पाठ-खंड 77
byश्रद्धा ने प्रेम से आँसू पोंछते हुए कहा-बेटा, चल कर थोड़ा सा खाना खा लो। सवेरे मैं फिर उनसे कहूँगी। डॉ. इर्फानअली ने बात बिगाड़ दी, नहीं तो मैंने तो राजी कर लिया था।
माया-चाची, मेरी खाने की बिलकुल इच्छा नहीं है। (रो कर) तेजू और पद्मू के प्राण मैंने लिए और अब मैं बाबा की कुछ मदद भी नहीं कर सकता। ऐसे जीने पर धिक्कार है।
श्रद्धा भी करूणावेग से विवश हो गयी। अंचल से माया के आँसू पोंछती थी और स्वयं रोती थी।
माया ने कहा-चाची, तुम नाहक हलाकान होती हो, मैं अभागा हूँ, मुझे रोने दो।
श्रद्धा-तुम चल कर कुछ खा लो। मैं आज ही रात को यह बात छेड़ूंगी।
माया का चित्त बहुत खिन्न था, पर श्रद्धा की बात न टाल सका। दो-चार कौर खाये, पर ऐसा मालूम होता था कि कौर मुँह से निकला पड़ता है। हाथ-मुँह धो कर फिर अपने कमरे में लेट रहा।
सारी रात श्रद्धा यही सोचती रही कि इन्हें कैसे समझाऊँ। शीलमणि से भी सलाह ली, पर कोई युक्ति न सूझी।
प्रातः काल बुधिया किसी काम से आयी। बातों-बातों में कहने लगी-बहूजी, पैसा सब कोई देखता है, मेहनत कोई नहीं देखता। मर्द दिन भर में एक-दो रुपया कमा लाता है तो मिजाज ही नहीं मिलता, और बेचारी रात-दिन चूल्हे-चक्की में जुटी रहे, फिर भी वह निकम्मी ही समझी जाती है।
श्रद्धा सहसा उछल पड़ी। जैसे सुलगती हुई आग हवा पा कर भभक उठती है। उसी भाँति इन बातों ने उसे एक युक्ति सुझा दी। भटकते हुए पथिक को रास्ता मिल गया। कोई चीज जिसे घंटों से तलाश करते-करते थक गयी थी, अचानक मिल गयी। ज्यों ही बुधिया गयी, वह प्रेमशंकर के पास आ कर बोली-चाचाजी को रुपये देने के बारे में क्या निश्चय किया?
प्रेम-फिक्र में हूँ। दो-चार दिन में कोई सूरत निकल ही आयेगी।
श्रद्धा-रुपये तो रखे ही हैं।
प्रेम-मुझे खर्च करने का अधिकार नहीं है।
श्रद्धा-यह किसके रुपये हैं।
प्रेम-(विस्मित होकर) माया के शिक्षार्थ दिये गये हैं।
श्रद्धा-तो क्या 2000 रुपये महीने खर्च नहीं होते हैं?
प्रेम-क्या तुम जानती नहीं? लगभग 800 रुपये खर्च होते हैं, बाकी 1200 रुपये बचे रहते हैं।
श्रद्धा-यह क्यों बचे रहते हैं? क्या यह तुम्हारी समझ में नहीं आता? डॉक्टर इर्फान अली को पढ़ने के लिए कितना वेतन मिलना चाहिए? डॉ. प्रियनाथ और बाबू ज्वालासिंह को भी नौकर रखते तो कुछ न कुछ देना पड़ता। तुम्हारी मजूरी भी कुछ न कुछ होनी ही चाहिए। तुम्हारे विचार में इर्फानअली का वेतन कुछ होता ही नहीं? उनका एक दिन का मेहनताना 500 रुपये न दोगे? प्रियनाथ की आमदनी 100 रुपये प्रति दिन से कम नहीं थी। पहले तो वह किसी के घर पढ़ाने जायें ही नहीं, जायें तो 500 रुपये महीने से कम न लें। बाबू ज्वालासिंह भी 100 रुपये पर महँगे नहीं हैं। रहे तुम तुम्हारा भतीजा है, उसे शौक से प्रेम से पढ़ाते हो, पर दूसरों को क्या पड़ी है। कि वह सेंत में अपनी सिरपच्ची करें। इन रुपयों को तुम बचत समझते हो, यह सर्वथा अन्याय है। इसे चाहे अपनी सज्जनता का पुरस्कार समझो या उनके एहसान का मूल्य, इस धन के खर्च करने का उन्हें अधिकार है।
प्रेमशंकर ने सन्दिग्ध भाव से कहा-माया और तुम बिना रुपये दिलाये न मानोगे, जैसी तुम्हारी इच्छा। तुम्हारी युक्ति में न्याय है, इसे मैं मानता हूँ, पर आत्मा सन्तुष्ट नहीं होती। मैं इस वक्त दिये देता हूँ पर इसे ऋण समझ कर सदैव अदा करने की चेष्टा करता रहूँगा।
लाला प्रभाशंकर को रुपये मिले तो वह रोये। गाँव तो बच गया, पर उसे कौन बिलसेगा ? दयाशंकर का चित्त फिर घर से उचाट हो चला था। साधु-सन्तों के सत्संग के प्रेमी हो गये थे। दिन-दिन वैराग्य में रह होते जाते थे।
इधर मायाशंकर की यूरोप-यात्रा पर ज्ञानशंकर राजी न हुए। उनके विचारों में अभी यात्रा से माया को यथेष्ट लाभ न पहुँच सकता था। उससे यह कहीं उत्तम था कि वह अपने इलाकों का दौरा करे। उसके बाद हिन्दुस्तान के मुख्य-मुख्य स्थानों को देखे, अतएव चैत के महीने में मायाशंकर गोरखपुर चला गया और दो महीने तक अपने इलाके की सैर करने के बाद लखनऊ जा पहुँचा। दो महीने तक वहाँ भी अपने गाँवों का दौरा करता रहा। प्रतिदिन जो कुछ देखता अपनी डायरी में लिख लेता। कृषकों की दशा का खूब अध्ययन किया। दोनों इलाकों के किसान उमके प्रजा-प्रेम, विनय और शिष्टता पर मुग्ध हो गये। उसने उनके दिलों में घर कर लिया। भय की जगह प्रेम का विकास हो गया। लोग उसे अपना उच्च हितैषी समझने लगे। उसके पास आ कर अपनी विपत्ति-कथा सुनाते। उसे उनकी वास्तविक दशा का ऐसा परिचय किसी अन्य रीति से न मिल सकता था। चारों तरफ तबाही छायी हुई थी। ऐसा विरला ही कोई घर था जिसमें धातु के बर्तन दिखाई पड़ते हों। कितने घरों में लोहे के तवे तक न थे। मिट्टी के बर्तनों को छोड़ कर झोपड़े में और कुछ दिखायी न देता था। न ओढ़ना, न बिछौना, यहाँ तक कि बहुत से घरों में खाटें तक न थी और वह घर ही क्या थे। एक-एक, दो-दो छोई कोठरियाँ थीं। एक मनुष्यों के लिए, एक पशुओं के लिए। उसी एक कोठरी में खाना, सोना, बैठना-सब कुछ होता था। बस्तियों इतनी धनी थीं कि गाँव में खुली हुई जगह दिखायी ही नहीं देती थी। किसी के द्वार पर सहन नहीं, हवा और आकाश का शहरों की घनी बस्तियों में भी इतना अभाव न होगा। जो किसान बहुत सम्पन्न समझे जाते थे उनके बदन पर साबित कपड़े न थे, उन्हें भी एक जून चबेना पर ही काटना पड़ता था। वह भी ऋण के बोझ से दबे हुए थे। अच्छे जानवरों के रखने को आँखें तरस जाती थीं। जहाँ देखो छोटे-छोटे मरियल, दुर्बल बैल दिखायी देते और खेत में रेंगते और चरनियों पर औंधाते थे। कितने ही ऐसे गाँव थे जहाँ दूध तक न मयस्सर होता था। इस व्यापक दरिद्रता और दीनता को देख कर माया का कोमल हृदय तड़प जाता था। वह स्वभाव से ही भावुक था-बहुत नम्र उदार और सहृदय। शिक्षा और संगीत ने इन भावों को और भी चमका दिया था। प्रेमाश्रय में नित्य सेवा और प्रजा-हित की चर्चा रहती थी। माया का सरल हृदय उसी रंग में रंगा गया। वह इन दृश्यों से दुःखित हो कर प्रेमशंकर को बार-बार पत्र लिखता, अपनी अनुभूत घटनाओं का उल्लेख करता और इस कष्ट को निवारण करने का उपाय पूछता, किन्तु प्रेमशंकर या तो उनका कुछ उत्तर ही न देते या किसानों की मूर्खता, आलस्य आदि दुःस्वभावों की गाथा ले बैठते।
माया तो अपने इलाकों की सैर कर रहा था, इधर स्थानीय राजसभा के सदस्यों का चुनाव होने लगा। ज्ञानशंकर इस सम्मान्य पद के पुराने अभिलाषी ये बड़े उत्साह से मैदान में उतरे, यद्यपि ताल्लुकेदार सभा के मन्त्री थे, पर ताल्लुकेदारों की सहायता पर उन्हें भरोसा न था। कई बड़े-बड़े ताल्लुकेदार अपने के गाँव प्रतिनिधि बनने के लिए तत्पर थे। उनके सामने ज्ञानशंकर को अपनी सफलता की कोई आशा न थी। इसलिए उन्होंने गोरखपुर के किसानों की ओर से खड़ा होने का निश्चय किया। वहाँ संग्राम इतना भीषण न था। उनके गोइन्दे देहातों में घूम-घूम कर उनका गुणगान करने लगे। बाबू साहब कितने दयालु, ईश्वरभक्त हैं, उन्हें चुन कर तुम कृतार्थ हो जाओगे। वह राजसभा में तुम्हारी उन्नति और उपकार के लिए जान लड़ा देंगे, लगान घटवाएँगे, प्रत्येक गाँव में गोचर भूमि की व्यवस्था करेंगे, नजराने उठ्वा देंगे, इजाफा लगान का विरोध करेंगे और इखराज को समूल उखाड़ देंगे। सारे प्रान्त में धूम मची हुई थी। जैसे सहागल के दिनों में ढोल और नगाड़ों का नाद ग़जाने लगता है उसी भाँति इस समय जिधर देखिए जाति प्रेम की चर्चा सुनायी देती थी। डाक्टर इर्फानअली बनारस महाविद्यालय की तरफ से खड़े हुए। बाबू प्रियनाथ ने बनारस म्युनिसिपैलिटी का दामन पकड़ा। ज्वालासिंह इटावे के रईस थे, उन्होंने इटावे के कृषकों का आश्रय लिया। सैयद ईजाद हुसेन को भी जोश आया। वह मुसलिम स्वत्व की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए। प्रेमशंकर इस क्षेत्र में न आना चाहते थे पर भवानीसिंह, बलराज और कादिर खाँ ने बनारस के कृषकों पर उनका मन्त्र चलाना शुरू किया। तीन-चार महीनों तक बाजार खुब गर्म रहा, छापेखाने को ट्रैक्टों के छापने से सिर उठाने का अवकाश न मिलता था। कहीं दावतें होती थीं, कहीं नाटक दिखाये जाते थे। प्रत्येक उम्मीदवार अपनी-अपनी ढोल पीट रहा था। मानो संसार के कल्याण का उसी ने बीड़ा उठाया है।
अन्त में चुनाव का दिन आ पहुँचा। उस दिन नेताओं का सदुत्साह, उनकी तत्परता, उनकी शीलता और विनय दर्शनीय थी और राय देनेवालों का तो मानों सौभाग्य-सूर्य उदय हो गया था। मोहनभोग तथा मेवे खाते थे। और मोटरों पर सैर करते थे। सुबह के पहर रात तक रायों की चिट्ठियां पढ़ी जाती रहीं।
इसके बात के सात दिन बड़ी बेचैनी के दिन थे। ज्यों-त्यों करके कटे। आठवें दिन राजपत्र में नतीजे निकल गये। आज कितने ही घरों में घी के चिराग जले, कितनों ने मातम मनाया। ज्ञानशंकर ने मैदान मार लिया; लेकिन प्रेमाश्रय निवासियों को जो सफलता प्राप्त हुई वह आश्चर्यजनक थी, इस अखाड़े के सभी योद्धा विजय-पताका फहराते हुए निकले। सबसे बड़ी फतह प्रेमशंकर की थी। वह बिना उद्योग और इच्छा के इस उच्चासन पर पहुँच गये थे। ज्ञानशंकर ने यह खबर सुनी तो उनका उत्साह भंग हो गया। राजसभा में बैठने का उतना शौक न रहा। बहुधा वृक्षपंजों में सन्ध्या समय पक्षियों के कलरव से कान पड़ी आवाज नहीं सुनायी देती लेकिन ज्यों ही अन्धेरा हो जाता है और चिड़ियाँ अपने-अपने घोंसलों में जा बैठती हैं वहाँ नीरवता छा जाती हैं, उसी भाँति जाति के प्रतिनिधि गण राजसभा के सुसज्जित सुविशाल भवन में पहुँच कर शान्ति में मग्न हो गये। वे लम्बे-चौड़े वादे, वे बड़ी-बड़ी बात सब भूल गयीं। कोई मुवक्किलों के सेवा-सत्कार में लिप्त हुआ; कोई अपने बही-खाते की देख-भाल में, कोई अपने सैर और शिकार में जाति-हित की वह उमंग शांत हो गयी। लोग मनोविनोद की रीति से राजसभा में आते और कुछ निरर्थक प्रश्न पूछ कर या अपने वाक्य नैपुण्य का परिचय दे कर विदा हो जाते। वह कौन-सी प्रेरक शक्तियों थीं। जिन्होंने लोगों को इस अधिकार पर आसक्त कर रखा था। इसका निर्णय करना कठिन है, पर उनमें सेवाभाव का जरा भी लगाव न था-यह निर्भ्रान्त है। कारण और कार्य, साधन और फल दोनों उसी अधिकार में विलीन हो गये।
किन्तु प्रेमाश्रय में वह शिथिलता न थी। यहाँ लोग पहले से ही सेवाधर्म के अनुगामी थे। अब उन्हें अपने कार्यक्षेत्र को और विस्तृत करने का सुअवसर मिला। ये लोग-नये नये सुधार के प्रस्ताव सोचते, राजकीय प्रस्तावों के गुण-दोष की मीमांसा करते, सरकारी रिपोर्टों का निरीक्षण करते। प्रश्नों द्वारा अधिकारियों के अत्याचारों का पता देते, जहाँ कहीं न्याय का खुन होते देखते, तुरंत सभा का ध्यान उसकी ओर आकर्षित करते और ये लोग केवल प्रश्नों से ही सन्तुष्ट न हो जाते थे, वरन् प्रस्तुत विषयों के मर्म तक पहुँचने की चेष्टा करते। विरोध के लिए विरोध न करते बल्कि शोध के लिए। इस सदुद्योग और कर्तव्यपरायणता ने शीघ्र ही राजसभा में इस मित्र-मंडल का सिक्का जमा दिया। उनकी शंकाएँ, उनके प्रस्ताव, उनके प्रतिवाद आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। अधिकारी-वर्ग उनकी बातों को चुटकियों में न उड़ा सकते थे। यद्यपि डॉ. इर्फानअली इस मंडल के मुखपात्र थे, पर खुला हुआ भेद था कि प्रेमशंकर ही उसके कर्णधार हैं।
इस तरह दो साल बीत गये और यद्यपि मित्र-मंडल ने सभा को मुग्ध कर लिया था, पर अभी तक प्रेमशंकर को अपना यह प्रस्ताव सभा में प्रेश करने का साहस न हुआ जो बहुत दिनों से उनके मन में समाया हुआ था और जिसका उद्देश्य यह था कि जमींदारों से असामियों को बेदखल करने का अधिकर ले लिया जाये। वह स्वयं जमींदार घराने के थे, माया जिसे वह पुत्रवत् प्यार करते थे एक बड़ा ताल्लुकेदार हो गया था। ज्वालासिंह भी जमींदार थे। लाला प्रभाशंकर जिनको वह पिला तुल्य समझते थे अपने अधिकारों में जौ भर की कमी भी न सह सकते थे, इन कारणों से वह प्रस्ताव को सभा के सम्मुख लाते हुए सकुचाते थे। यद्यपि सभा में भूपतियों की संख्या काफी थी और संख्या के देखते दबाव और भी ज्यादा था, पर प्रेमशंकर को सभा का इतना भय न था जितना अपने सम्बन्धियों का, इसके साथ ही अपने कर्तव्य-मार्ग से विचलित होते हुए उनकी आत्मा को दुःख होता था।
एक दिन वह इसी दुविधा में बैठे हुए थे कि मायाशंकर एक पत्र लिये हुए आया और बोला-देखिए, बाबू दीपक सिंह सभा में कितना घोर अनर्थ करने का प्रयत्न कर रहे हैं? वह सभा में इस आशय का प्रस्ताव लाने वाले हैं कि जमींदारों को असामियों से लगान वसूल करने के लिए ऐसे अधिकार मिलने चाहिए कि वह अपनी इच्छा से जिस असामी को चाहें बेदखल कर दें। उनके विचार में जमींदारों को यह अधिकार मिलने से रुपये वसूल करने में बड़ी सुविधा हो जायेगी। प्रेमशंकर ने उदासीन भाव से कहा-मैं यह पत्र देख चुका हूँ।
माया-पर आपने इसका कुछ उत्तर नहीं दिया?
प्रेमशंकर ने आकाश की ओर ताकते हुए कहा-अभी तो नहीं दिया।
माया-आप समझते हैं कि सभा में प्रस्ताव स्वीकृत हो जायगा?
प्रेम-हाँ, सम्भव है।
माया-तब तो जमींदार लोग असामियों को कुचल ही डालेंगे।
प्रेम-हाँ, और क्या?
माया-अभी से इस आन्दोलन की जड़ काट देनी चाहिए। आप इस पत्र का जवाब दे दें तो बाबू दीपकसिंह को अपना प्रस्ताव सभा में पेश करने का साहस न हो।
प्रेम-ज्ञानशंकर क्या कहेंगे?
माया-मैं जहाँ तब समझता हूँ, वह इस प्रस्ताव का सर्मथन न करेंगे।
प्रेम-हाँ, मुझे भी ऐसी आशा है।
मायाशंकर चचा की बातों से उनकी चित्त-वृत्ति को ताड़ गये।
वह जब से अपने इलाके का दौरा करके लौटा था, अक्सर कृषकों की सुदशा के उपाय सोचा करता था। इस विषय की कई किताबें पढ़ी थीं और डॉक्टर इर्फान अली से भी जिज्ञासा करता रहता था। प्रेमशंकर को असमंजस में देख कर उसे बहुत खेद हुआ। वह उनसे तो और कुछ न कह सका, पर उस पत्र का प्रतिवाद करने के लिए उसका मन अधीर हो गया। आज तक उसने कभी समाचार-पत्रों के लिए कोई लेख न लिखा था। डरता था, लिखते बने या न बने सम्पादक छापें या न छापें। दो-तीन दिन यह इसी आगा-पीछा में पड़ा रहा। अन्त में उसने उत्तर लिखा और सकुचाते, कुछ इरते डॉक्टर इर्फानअली को दिखाने ले गया। डॉक्टर महोदय ने लेख पढ़ा तो, चकित हो कर पूछा-यह सब तुम्हीं ने लिखा है?
By प्रेमचंद · Premchand · Source and reuse details · Source text
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