उसे अनुभव हो रहा था कि इन्हीं व्यसनों में मेरे मन को चंचल बना दिया। मैं अपने सतीत्व के गर्व में विलास-प्रेम को निर्विकार समझती थी। मुझे वह न सूझता था कि वासना केवल इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके सन्तुष्ट नहीं होती, वह शनैः-शनैः मन को भी अपना आज्ञाकारी बना लेती है। अब वह केवल एक उजली साड़ी पहनती थी, नंगे पाँव चलती थी और रूखा-सूखा भोजन करती थी। इच्छाओं का दमन कर रही थी, उन्हें कुचल डालना चाहती थी। शीशा ज्यों-ज्यों साफ दिखायी दे रही थीं। कभी-कभी क्षोभ और ग्लानि के उद्वेग में उसका जी चाहता कि प्राणाघात कर लूँ। उसे अब स्वप्न में अक्सर अपने पति के दर्शन होते। उसकी मर्मभेदी बातें कलेजे के पार हो जातीं, उनकी तीव्र दृष्टि हृदय को छेद डालती।

    बनारस से वह प्रयाग आयी और कई दिनों तक झूसी की एक धर्मशाला में ठहरी रही। यहाँ उसे कई महात्माओं के दर्शन हुए, लेकिन उसे उपदेशों से शान्ति न मिली। वे सब दुनिया के बन्दे थे। पहले तो उससे बात तक न की; पर ज्यों ही मालूम हुआ कि यह रानी गायत्री है त्यों ही सब ज्ञान और वैराग्य के पुतले बन गये। गायत्री को विदित हो गया कि उनका त्याग केवल उद्योगहीनता है और उनका भेष केवल सरल हृदय भक्तों के लिए मायाजाल। वह निराश हो कर चौथे दिन हरिद्वार जा पहुँची; पर यहाँ धर्म का आडम्बर तो बहुत देखा, भाव कम यात्रीगण दूर-दूर से आये हुए थे, पर तीर्थ करने के लिए नहीं, केवल विहार करने के लिए। आठों पहर गंगा तट पर विलास और आभूषण की बहार रहती थी। गायत्री खिन्न हो कर तीसरे ही दिन यहाँ से हृषीकेश चली गयी। वहाँ उसने किसी को अपना परिचय न दिया। नित्य पहर रात रहे उठती और गंगा स्नान करके दो-तीन घंटे गीता का पाठ किया करती। शेष समय धर्म ग्रन्थों के पढ़ने में काटती। सन्ध्या को साधु-महात्माओं के ज्ञानोपदेश सुना करती। यद्यपि वहाँ दो-एक त्यागी आत्माओं के दर्शन हुए, पर कोई ऐसा तत्त्वज्ञानी न मिला जो उसके चित्त को विरक्त कर दे। इतना संयम और इन्द्रियनिग्रह करने पर भी सांसारिक चिन्ताएँ उसे सताया करती थीं। मालूम नहीं घर पर क्या हो रहा है? न जाने सदाव्रत चलता है या ज्ञानशंकर ने बन्द कर दिया? फर्श आदि की न जाने क्या दशा होगी? नौकर-चाकर चारों ओर लूट मचा रहे होंगे। मेरे दीवान-खाने में मनों गर्द जम रही होगी। अबकी अच्छी तरह मरम्मत न हुई होगी तो छतें कई जगह से कट गयी होंगी। मोटरें और बग्घियाँ रोज माँगी जाती होंगी। जो ही आकर दो-चार लल्लो-चप्पो की बातें करता होगा, लाला जी दे देते होंगे समझते होंगे। अब तो मैं मालिक हूँ। बगीचा बिलकुल जंगल हो गया होगा। ईश्वर जाने कोई चिड़ियों और जानवरों की सुध लेता है या नहीं। बेचारे भूखों मर गये। होंगे। दोनों पहाड़ी मैंने कितनी दौड़-धूप करने से मिले थे। अब या तो मर गये होंगे या कोई माँग ले गया होगा। सन्दूकों की कुन्जियाँ तो श्रद्धा को दे आयी हूँ, पर ज्ञानशंकर जैसे दुष्ट चरित्र आदमी से कोई बात बाहर नहीं। बहुधा धर्म ग्रन्थों के पढ़ने या मन्त्र जाप करते समय दुश्चिन्ताएँ उसे आ घेरती थीं। जैसे टूटे हुए बर्तन में एक ओर से पानी भरो और दूसरी ओर से टपक जाता है। उसी तरह गायत्री एक ओर तो आत्म-शुद्धि की क्रियाओं में तत्पर हो रही थी, पर दूसरी ओर चिन्ता-व्याधि उसे घेरे रहती थी। वह शान्ति, वह एकाग्रता न प्राप्त होती थी जो आत्मोत्कर्ष का मूल मन्त्र है। आश्चर्य तो यह है कि वह विघ्न-बाधाओं का स्वागत करती थी और उन्हें प्यार से हृदयागार में बैठाती थी। वह बनारस से यह ठान कर चली थी कि अब संसार से कोई नाता न रखूँगी, लेकिन अब उसे ज्ञात होता था कि आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए वैराग्य की जरूरत नहीं है। मैं अपने घर रह कर रियासत की देख-रेख करते हुए क्या निर्लिप्त नहीं रह सकती; पर इस विचार से उसका जी झुंझला पड़ता था। वह अपने को समझाती, अब उसे रियासत से क्या प्रयोजन है? बहुत भोग कर चुकी। मुझे मोक्ष मार्ग पर चलना चाहिए, यह जन्म तो बिगड़ ही गया, दूसरा जन्म क्यों बिगाइँ?

    By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text

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